कुंद होती कलम की धार और अपमानित होते पत्रकार
| Rizwan Chanchal - Aug 14 2017 12:24PM

आजादी के बाद देश की आम नागरिकों को कलमकारों,पत्रकारों से जो अपेक्षाएं थीं क्या उन अपेक्षाओं पर खरे उतर रहे हैं कलमकार, पत्रकार  .....? यह प्रश्न आज इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि देश के आम नागरिकों को यह भरोषा दिया गया था कि हर हाथ को काम और हर पेट को रोटी व रहने को छत का इंतजाम तथा समतायुक्त समाज ही सरकार की पहली प्राथमिकता होगी किन्तु देश के आम नागरिकों द्वारा संजोये  गये यह  सपने आजादी के 70 साल गुजरने के बाद भी मात्र सपने  ही बनकर रह गये. सवाल उठ रहा है कि उन वादों पर आखिर अमल कितना हुआ और यदि नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ आज भी नाकारा तंत्र के चलते घटित हो रही हैं बड़ी घटनाएँ आखिर  आम देश वासियों के संकल्पों, इरादों और सपनो को किसने तोडा , कौन हैं इसके जिम्मेदार ?   कौन देगा इन अनुत्तरित सवालों का जबाब, क्या सच में राजनेताओं की भांति ही हम कलमकारों,पत्रकारों  का जमीर भी मर चुका है या  हम सच्चाई की जंग के लिए आगे आना ही नहीं चाहते. आखिर  वो कौन कलमकार थे जो कलम की धार को बनाये रख बिना किसी खौफ के विषम परिस्थितियों में देश की आजादी में अपनी जान तक न्योछावर कर दिए उन्हें न तो लोग तब भूले थे न ही आज भूले हैं. ऐसा भी नहीं है की ऐसे कलमकार देश में अब हैं ही नहीं,  आज भी कुछेक कलमकार पत्रकार उन शहीद कलमकारों को अपना आदर्श मान कलमकारी कर रहे हैं, उन्हें भले ही न जाना जा रहा हो, भले ही उन्हें सम्मानित ना किया जा रहा हो, लेकिन वो कलमकारी में मस्त हैं हाँ ऐसे कलम कार, पत्रकार साधन विहीन और सत्ता से दूर जरूर हैं लेकिन उनकी कलम में आज भी धार बरकरार है.

कहना न होगा जहाँ भारत अभी तक मूलभूत जरूरतों के लिए सिसक रहा है वहीं इंडिया किलकारियां मार रहा है, वह इंडिया जहां कारपोरेट सेक्टर है, मॉल हैं फिल्मी ग्लैमर है, राजनीति है, थैलीशाहों और कालेधन वालों की बस्ती है, इसके लिए हम भले ही सिर्फ और सिर्फ राजनैतिक दलों को दोषी ठहरायें और थोडा बहुत लिखकर इतिश्री भी करते रहें लेकिन वास्तविकता यह है कि आजादी के बाद हम कलमकारों पत्रकारों से देश को जो उम्मीदें थीं उस पर हम  भी पूरी तरह खरे नहीं उतरें हैं । आज ज्यादातर कलमकार,पत्रकार  सत्ता की दलाली में चूर इठलाते नजर आतें है. उनकी पूरी कोशिश रहती है कि ऐन-केन प्रकारेण कोई पद प्राप्त कर लिया जाए , अखबार को बड़ा विज्ञापन मिल जाये या उनकी लिखी पुस्तकों को पुरस्कार मिल जाए, अथवा परिजनों को सत्ता की जुगाड़ के चलते कोई बेहतर नौकरी मिल जाए आदि आदि !

