जाग रहा है जनतंत्र या सोने चला है लोकतंत्र।
| Rainbow News - Sep 14 2017 3:35PM

पूरा देश एक सुर मिला रहा था लोकपाल बिल के समर्थन में। अण्णा हजारे का आंदोलन। पूरे देश में आंदोलन की लहर चली।लगा जैसे देश जाग रहा है। जैसे एक नया सूर्य दूर क्षितिज से उग रहा है। हर कोई त्रस्त था भ्रष्टाचार से और आज भी है। क्योंकि भ्रष्टाचार में किसी तरह का आरक्षण नही होता। इसमें अल्पसंख्यकों के लिए भी कोई रियायत नही होती। उसके कुछ वर्षों बाद दिल्ली की निर्भया अपनी जान देकर हमें एक जुट कर गयी। निर्भया मामले ने आम से लेकर खास तक हर आत्मा को झकझोर कर रख दिया। हम फिर से जागे।इस बार सोशल मीडिया हमें जगाने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा।

इस बार हम हाथों में मोमबत्तियां लिए सड़कों पर थे। तब से सड़कों पर आना फैशन बन गया। सोशल मीडिया की व्यापक पहुँच ने इस फैशन को सदाबहार बना दिया। किसी ने 10 सालों तक मौन साधना का रहस्य समझाया तो किसी ने अच्छे दिन दिखाकर जगाया। सोशल मीडिया ने हमें बहुत सी चीजें दी। सबसे ज्यादा तो बोलने की आज़ादी। जिन्हें संविधान की उद्देशिका के बारे में नही पता वो लोग अनुच्छेद 19 (अ) में वर्णित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते नज़र आने लगे। बोलने की आज़ादी के नाम पर फूहड़ता होने लगी है। कोई किसी के लिए कोई भी शब्द का इस्तेमाल कर रहा है।

हम फिर जागे कभी पुरस्कार वापिस करने के लिए, कभी असहिष्णुता के मुद्दे पर अपनी राय देने के लिए।कभी दुष्कर्म पीड़िता के लिए हमने मोमबत्तियां जलाई तो एक दुष्कर्मी को सजा मिलने चार राज्यों में आग लगा दी। भंडारे खिला कर और फिल्में दिखा कर 'अंधभक्त' निर्माण का कारखाना लगा दिया। उन्हीं भीड़ में छिपकर वार करने वाले नपुंसकों ने 38 जानें ले ली। क्या यही है लोकतंत्र? इसका यह अर्थ तो हमने नही पढ़ा था; ये तो जनता का शासन होता है। लेकिन जनता तो भीड़ बन चुकी है और अभी 38 तो पहले गौमांस के नाम पर न जाने कितनों को लील चुकी है। अगर यही होता है जनता का शासन तो नही चाहिए। नही चाहिए अँधा जनसमूह। रक्त में उबाल है लेकिन शक्ति प्रदर्शन भीड़ तक ही सीमित है।उसे शक्ति कहना अपमान है पौरूष का। भीड़ द्वारा की गई हिंसा केवल और केवल कायरता है।

अरसे बाद अदालत और कानून के सख्त रवैये पर छाती चौड़ी हो गई। जिन दो कौड़ी के बाबा का चोलाधारी बलात्कारी गुंडों ने न्याय व्यवस्था को वाकई में अंधा समझ लिया था  उन लोगों को उस न्याय की मूर्ति ने ऐसा धोबी पछाड़ लगाया कि कटघरे में रहम की भीख मांगता नज़र आया। तीन तलाक पर ऐतिहासिक फैसले ने करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के साथ इंसाफ किया। निजता के अधिकार मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को भी बता दिया कि कोई भी क़ानून से बढ़कर नही है। मैं केवल मैं हूँ। मेरे बारे में जानने का हक़ किसे है और किसे नही ये मेरा अधिकार है।

लेकिन साथ ही कई सवाल है। क्या एक दुष्कर्मी को सजा दिलाने के लिए फिर किसी रामचंद्र छत्रपति को मरना होगा। तलाक लेने के हक़ में 70 साल लग गए, अभी और कितने साल लगेंगे घूंघट से बाहर निकलकर अपना जौहर दिखलाने में? गांधी की जरूरत है लेकिन इतना त्याग करे कौन? राणा प्रताप सा बनना है लेकिन घास की रोटी खाये कौन? कौन कहता है कि समाज जो बदलना है। बदलना है तो खुद को बदलो अपनी सोच को बदलो। असली वीर वही है जो स्वयं से लड़ना जानते है।

पुनश्च: धीरे-धीरे ही सही हमारा जागना ज़ारी है। अब हम वोट जाति देखकर नही विकास के नाम पर देना सीख रहे है। डोकलाम विवाद पर चीन को जो मुंहतोड़ जवाब दिया उससे चीन जैसे विस्तारवादी देश के हौंसले पस्त हो गए। दुनिया को दिखा दिया कि भले ही हमें आज़ाद हुए 70 साल हुए है लेकिन हमारी महानता 5 हज़ार साल पुरानी है। जो पौरुष सोया है सदियों से अब उसका जागना जारी है। लेकिन दुःखद है कि अधर्मी सलाखों के पीछे है लेकिन फिर भी उनका पूजन जारी है। आज़ादी के नाम पर फूहड़ता जारी है। धर्म के नाम पर धंधा जारी है। इमारत या कचरे के ढेर में दब कर मरना या फिर धर्म के नाम कट मरना जारी है। कहीँ जीने के लिए बच्चों को साँसे नही मिल रही तो एक बार फिर महानगर का डूबना जारी है। लोकतंत्र गहरी निद्रा से ग्रस्त है किंतु फिर भी केवल उम्मीद ही की जा सकती है कि हमारा जागना जारी है।

-Rohit Chedwal



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