प्रोत्साहन की ऊर्जा से सहज हो जाता है कठिन लक्ष्य भेदन
| Rainbow News - Sep 19 2017 11:52AM

जीवन की अठखेलियों के मध्य सिद्धान्तों को स्थापित रख पाना आसान नहीं होता। उतार-चढाव युक्त अनेक पडावों पर स्थिर रहकर जूझने का साहस रखने वाले ही अपनी सजीव गाथा से प्रेरणा के प्रकाश स्तम्भ बनकर आदरणीय बन जाते हैं। इन्हीं गाथाओं को गहराई से जानने की इच्छा जागृत हुई। जीवित न सही, जीवन्त कथानकों से ही साक्षात्कार करने पर उनके मर्म की बानगी मिलने की संभावना बलवती हो जाती है। ‘आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है’ वाली कहावत चरितार्थ होने लगी। मानसिक क्षुधा शांत करने के प्रयास चलने लगे। एक दिन कार्यालय से वापिस आते ही सेंटर टेबिल पर रखे आमंत्रण कार्ड पर नजर पडी। खोलकर देखा तो दिल खुश हो गया। हमारी खोज को लगभग पूर्णविराम लग गया था। स्वतंत्रता सेनानी एवं मध्य प्रदेश शासन के पूर्व मंत्री स्वर्गीय श्री जंगबहादुर सिंह की स्मृति में श्रद्धांजलि मंजूषा लोकार्पण समारोह का आयोजन किया जा रहा था। कार्ड देखते ही उनके जीवन से जुडे संस्मरणीय कथानकों का क्रम चलचित्रों की तरह चल निकला।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों का स्वतंत्रता आंदोलन में कूदना, आंदोलन की अगवाई कर रहे छात्र नेता जंगबहादुर का गोरों की गोली से घायल होना, बिना बेहोशी के ही गोली निकलने की चिकित्सकों से जिद करना जैसी जन-प्रचलित घटनायें सजीव हो उठी। तभी फोन की घंटी ने व्यवधान उत्पन्न किया। दूसरी ओर से पूर्व विधायक तथा स्वर्गीय श्री जंगबहादुर सिंह की धर्मपत्नी गायत्री देवी परमार का स्वर सुनाई दिया। उन्होंने आमंत्रण मिलने की जानकारी लेते हुए आवश्यक विचार-विमर्श हेतु मिलने की इच्छा व्यक्त की। ‘अंधा क्या चाहे, दो आंखें’ प्रत्यक्ष हो उठी। हम भी तो तलाश रहे थे प्रेरणा के प्रकाश-स्तम्भ बन चुके किसी आदरणीय के कृत्यों के मर्म बताने वाला। तत्काल स्वीकृति देते हुए अगले ही दिन का समय निर्धारित कर लिया। निश्चित समय और स्थान पर हम आमने-सामने थे। आत्मिक अभिवादन के बाद कुशलक्षेम पूछने-बताने की औपचारिकतायें निभाई गयीं। श्रीमती परमार ने आयोजन को लेकर गहराई से चर्चा की।

विभिन्न पहलुओं को अन्दर से खंगाला गया। उनकी अपेक्षायें पूरी करने के बाद हमने अपनी जिग्यासा से उन्हें अवगत कराया। छात्र जीवन से ही दासता के विरुद्ध जंग छेडने वाले जंगबहादुर सिंह के अनेक कथानकों का सजीव चित्रण करने से पहले ही वे चलती सांसों के साथ अतीत की गहराइयों में डूबतीं चलीं गईं। अंग्रेजों के जुल्मों के नीचे कराहते देश को जाग्रत करने के लिए संकल्पित मन का उत्साह देखते ही बनता था। क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने से लेकर आम नागरिकों को संगठित करने तक का जिम्मा जंगबहादुर की बहुमुखी प्रतिभा को देखते हुए सौंपा गया था। इसी क्रम में वे जब मुरादाबाद में एक गुप्त प्रशिक्षण शिविर चला रहे थे तभी उनकी मुलाकात बिन्दारपुरा मुहल्ला निवासी तनसुख राय भाल से हुई। इस युवा क्रांतिकारी नेता की समग्र प्रतिभा का मूल्यांकन करने के बाद उन्होंने अपनी पुत्री गायत्री का विवाह देश को समर्पित सेनानी से करने का निश्चय किया। युवा की माताश्री राजा साहिबा के साथ लम्बे समय तक पत्राचार चलता रहा।

स्वतंत्रता के लक्ष्य भेदन के उपरान्त दहेजरहित विवाह से लेकर पर्दारहित रह-सहन की अनेक शर्तों के साथ आडम्बर बन चुकी मान्यताओं को दरकिनार करते हुए आर्य समाज पद्धति से दौनों का पाणिग्रहण सम्पन्न हुआ। उन्हें स्वर्गिम अतीत की मधुर स्मृतियों के सुखद स्पन्दन से बाहर निकालते हुए हमने स्वर्गीय श्री सिंह की प्रेरणादायक घटनाओं के उत्तरदायी कारकों को रेखांकित करने आग्रह किया। वे चौंक कर सचेत हुईं, मानो किसी ने उन्हें निद्रा से जगा दिया हो। यादों के दरिया में गोते लगाने के लिए उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें समझ पाना हमारे लिए सम्भव नहीं था। उन्होंने अपनी जीवन शैली से लेकर संबंधों की कसौटी तक को कठोर अनुशासन के तहत संतुलित कर रखा था। आदर्शों के प्रति सजगता, सिद्धान्तों के प्रति सजगता और लक्ष्य के प्रति समर्पण ही उनकी सांसों का आधार था।

स्वाधीनता संग्राम के दौरान जब अनेक कुटुम्बीजन उन्हें हतोत्साहित करते तब उन्हें देश के आंदोलन से जुडा शीर्ष नेतृत्व नई ऊर्जा प्रदान कर देता। देश के भाल पर चमकने वाले अनेक हस्ताक्षर ने उन्हें पत्रों के माध्यम से साहस का पोषाहार भेजते रहते। नई जिम्मेवारियां, नये लक्ष्य और नयी विधा को स्वीकारने में उन्हें बेहद आनन्द आता था। प्रोत्साहन की ऊर्जा से सहज हो जाता है कठिन लक्ष्य भेदन। चर्चा चल रही थी कि तभी हमारे सामने रखी टेबिल पर नौकर ने चाय और स्वल्पाहार सजाना शुरू कर दिया। व्यवधान उत्पन्न हुआ किन्तु तब तक हमें मन में उथल-पुथल मचा रखी जिग्यासा को काफी हद तक शांत करने का उपाय मिल गया था, सो चाय और स्वल्पाहार का सम्मान करने का बाद इस विषय पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करने का आश्वासन देकर उनसे विदा ली। इस सप्ताह बस इतनी ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी, तब तक के लिए खुदा हाफिज।    

-रवीन्द्र अरजरिया



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