शाश्वत अनुशासन के विरूद्ध जाने का परिणाम है प्राकृतिक विपत्तियां
| Rainbow News - Sep 3 2017 9:30AM

वैदिक संस्कृति के अभिन्न अंग के रूप में जीवन जीने की कला का पर्याय बनने वाले योग को वर्तमान में तेजी से स्वीकारने की होड लगी हुई है। नित नये अनुसंधानों के माध्यम से योग की न केवल वैज्ञानिकता प्रमाणित हो रही है बल्कि परा-विज्ञान से जुडी अनेक अनसुलझी पहेलियां भी सामने आ रही हैं। विज्ञान की सीमा से बहुत आगे तक की स्थितियों का विश्लेषण, योग के अनेक कारकों में मिल रहे हैं, जिन पर शोध कार्य किया जा रहा है। योग को विश्वव्यापी बनाने के लिए देश के नेतृत्व ने अथक परिश्रम किया और सार्थक परिणाम सामने आये। विश्व के अधिकांश देशों ने निर्विवाद रूप से योग के महात्व को स्वीकारा और उसे राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में मान्यता देने का क्रम भी चल निकला।

विभिन्न देशों के प्रवास के दौरान पूर्व के अनुभवों की तुलना में वर्तमान की प्रतिष्ठा कहीं ज्यादा गरिमामयी लगी। देश की नई नीतियों के व्यवहारिक स्वरूप के साथ-साथ योग ने राष्ट्रीय पहचान को एक नयी मंजिल तक पहुंचाया। मन में विचार चल रहे थे और हमारी गाडी इटली की आर्थिक राजधानी मिलान से बुलोनिया के लिए निकल पडी थी। इन दिनों हम विशेष आफीसियल कार्य हेतु अपने इटली प्रवास पर थे। अचानक हमें रास्ते में कुछ संकेतक दिखाई दिये, जिसमें विश्वस्तरीय योगगुरू डाक्टर जमुना प्रसाद मिश्रा के विशिष्ट आयोजन के लिए परमा शहर से 10 किलोमीटर दूर नवदुर्गा टेम्पिल जाने का रास्ता दिखाया जा रहा था। हमारी गाडी मिलान से लगभग 100 किलोमीटर दूर परमा पहुंच गयी। वहां का तो नजारा ही बदला हुआ था। परमा से 10 किलोमीटर दूर नवदुर्गा टेम्पिल तक का पूरा मार्ग योगगुरू और योग की उपयोगिता की होडिंग्स से पटा पडा था। हमने ड्राइवर से नवदुर्गा टेम्पिल चलने को कहा। डाक्टर जमुना प्रसाद मिश्र हमारे पूर्व परिचित है, जो हमें अपने छोटे भाई के रूप में स्नेह करते है और हम भी उन्हें बडे भाई का सम्मान देने से कभी पीछे नहीं रहे। आयोजन स्थल पर पहुंच कर हमने आयोजकों को तलाश कर उनसे योगगुरू से मिलने की इच्छा व्यक्त की तो उन्होंने हमसे पूर्व में समय निर्धारित करवाने के बारे में जानकारी मांगी। सो हमने उन्हें स्पष्ट रूप से बता दिया कि हम भी इण्डिया से हैं और वह हमारे बडे भाई हैं। हमारा कार्ड लेकर एक सज्जन अन्दर चले गये।

कुछ समय बाद उन्होंने बाहर आकर हमें सम्मान के साथ उनके विशेष कक्ष तक पहुंचा। उन से नजर मिलते ही अतीत की स्मृतियां चलचित्र की तरह चलने लगीं। उनके 140 विदेशी जोडों को वैदिक रीति से विवाह संस्कार में बांधना, विभिन्न बीमारियों का योग से उपचार करना, प्रकृति की गोद में योग की कठिन क्रियाओं का अभ्यास करना-कराना, हजारों साधकों को योगदीक्षा देने का लिए भव्य आयोजन करना आदि कृत्य सजीव हो उठे। उन्होंने नजदीक आकर हमें गले से लगाया, तब कहीं जाकर हमारी चेतनी वापिस लौटी। वे सहज भाव से बोले कि कहां खो गये थे भ्राताश्री। हमने उन्हें प्रणाम किया। कक्ष मे रखी विशेष चौकी पर उन्होंने आसन ग्रहण करते हुए हमें अपने नजदीक ही सोफे पर बैठने का इशारा किया। कुशलक्षेम तथा अचानक इटली आने का कारण पूछा। औपचारिकताओं से बाहर आकर हमने बिना लाग-लपेट के मन में चल रहे अन्तर्व्दन्द को प्रगट कर दिया। योग के वास्तविक स्वरूप को जानने की जिग्यासा प्रगट करते ही उनके मुखमण्डल पर एक रहस्यमयी मुस्कुराहट ने नृत्य करना शुरू कर दिया। ऋग्वेद की विभिन्न रिचाओं के अतिरिक्त पतंजलि के योग दर्शनम् सहित अनेक वैदिक ग्रन्थों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में योग के नाम पर उसके केवल एक या दो अंगों को ही विस्तारित किया जा रहा है।