कहने का तात्पर्य यह की स्वार्थ के चलते यदि आत्मसम्मान की बोली भी लगानी पड़ रही है  तो हम कलमकार,पत्रकार आज पीछे नहीं रह रहे हैं यही कारण है की समाज में हम कलमकारों,पत्रकारों  का अस्तित्व भी  दिन व दिन कमजोर होता जा  रहा है जो की बेहद अफसोस जनक है . हम कलमकारों ने अपने को देवदूत अल्लामियां व भगवान् समझ लिया है, आम जनता से हमारा कोई जुड़ाव ही नहीं रह गया है, हम मुफलिसी में जी रहे लोगों, गरीब किसानों से मिलना ही नहीं चाहते उनके दुःख और तकलीफों में सरीक होना हमें अपनी शान के खिलाफ लगता है, पूरा देश महंगाई से जूझ रहा है लोग कर्ज के बोझ से बोझिल हैं, गरीबी भुखमरी इस हद तक की लोग आत्महत्या करने को विवश हो रहे हैं। सरकारी आंकड़े बता रहें हैं की हर साल हमारे देश का 12000 किसान आत्महत्या कर रहा है बावजूद ऐसे विषम समय में हम कलमकार पत्रकार न तो जनता के दर्द को खबरों का आधार बना रहें हैं और न ही समस्या के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई अभियान चला रहें हैं .आलम यह है की इक्का दुक्का जो आवाज उठा रहें हैं उन्हें कुचल देने का षड़यं भी  त्र रचा जा रहा है   छोटे व मझोले अखबारों, पत्रिकाओं को भी सरकार जमीदोज करने की तैयारी में है, न्यूज प्रिंट पर जी एस टी लागू करना हो या फिर छोटे मझोले अखबारों की मान्यताये खत्म करना सब कुछ सरकार बड़ी आसानी के साथ अंजाम देने में जुटी है.जुटे भी क्यों ना हम भी तो अपने   उद्देश्यदायित्वों से भटक चुके हैं आपस में एकमत नहीं हैं बटें हुए हैं . छोटे कलमकार पत्रकार और बड़े कलमकार पत्रकार के बीच  खाई सी खिची है जिसे सरकार भी जान चुकी है और तो और पार्टी विचारधारा के आधार पर पत्रकारों कलमकारों को आमंत्रण दिया जा रहा है और हम हैं की सहर्ष तैयार हैं सरकार के इशारों पर नाचने के लिए, परिणाम ऐसे कि खाने की थालियां तक हाँथ से छुटा ली जा रही हैं और हम मौन हैं आखिर क्यों ? जरूरत है राजनेताओं की मनसा को समझने व एकजुट होकर देश के आम नागरिकों की सम्सयायों को उजागर करते हुए सरकारों को आइना दिखाने की, वरना वो दिन दूर नहीं की देश के नागरिकों में पत्रकारों व कलमकारों का विश्वास तो टूटेगा ही साथ ही सरकारें भी कलमकारों पत्रकारों को सबक देने से नहीं बाज आयेंगीं !

आज जब नागरिकों के बीच ये सवाल उठ रहें हैं की आजादी के 70 सालों बाद भी बुंदेलखंड में लोग जब घास की रोटी खाने को विवश हुए,किसानों का फांसी के फंदों पर आये दिन लटकना जारी रहा और महंगाई की मार से आमजन त्रस्त रहा तो कितने अखबारों ने इसे प्राथमिकता दी कितने चौनल्स इन खबरों को ब्रेकिंग न्यूज बनाए. हाँ लघु समाचार पत्र पत्रिकाओं की कलम चली यह बात दीगर है उनकी लेखनी का असर मात्र नक्कार खाने में तूती की आवाज जैसी लोकोक्ति को ही चरित्रार्थ कर सकी. क्यों कि ऐसे कलमकारों,पत्रकारों की संख्या कम रही.लेकिन उनकी कलम चली. अब  सवाल यह उठता है की क्या इन्ही गिने चुने कलमकारों पत्रकारों का ही दायित्व बनता हैं देश के आम नागरिको की इन जटिल समस्याओं को सरकार सामने लाकर  आइना दिखाने  का या देश के सारे कलमकारों पत्रकारों का यह कर्तब्य बनता है आइये जरा सोचें की आखिर वजह क्या है की आजादी के इतने सालों बाद भी प्राथमिक जरूरतों को लेकर अभी तक क्यों सिसक रहा है अपना ये भारत . वास्तव में क्या हम कलमकार, पत्रकार इन कारणों की तह तक जा रहें हैं या जाने की सोंच रहें हैं यदि नहीं तो क्यों ?

