हिन्दी को दिखावा नहीं, बढ़ावा चाहिए
| Rainbow News - Sep 14 2017 4:57PM

-ऋतुपर्ण दवे/ ‘हिन्दी’ के लिए ‘हिन्दी’ में कुछ किया जाए तो अच्छा लगता है। लेकिन जब सरहद के पार दीगर भाषा-भाषी कुछ करते हैं तो हम आश्चर्य मिश्रित भाव लिए ठगा सा महसूस करते हैं। वास्तव में जिस दिन हम अंर्तआत्मा से हिन्दी बोलने में हम गर्व महसूस करेंगे, सच में हिन्दी कहां से कहां पहुंच जाएगी। अभी हिन्दी दिवस पर देश भर में आयोजन सरकारी परिपत्र की औपचारिकता से अधिक क्या हैं? किया भी क्या जाए, यही तो है हिन्दी की सच्चाई और रस्म निभाई। ऐसे में भला हिन्दी की भलाई, विस्तार कैसे संभव है?

संविधान सभा ने भले ही 14 सितंबर 1949 को एक मतेन यह निर्णय लिया कि हिन्दी देश की राजभाषा होगी, लेकिन कड़वा सच यह कि आज भी हिन्दी पूरी तरह से कामकाज की भाषा नहीं बन सकी। दुख तो इस बात का है कि हिन्दी भाषी क्षेत्र के जनप्रतिनिधि ही अंग्रेजी में हिन्दी की समृध्दि की बाते करते हैं। हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका। संयोग और विडंबना देखिए, योग को 177 देशों का समर्थन मिला  जो भारत के लिए गर्व की बात है। लेकिन क्या हिन्दी के लिए 129 देशों का समर्थन नहीं जुटाया जा सकता?  सरहदों के पार जापान, मिस्त्र, अरब, रूस में हिन्दी को लेकर कुछ ज्यादा ही सक्रियता दिख रही है। यो गर्व और बेहद सम्मान की बात है। लेकिन यक्ष प्रश्न बस यही कि भारत में ऐसा क्यों नहीं हो?, यकीनन इसका जवाब बहुत ही कठिन होगा। अंग्रेजी बोलने में हमें गर्व होता है, हिन्दी बोलने में हीनता और जब तक इस भाव को हम पूरी तरह से निकाल नहीं देंगे, हिन्दी को सम्मान और सर्वमान्य भाषा के रूप में भला कैसे देख पाएंगे?

डॉ. मारिया नेज्येशी, हंगरी में हिन्दी की प्रोफेसर हैं। उन्होंने मुंशी प्रेमचंद पर पीएचडी की है। वो असगर वजाहत के हिन्दी पढ़ाने के लहजे से प्रभावित हुईं और हिन्दी सीख गईं। जर्मनी में हिन्दी शिक्षक प्रो. हाइंस वरनाल वेस्लर हिन्दी को समृध्द भाषा मानते हैं, जर्मनी की युवा पीढ़ी को भारतीय वेदों, ग्रन्थों, चौपाइयों, दोहों इत्यादि के जरिए इसका विस्तृत परिचय देते हैं। उनका मानना है कि हिन्दी के एक-एक शब्द का उच्चारण जुबान के लिए योग जैसा है। वैज्ञानिक और सॉफ्टवेयर कंपनियों के कई मुखिया भी इस बात को बेहिचक मानते हैं कि डि़जिटल भारत का सपना तभी पूरा हो पाएगा जब हिन्दी को सूचना और प्राद्योगिकी के क्षेत्र में अनिवार्य किया जाएगा।

एक आंकड़ा बताता है कि केन्द्र और राज्य सरकारों की 9 हजार के लगभग वेबसाइट्स हैं जो पहले अंग्रेजी में खुलती हैं फिर हिन्दी का विकल्प आता है। यही हाल हिन्दी में कंप्यूटर टायपिंग का है। चीन, रूस, जापान, फ्रान्स, यूएई, पाकिस्तान, बंगला देश सहित बहुत से दूसरे देश कंप्यूटर पर अपनी भाषा और एक फाण्ट में काम करते हैं। लेकिन भारत में हिन्दी मुद्रण के ही कई फाण्ट्स प्रचलित हैं। इनसे परेशानी यह कि अगर उसी फाण्ट का सॉफ्टवेयर, दूसरे कंप्यूटर में नहीं हो तो वो खुलते नहीं है, विवशतः हिन्दी मुद्रण के कई फाण्ट्स कंप्यूटर पर सहेजने पड़ते हैं। हिन्दी समाचार-पत्रों में रोमन शब्दों को लिखने का हिन्दी चलन भी खूब हो चला है। इसकी वजह शब्दों की निश्चित सीमा या आसान मायने, कुछ भी हो सकते हैं पर लगता नहीं कि यह भी हिन्दी के साथ अन्याय है?

रोमन लिपि के 26 अक्षरों की अंग्रेजी, देवनागरी लिपि के 52 अक्षरों पर भी अपना कब्जा जमाती  दिखती है। शायद इसका कारण अपनी स्वयं की सर्वमान्य भाषा को लेकर बंटा होना, राजभाषा के प्रति गंभीर नहीं होना ही है। हम स्वयं प्रान्त, भाषा और बोली को लेकर   धड़ेबाजी करते हैं और वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी को तरक्की का जरिया मान बैठे हैं। इस मिथक को तोड़ना होगा। काश पूरे भारत में संपर्क और सरकारी कामकाज की अनिवार्य भाषा हिन्दी  होती तो देश का मान भी बढ़ता और हिन्दी का सम्मान भी। जरूरत है सर्वमान्य ईमानदार पहल की। ऐसा हुआ तो हिन्दी की समृध्दि के भी अच्छे दिन आएंगे।

हम किसी भी प्रान्त, जाति, धर्म के क्षेत्रीय भाषा-भाषी क्यों न हों लकिन जब बात एक देश की हो तो भाषा व लिपि भी एक ही जरूरी है। प्रतीक्षा मात्र उसी दिन की है जब भाषा और पत्राचार का माध्यम बन हिन्दी, हमारे माथे की बिन्दी बने फिर हम चाहे मंगल में जाएं या उससे भी ऊपर, हमारी हिन्दी के प्यारे से बोल और देवनागरी का परचम वहां भी फहरे। इस पर अमल की जरूरत है और हो भी क्यों न क्योंकि भारत में वो भाषा हिन्दी ही तो है जो हर जगह, समझी और बोली जाती है बस जरूरत इतनी कि देशवासी इसे अंतर्मन से स्वीकारे।



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