वास्तव में योग की स्थापना भगवान शिव के व्दारा मानव के कल्याणार्थ की गई थी। इसमें भौतिक, साकार और निराकार के विशेष मिलन को यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान के मार्ग से समाधि के अन्तिम लक्ष्य तक पहुंचाने का अनुशासन दिया गया है। इस पूरी प्रक्रिया को अष्टांग योग के रूप में भी परिभाषित किया गया है। उन्हें विस्तार में जाता देख हमने बीच में ही टोकते हुए कहा कि वर्तमान में तो आसनों तक ही इसे सीमित कर दिया गया है। कहीं-कहीं प्राणायाम को भी योग के विशिष्ट भाग के रूप में सम्मलित किया गया है। इस आंशिक स्थापना के पीछे का क्या राज है। आधुनिक युग की विभिन्न जटिलताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भौतिक विलासता के पीछे दौडने वाली जीवित जीवनियां शारीरिक सुख की कामना में मानसिक और काया की बीमारियों की सौगात ले रहा है। धन के भण्डार पर बैठे अनेक लोगों को हमने तला, मसालेदार, लज्जत, स्वादिष्ट, मन की मांग के अनुरूप भोजन से कष्टपूर्ण पलायन करते हुए देखा है।

विलासता सम्पन्न लोगों पर चिकित्सकों का लगाया गया पीडादायक अंकुश महसूस किया है। शान्ति, सुख और आनन्द प्राप्ति के लिए वैभव के सिंहासन पर बैडे लोगों की ललचाई आंखों में मजबूरी के आंसूओं से साक्षात्कार किया है। शाश्वत अनुशासन के विरूद्ध जाने का परिणाम है प्राकृतिक विपत्तियां । प्रकृति शब्द पर हमने उनसे स्पष्टीकरण मांगते हुए कहा कि प्रकृति को लोगों की ईश्वर प्रदत्त विशेषता से लेकर वातावरणीय कारकों तक के अर्थों में निरूपित किया जाता है। प्रकृति को सारभौमिक तत्व के रूप में प्रकाशित करते हुए उन्होंने कहा कि यत्र, तत्र, सर्वत्र व्याप्त रहने वाले इस कारक को उसी प्रकार समझा जा सकता है जैसे कि एक मनुष्य की शारीरिक बनावट किसी दूसरे से शतप्रतिशत मेल नहीं खा सकती। इसको हम विभिन्न तत्वों के पृथक-पृथक मिश्रण सूत्रों की विविधता के रूप में भी देख सकते हैं। यही वह पहेली है जिस पर विज्ञान की स्पष्ट दृष्टिकोण स्थापित होने के अभी तक के सारे प्रयास निरथक ही रहे।

हमने चर्चा को विषयांतर होते देख उन्हें सीधे जिग्यासा पर केन्द्रित करते हुए कहा कि विभिन्न देशों में योग शिविर और योग संस्थान स्थापित करने के अनुभव और औचित्य को विस्तार से समझायें। विदेशों की जीवन शैलियों का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन को विलासता उपयोग के लिए व्यक्ति और वस्तु का उपयोग करने वाले चरम की चाह में चाम रहित होकर रह जाते हैं। स्वः पर तंत्र की स्थापना में असफल रहने वालों को विशेषज्ञों के कठोर तंत्र से होकर गुजरना पड रहा है। संस्कारों को समझौता मानने वाले समाज में ही योग की भूख सबसे ज्यादा है। वे वैदिक रीतियों, परम्पराओं, आदर्शों को अंगीकार करने में लगे हुए हैं और दूसरी ओर हम नवीनता की चाह में तात्कालिक मजे के लिए दूरगामी घातक प्रभावों वाले तत्वों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यह बेहद घातक ही नहीं बल्कि अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह अंकित करने वाली स्थिति बनकर उभर रही है। चर्चा चल ही रही थी कि आयोजकों ने आकर कार्यक्रम का समय नजदीक आने की सूचना दी तथा हमारे सम्मान में पौष्टिक स्वल्पाहार तथा पेय पदार्थ सामने रखी मेज पर सजाना प्रारम्भ कर दिया। व्यवधान उत्पन्न हुआ परन्तु तब तक हमारी जिग्यासा का एक बडा अंश संतुष्ट हो चुका था। अपनत्व भरे आग्रह पर उनके आतिथ्य में डाक्टर जमुना प्रसाद मिश्रा के साथ हमने मेज पर अपनी आमद दर्ज की। भोज्य सामग्री का सम्मान करने के बाद इस विषय पर निकट भविष्य में गहन विचार-विमर्श के आश्वासन के साथ हमने विदा ली। इस बार इतना ही। अगले हफ्ते एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।

 
 


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