गौरतलब है भारत जैसे कृषि प्रधान देश के किसान को आजादी के 70 सालों बाद भी अपनी उपजाई फसल को सरकार द्वारा निर्धारित दर पर ही बेचने को आज भी मजबूर होना पड़ता है  और जब उसे बीज खरीदना पड़ता है तो कई गुना बढे दर पर लेना उसकी  विवशता  बनी हुई  है, कृषि प्रधान देश होने के बावजूद कभी कृषि परक बजट सरकारों की प्राथमिकता में नहीं होता और व्यवसाय परक बजट ही अक्सर यहाँ बनता है  .गरीबों को चिकित्सा और शिक्षा जैसी मूलभूत समस्या से अभी तक जूझना पड रहा है. नाकारा तंत्र का ताज़ा उदाहरण गोरखपुर की हालिया ट्रेजिडी है जहाँ 60 से अधिक मासूम अव्यवस्था के चलते काल के गाल में समां गए. सरकार के तमाम दावों के बावजूद अक्सर साइकिल व पैदल शव ले जाने वाले द्रश्य आज भी दिखते रहते हैं अस्पतालों की सीढि़यों और इ रिक्शा पर प्रसूताये बच्चे जनने को बाध्य हैं.शिक्षा का आलम यह की आज गरीब तबके को छोडकर शायद ही कोई ऐसा हो जो अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाने में दिलचस्पी रखता हो, कारण स्पष्ट है की यहाँ पढाई,किताबे,ड्रेस,भोजन,बस्ता सबकुछ निशुल्क होने  के बावजूद शिक्षा का स्तर बेहद खराब है और तो और सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षक शिक्षिकाओं का वेतन भी 40-50 हजार के करीब है और प्राइवेट स्कूलों में कार्यरत शिक्षक शिक्षिकाओं का मात्र 5 से 10 हजार के आस पास, लेकिन यहाँ शिक्षा का स्तर सरकारी स्कूलों से बहुत बेहतर है यही कारण है की आम आदमी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में न पढ़ाकर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना ज्यादा बेहतर मानता है . उच्चन्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए निर्देश सरकारी कर्मचारियों,अधिकारियों,जनप्रतिनिधियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढाये जाने की अनिवार्यता को सरकार ने सुप्रीमकोर्ट में अपील कर ठन्डे बसते में डाल दिया है जब की यदि उच्चन्यायालय के दिए आदेशों निर्देशों का पालन सरकार करवाती तो निश्चय ही सरकारी स्कूलों का स्वरुप ही बदल चुका होता फिर न यहाँ मिड डे मील में छिपकलियाँ पाई जाती ना ही शिक्षा का स्तर ही इंतना कमजोर होता.कहने का तात्पर्य यह की आम नागरिकों की इन मूलभूत समस्याओं पर कलमकारों पत्रकारों का ध्यान क्यों नहीं जाता...? क्यों नहीं बन पाती ये ब्रेकिंग न्यूज अब अगर हमारी विश्वसनीयता पर नागरिक सवाल उठाते हैं तो गलत क्या है.

