परिणाम की कसौटी पर खरे उतरते हैं अनुभव और ज्ञान के सहारे लिए गये निर्णय
| Rainbow News - Aug 27 2017 11:06AM

-रवीन्द्र अरजरिया/ देश के संविधान को लागू करने के लिए आन्तरिक सुरक्षा का दार-ओ-मदार सम्हाने वाले पुलिस विभाग में आज भी स्वाधीनता के पहले की अनेक व्यवस्थायें जस-की-तस लागू हैं। उर्दू, अरबी और फारसी सहित अंग्रेजी के अनेक शब्द अक्षरशः स्वीकारने के साथ-साथ अनेक धाराओं को भी बिना परिवर्तित किये अंगीकार कर लिया गया है। अनेक जगह तो स्वीकारे गये शब्दों से आज भी दासता की गंध आती है। बदलाव की बयार में आंशिक संशोधनों के कागजी जामा ने व्यवहारिकता में अभी तक प्रवेश नहीं किया है। इस तरह की परम्पराओं को आधुनिकता की दौड में बढ चला देश आखिर कब तक ढोता रहेगा। दासता की मानसिकता से तैयार किये गये कानून की अनेक धारायें वर्तमान समानता के युग में भी विभेद पैदा कर रहीं हैं। विचार मंथन के मध्य फोन की घंटी ने अपनी उपस्थिति का आभाष कराते हुए व्यवधान उत्पन्न कर दिया।

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी सतीश सक्सेना की आवाज उभरी। आत्मिक अभिवादन के आदान प्रदान के बाद मुलाकात का समय और स्थान निर्धारित हुआ। हम भी पुलिस विभाग के अन्तः में झाकने को बेताब थे, सो निर्धारित समय का ध्यान रखते हुए निर्धारित स्थान पर पहुंच गये। गर्मजोशी भरे स्वागत से दिल बाग-बाग हो उठा। आपसी कुशलक्षेम जानने-बताने के बाद हमने बिना भूमिका बांधे अपनी जिग्यासायें उनके सम्मुख रख दीं। उन्हें सन् 1983 का वह दिन याद आने लगा जब पुलिस विभाग में उन्होंने अपनी आमद दर्ज की थी। प्रशिक्षण अवधि से लेकर चल रहे सेवाकाल तक के निरंतर चल रहे खट्टे-मीठे क्षण चलचित्र की तरह चलने लगे। हमने उन्हें अतीत में डूबा देखकर वर्तमान की चेतना में वापिस लौटाया। परिवर्तनशील समाज के विभिन्न आयामों से गुजरने का अनुभव शब्दों में पिरोते हुए उन्होंने कहा कि परम्परायें आज यदि समाज में जीवित हैं तो फिर पुलिस विभाग इसका अपवाद कैसे हो सकता है। भले ही हम कम्प्यूटर युग में पहुंच गये हों परन्तु आमद-रवानगी, सम्मन-तामील, अदालत-कचहरी, मुवक्किल-गवाह जैसे शब्दों को हाशिये पर पहुंचाने में अभी समय लेगा। रोजनामचा से लेकर रोजमर्रा की जिन्दगी तक के अनेक शब्दों के बिना संवेदनाओं की दस्तक कमजोर हो जाती है। हमने उन्हें बीच में ही टोकते हुए कहा कि क्या यही कारण है जो आप जैसे वरिष्ठ अधिकारी जब किसी जिले के दौरे पर जाते हैं तो वहां विभागीय अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ सामूहिक संवाद को दरबार नाम दिया जाता है जिसमें बादशाहत का अहसास होता है।

आश्चर्यजनक नजरों से घूरते हुए उन्होंने कहा कि आपका शब्द सामर्थ एक अमोघ शस्त्र है जिससे किया गया प्रहार कभी खाली नहीं जाता परन्तु यहां हम स्पष्ट कर दें कि दरबार शब्द की जगह अब सैनिक सम्मेलन का सैद्धान्तिक उपयोग होने लगा है जिसे पूरी तरह व्यवहार में आने में वक्त लगेगा। हमने शब्द के मर्म में छुपी परिभाषा और परिभाषा में अर्थ की विशालकाय आत्मा का उल्लेख करते हुए कहा कि शब्दावली ही तो अपराधी से निर्दोष तक की यात्रा तय कराती है। दण्ड के विधान से लेकर क्षमादान तक का वातावरण निर्मित करती है, ऐसे में शब्द को गौढ कैसे किया जा सकता है। सरल और सपाट शब्दों का सहारा लेकर उन्होंने कहा कि यह सत्य है कि शब्द से समग्र की रचना होती है परन्तु स्वीकारे गये शब्द भी तो समानार्थी होकर व्याख्याओं तक में एकमत स्थापित करते हैं। यह कुछ ऐसी परम्परायें हैं जिन्हें समय के साथ ही परिवर्तित किया जा सकेगा। संवैधानिक दायरे का विस्तार, कभी समस्या तो कभी समाधान बनकर सामने आता है। ऐसे में स्वःविवेक से लिया गया तात्कालिक निर्णय ही परिस्थितिजन्य कारकों को नियंत्रित करने में सहयोगी बनता है। ऐसे निर्णय जहां एक ओर अनुभव की धार से तीखे होते हैं वहीं ज्ञान की ढाल से सुरक्षित भी। उन्होंने मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के मनासा सहित विभिन्न घटनाओं के दौरान तात्कालिक परिस्थितियों में लिये गये त्वरित निर्णयों का कथानकों सहित विवरण प्रस्तुत करके अपनी विवेचना को प्रमाणित किया।

विसम परिस्थितियों में जटिल समस्यायें उत्पन्न होने पर अपनाई जाने वाली कार्य शैली का खुलासा करने की हमारी बात के जबाब में उन्होंने सीधे शब्दों में वरिष्ठ मार्गदर्शन का जिक्र करते हुए कहा कि अनुभव और ज्ञान के सहारे लिए गये निर्णय ही परिणाम की कसौटी पर खरे उतरते हैं। हमने विभिन्न धाराओं का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए स्वाधीनता के पहले की स्थितियों को ही देश में बहाल रखने का कारण जानना चाहा तो उन्होंने अपने पद की गरिमा और अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का बंधन प्रगट करते हुए किनारा करने की कोशिश की। बातचीत चल ही रही थी कि नौकर ने कमरे में प्रवेश करके टेबिल पर काफी के साथ स्वल्पाहार सजाना प्रारम्भ कर दिया। व्यवधान उत्पन्न हुआ परन्तु तब तक हमारी जिग्यासाओं को काफी हद तक समाधान मिल चुका था। सो फिर कभी इस विषय पर चर्चा का आश्वासन देकर भोज्य पदार्थों का सम्मान करने लगे। फिलहाल इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।

 



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