अध्यात्म के मापदण्डों पर ही होता है सामाजिक संतुलन का निर्धारण
| Rainbow News - Sep 11 2017 11:41AM

जीवन के सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ अध्यात्म के औचित्य को लेकर मानसिक झंझावात चल रहा था। एकांतिक क्षणों में बिना बुलाये मेहमान की तरह उसकी उपस्थिति हो जाती। विचारों का उथल-पुथल शुरू हो जाता और लम्बी माथापच्ची के बाद भी परिणाम किसी राधा और नौ मन तेल, की कहावत में परणित हो जाता। हफ्तों से चल रहे इस घटनाक्रम ने सोच की दिशा में अस्थाई परिवर्तन कर दिया था। विभागीय कार्य से आज जल्दी आफिस जाना था कि तभी फोन की घंटी ने व्यवधान उत्पन्न कर दिया। फोन उठाने पर दूसरी ओर से हमारे पुराने मित्र तथा बुंदेलखण्ड के जाने-माने समाजसेवी आलोक चतुर्वेदी का अपनत्व भरा स्वर सुनाई दिया। उन्होंने औपचारिकताओं का निर्वहन करते हुए देश के कल्याणार्थ समर्पित गृहस्थ संत पण्डित देवप्रभाकर शास्त्री ‘दद्दा जी’ के 78वें अवतरण दिवस समारोह के आयोजन की जानकारी दी तथा खेलग्राम में सम्पन्न हो रहे इस विशाल कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए साधिकार कहा, जिसे टालना सम्भव नहीं था।

हम भी किसी ऐसे ही हस्ताक्षर की तलाश में थे जो हमारे मन में चल रहे वर्तमान झंझावात से मुक्त करा सके, सो निश्चित तिथि, समय और स्थान पर पहुंचकर हमने भी दो दिवसीय इस कार्यक्रम में अपनी भागीदारी दर्ज की। मुख्य कार्यक्रम के दौरान श्री चतुर्वेदी ने अचानक हमें मंच पर आमंत्रित कर दिया। चूंकि अनन्त चतुर्दशी के साथ उस दिन शिक्षक दिवस भी था और ‘दद्दा जी’ ने पूर्व में एक शिक्षक की भूमिका में रहकर राष्ट्र के भावी कर्णधारों को संस्कारवान बनाने का कार्य भी किया था। इस सब को आधार बनाकर हमने शिक्षा, संस्कृति और संस्कार से जोडते हुए अपने उद्बोधन को मूर्तरूप दिया। कार्यक्रम के उपरान्त ‘दद्दा जी’ के विशेष कक्ष में उनका सानिध्य प्राप्त हुआ। इस दौरान उनके विशेष कृपापात्र एवं शिक्षा के बहुआयामी पक्षों को तेजी से विकसित करने वाले अशोक दीक्षित सहित विभिन्न शिष्य भी उपस्थित थे, तभी अनुकूल समय मिलते ही हमने अपने मन में चल रही झंझावात से ‘दद्दा जी’ को अवगत कराया। उनके मुखमण्डल पर हमेशा नृत्य करने वाली मुस्कुराहट तनिक और गहरा गई। उन्होंने एक विशेष वेद-वाक्य को रेखांकित करते हुए कहा कि वैदिक संस्कृति ही संस्कारों की आधार शिला है, जिसका विकास होकर समाज का बृहदकारी स्वरूप निर्धारित हुआ है।

प्राकृतिक अनुशासन ही सर्वोपरि है जिसके अनुपालन में कोताही बरते पर कष्टप्रद परिणाम भोगने ही पडते हैं। अध्यात्म के मापदण्डों पर ही होता है सामाजिक संतुलन का निर्धारण। साधारणतया लोग अध्यात्म को सम्प्रदाय विशेष से जोडकर देखने लगते हैं, जबकि यह सत्य नहीं है। अध्यात्म तो समदर्शी, समभावयुक्त और समरसता का समुच्चय है, शाश्वत है। मानवीयता ही नहीं बल्कि जीव-प्रेम से लेकर प्रकृति-प्रेम तक के आदर्शों की स्थापना, पोषण और विकसित करके हस्तांतरित करने तक की त्रिचरणीयल प्रक्रिया है। हमारी बातचीत चल ही रही थी कि कुछ और शिष्यों ने आमद दर्ज की। आत्मिक सम्बोधन, सांत्वना और भावी जीवन की रूपरेखा को सूत्र रूप में समझाकर चन्द शब्दों में ही ‘दद्दा जी’ ने आगन्तुकों को संतुष्ट कर दिया। इसी दौरान हमें पता चला कि यहीं से वे हिमालय स्थित तीर्थों की यात्रा पर प्रस्थान करने वाले हैं। उनके साथ जाने के लिए उत्सुक हजारों शिष्यों में से केवल कुछ को ही अनुमति मिली है। शेष को आगामी दिनों में ले चलने का आश्वासन मिला। मौका मिलते ही हमने उनसे तीर्थ-यात्रा की आवश्यकता को आधार बनाकर प्रश्न कर दिया।

तीर्थों को अध्यात्मिक ऊर्जा भण्डार के रूप में परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि तपीय प्रक्रिया से गुजरे अनगिनत ऋषि-मुनियों के विकसित ऊर्जा चक्र के अंश आज भी वहां मौजूद हैं। इसी स्थल ऊर्जा को अपनी पात्रता के अनुरूप प्राप्त किया जा सकता है। अग्रजों के इस अनुदान से ओतप्रोत होने के लिए पवित्र तन और निःकपट मन का होना बेहद जरूरी है। उनका वाक्य पूरा हुआ ही था कि शिष्य मण्डल का एक बडे दल ने आकर उन्हें अन्य तैयारियां पूर्ण होने की सूचना देते हुए यात्रा हेतु प्रस्थान करने के समय की जानकारी दी। हमने भी अपनी बात को यहीं समाप्त करके फिर कभी इस विषय पर उनसे चर्चा करने हेतु अनुमति चाही, जिस पर उन्होंने ‘अपना ही घर’ समझकर कभी भी आने का अधिकार प्रदान किया। हमने उन्हें आत्मिक प्रणाम करके तीर्थ-यात्रा की शुभकामनायें प्रेषित की। हमें अपने झंझावात से काफी हद तक मुक्ति मिल गई थी। इस सप्ताह बस इतनी ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी, तब तक के लिए खुदा हाफिज।    

-रवीन्द्र अरजरिया



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