इसमें कोई दो राय नहीं कलमकार पत्रकार समाज का आइना होते हैं कल तक यही समाज इन्हें सम्मान की नजर से देखता रहा है आखिर कारण क्या है की आज कलमकार पत्रकार न अपनी कोई पहचान ही बना पा रहें हैं न ही सम्मान पा रहे हैं, आश्चर्य तो तब होता है कि जब कथित बड़े साहित्यकार कलमकार पत्रकार को उनके मौहल्ले वाले ही तरजीह नहीं देते । कहीं ऐसा तो नहीं की  वे खुद को इतना महान और उच्च समझ बैठे है की वह न तो किसी के दुख दर्द में शामिल होना चाहते हैं और न ही वह इस बात का ख्याल रखते हैं कि उनके क्षेत्र के लोग किस समस्या से जूझ रहे हैं, या वो आम आदमी के बीच जा उनकी समस्याओं को सुनने व देखने में अपनी तौहीन समझते हैं,यदि ऐसा है तो फिर यह कहते ही क्यों हैं कि समाज में उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। आखिर क्यों मिले आम जनता का सम्मान ? ऐसा क्या किया है आपने उनके लिए ? क्या कभी किसी निर्दोश को पुलिस से छुड़ाने के लिए आप किसी पुलिस थाने में गये क्या कभी आपने उनके घर चूल्हा ठंढा होने के कारण को उनसे मिलकर जानना चाहा । अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या पत्रकार,कलमकार भी अन्य लोगों की तरह केवल कलम को सिर्फ धनार्जन के लिए इस्तेमाल  कर रहे है या उसका समाज के प्रति भी कुछ दायित्व बनता है। अगर समाज के प्रति वह अपने दायित्व को नकारता है तो वह किस मुंह से कहता है कि समाज में कलमकारों पत्रकारों को उचित मान-सम्मान नहीं मिल रहा। यह प्रश्न भी अनुत्तरित ही है, याद रखिए  अगर हमने अपने दायित्वों का पालन नहीं किया तो भावी पीढि़यां हमें कदापि माफ नहीं करेंगी। जब हम अपनी कलम से किसान के दर्द को ,गरीब, मजदूर,, दलित-पिछड़ों और  परेशान युवा बेरोजगारों,उत्पीड़त महिलाओं की खबरों को प्राथमिकता न देकर धन्ना सेठों और राजनेताओं की चाटुकारिता में संलिप्त रहेंगें और निर्धनों दुखियों समस्याग्रस्त लोगों के प्रति तिरस्कार का भाव रखेंगें तो हाल ऐसा ही होगा तिरस्कार के शिकार खुद भी होंगें.

बदलते परिवेश में आवश्यकता इस बात की है कि हम आत्मचिंतन करें। हमें अपने मान सम्मान को बनाये रखने के साथ लोगों की कड़वी बातों को सुनने की भी आदत डालनी होगी. आम लोगो की समस्याओं भावनाओं को समझते हुए अपने दायित्वों को निभाना होगा. यह भी ध्यान रखना होगा की देश का  आम नागरिक हमसे अपेक्षा क्या कर रहा है . कहना न होगा आज ज्यादातर टी वी चौनलों में इस बात ही होड़ लगी है कि कौन अत्यधिक अश्लीलता, नग्नता और भोंड़ापन परोस सकता है। लगातार चौबीस घंटे चलने वाले इन चौनल्स में मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता और देश के परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण जारी है। पाश्चात्य जगत की देखा-देखी रीयल्टी शो दिखाये जाने लगे हैं। हास्य के नाम पर भोंड़ा हास्य सेक्स के साथ परोसा जा रहा है। सीरियल्स में नैतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। समाचारों के बारे में तो कहना ही क्या ? एक्सक्लूसिव के नाम पर एक ही समाचार सभी चौनल्स में तोड़मरोड़ कर दिखाये जा रहे हैं मालूम ही नहीं पड़ता कि यह समाचार कैसे एक्सक्लूसिव हो गया। भूत-प्रेतों के अजीब हंगामों से हमारे चैनल्स भरे पड़े हैं. प्रतिस्पर्धा ऐसी की एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का षड़यंत्र भी जारी है।  याद आता है वो दौर जब दूरदर्शन आरंभ हुआ तो उसने लोगों के स्वस्थ मनोरंजन के लिए बुनियाद, हमलोग, नुक्कड़, उड़ान, चन्द्रकांता, नीम का पेड़ आदि समाजोपयोगी तथा सकारात्मक धारावाहिक प्रसारित किये , रामायण, महाभारत, टीपू सुलतान जैसे सीरियलों ने अपार लोकप्रियता भी हासिल की। इसके बाद सास भी कभी बहू थी तथा घर घर की कहानी में जिस प्रकार नैतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाई गई उससे हमारे सांस्कृतिक मूल्य क्षरित हुए. बदलते दौर और बढ़ती प्रतिस्पर्धा से प्रिंट मीडिया भी अछूता नहीं रहा पत्र पत्रिकाओं ने प्रथम पृष्ठ पर अश्लील तस्वीरों,माडलों को प्राथमिकता देने में खुद को पीछे नहीं रहने दिया. वेब पत्रकारिता और सोसल मीडिया का तो कहना ही क्या, इन दिनों इसके बढ़ते चलन को  ध्यान में रखते हुए सारे अख़बारों और टीवी चैनलों ने अब तक उपेक्षित रहे अपने ऑनलाइन माध्यमों में अचानक ही पैसा लगाना शुरू कर दिया है. दुर्भाग्य से हिंदी भाषी वेब पत्रकारिता के बड़ा होने के इस दौर में सफल वेब पत्रकारिता की इकलौती कसौटी ‘हिट्स’ जुटाना बन गया है.यह खेल टीवी चैनलों की टीआरपी रेस से ज्यादा ख़तरनाक है, क्योंकि टीवी के फॉर्मेट की एक सीमा है कि वहां किसी खबर के साथ सिर्फ न्यूज चैनल ही खेल कर सकता है. लेकिन वेब पर मौजूद किसी भी सामग्री को एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय होने की सुविधा है.

इस बहुलता का सम्मान कर, इसे सही तरीके से इस्तेमाल करने की जगह हिंदी वेब पत्रकारिता क्या कर रही है ये देख ही रहें हैं ? ज्यादातर वेबसाइट्स का एक कोना बहुत ही घिनौने ढंग से सेक्स की कुत्सित चर्चा में लीन मिलता है और उनके मुख्य पन्नों पर भी जहां-तहां ऐसी ही छौंक दिखाई पड़ती है.ख़बरों को चटपटा बनाने का खेल धीरे-धीरे संपादकीय नीति का हिस्सा सा बनता जा रहा  है जिसके पीछे यह नजरिया काम कर रहा है कि अगर आप किसी विषय को गंभीरता से लेंगे तो पाठक भाग जाएगा. आज देश में किसानो और जवानों दोनों का बुरा हाल है ,महंगाई चरम पर है,भ्रष्टाचार की गति प्रवाह ले रही है, लोकतंत्र की धज्जिया उड़ रहीं हैं लेकिन हम लिख क्या रहे हैं दिखा क्या रहें है... मुहनोचवा व चोटी कटवा की खबरें, उजागर क्या कर रहें हैं पूर्व सरकार के क्रियाकलाप और घोटाले तथा मौजूदा सरकार की उपलब्धियां, जो की हमने पिछले सरकारों के दौरान किया,आखिर क्यों नहीं सरकार के रहते हम भ्रष्टाचार और घोटाले तक पहुँचते, उस दौरान क्यों सरकार की उपलब्धियों तक सीमित रह जाती है हमारी कलम, यह भले ही हम आप ना समझें लेकिन ये पब्लिक है सब जानती है अभी भी वक्त है आइये अपने कर्तब्य और दायित्व के निर्वहन की सही दिशा की ओर बढ़ें, देश की जनता से जुड़ें और दिनो-दिन कलमकारों,पत्रकारों के विलुप्त होते विश्वास को पुनःदेश के आम नागरिकों के बीच स्थापित करें सम्मान दे और सम्मान पायें भी.   



Browse By Tags



Other News