अम्बेडकरनगर के डी.डी. ए.जी. विनोद कुमार एक दशक में दूसरे सबसे धाकड़ और शौकीन अधिकारी
| Rainbow News - Sep 27 2017 3:39PM

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ 15 अगस्त 2003 से 2015 तक जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुँच कर जमींदोज होने की कगार पर पहुँच चुके कृषि भवन की इमारत का जीर्णोद्धार करने वाले विनोद कुमार को अवश्य ही एक अत्यन्त सुलझा और दूरगामी सोच रखने वाला माना जाएगा। विनोद कुमार हैं कौन? यह हमें भी नहीं मालूम था, परन्तु जनपद के किसानों और इनकी कार्यशैली से प्रभावित विभागीय कर्मचारियों ने बताया कि ये उप कृषि निदेशक पद पर आसीन हैं। लगभग 30 वर्ष पूर्व निर्मित कृषि भवन की इमारत जो अपने शुरूआती दिनों में उपसंभागीय अधिकारी (कृषि प्रसार) अकबरपुर का कार्यालय था, कालान्तर में 29 सितम्बर 1995 को अम्बेडकरनगर जिला बनने के बाद इसे जिलाधिकारी कार्यालय बना दिया गया, तत्समय पूरे अकबरपुर में मात्र यही एक ऐसी इमारत थी, जिसमें प्रदेश सरकार को नवगठित जनपद अम्बेडकरनगर का कलेक्ट्रेट स्थापित करने के लिए सोचना पड़ा।

29 सितम्बर 1995 से 15 अगस्त 2003 की शाम तक कलेक्ट्रेट के रूप में गुलजार रहने वाला यह भवन सरकारी आदेश के चलते कृषि महकमें को पुनः दे दिया गया, जिसमें जिला कृषि अधिकारी बतौर मुखिया बैठने लगे। कुछ वर्ष उपरान्त जिले के किसानों का हित सर्वोच्च रखकर काम करने वाली सरकारों ने यहाँ के कृषि महकमें की बागडोर उप कृषि निदेशक पद नाम वाले अधिकारी के हाथों में सौंप दिया। तब से लगभग आधा दर्जन अधिकारी इस पद पर आए और स्थानान्तरित होकर चले गए। उनका नामलेवा इस लिए भी कोई नहीं है क्योंकि उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया जो उत्कृष्ट कहा जाए। लगभग 3 वर्ष पूर्व उप कृषि निदेशक पद पर नियुक्त वरिष्ठ कृषि अधिकारी विनोद कुमार ने किसी भी प्रकार के दबाव और परिणाम की चिन्ता किए बगैर किसान हित के साथ-साथ विभागीय कर्मियों और जीर्णावस्था को प्राप्त कृषि भवन की दशा को सुधारने में रूचि दिखाई। हालाँकि इनके द्वारा किए गए इस पहल का परोक्ष रूप में काफी विरोध भी हुआ, लेकिन इन सबसे बेफिक्र कृषि महकमें के उच्चाधिकारी ने ‘‘जो ठाना सो कर दिखाया’’ को चरितार्थ करते हुए कृषि भवन का जीर्णोद्धार किया।

कलेक्ट्रेट के शिफ्ट होने के उपरान्त यह भवन इस कदर दर्दुशाग्रस्त हो गया था परिसर में झाड़-झंखाड़ व कटीली झाड़ियाँ उग आई थी, भवन की छत से पानी टपकता था, इमारत अब गिरी की तब गिरी की स्थिति में पहुँच गई थी। जिसे इस अधिकारी ने गम्भीरता से लिया और गन्दगी व झाड़-झंखाड़ हटवाकर, भवन की मरम्मत करा इसे इस काबिल बना दिया कि किसी भी अनहोनी से डरे बगैर कृषि विभाग के अधिकारी/कर्मचारी यहाँ आराम से बैठकर विभागीय कार्यों का सम्पादन/निष्पादन कर रहे हैं। कृषि भवन के बाहर लगी गन्दगी का डम्प हटवाकर मुख्य द्वारा के दोनों तरफ साफ-सफाई करवाकर इसे आकर्षक बना दिया।

कृषि भवन के बाहर अनधिकृत रूप से अतिक्रमण करने वालों के बुलन्द हौंसले पस्त हो गए। विनोद कुमार ने इसका लुक ऐसा कर दिया कि दूर से ही देखने से पता चल जाता है कि यही कृषि भवन है जो किसी जमाने में जिलाधिकारी कार्यालय हुआ करता था। इसके अलावा विनोद कुमार ने कृषि उप निदेशक के चैम्बर को भव्य आकर्षक बनाने के साथ-साथ उसमें वातानुकूलित उपकरण भी लगवाया है। कुल मिलाकर जो भी कृषि भवन का वर्तमान स्वरूप देखता है वह सोचने पर विवश हो जाता है कि इसका कायाकल्प करने वाला स्वच्छता, सुन्दरता का हामी एक दूरदृष्टि वाहक ही है। सुना गया है कि उप कृषि निदेशक विनोद कुमार के चैम्बर की तारीफ वर्तमान जिलाधिकारी अखिलेश सिंह (आई.ए.एस.) ने भी किया।

विनोद कुमार की कार्यशैली देखकर हर किसी की जेहन में डेढ़ दशक पूर्व इस जनपद में रह चुके कलेक्टर आर.पी. शुक्ल (आई.ए.एस.) का अक्स उभर कर सामने आ जाता होगा, क्योंकि वह (श्री शुक्ल) भी ऐसा ही कार्य करते थे, जिसे किसी ने न किया हो और न सोचा हो। वह अपने कार्य से जहाँ सभी को प्रभावित करते थे वहीं लोगों के लिए एक उदाहरण भी प्रस्तुत करते थे। आर.पी. शुक्ल जिले के हाकिम थे, उनके बारे में जितना भी लिखा जाए वह कम ही होगा। विनोद कुमार उप कृषि निदेशक एक महकमें के मुखिया वरिष्ठ कृषि विज्ञानी व अधिकारी हैं। इनकी तुलना एक आई.ए.एस. से करके इनको कमतर आंकना यहाँ उद्देश्य नही है। सम्भव है कि अपनी कर्मठता, लगन व ईमानदारी से ये बहुत आगे निकल जाएँ। तब लोगों के लिए ये अवश्य ही आदर्श रूप में अपनी गणना कराएँगे।

अम्बेडकरनगर जनपद में एक दशक पूर्व सी.डी.ओ. पद पर तैनात हृदय शंकर चतुर्वेदी का भी जिक्र करना आवश्यक हो जाता है। चतुर्वेदी ने अपने कार्यकाल में क्या किया, क्या नहीं किया इसकी चर्चा करना उतना प्रासंगिक नहीं होगा जितना यह कि उन्होंने अपने चैम्बर को वातानुकूलित व खुशबूदार बना रखा था। तत्समय उनके चैम्बर का यह लुक लोगों में काफी चर्चा का विषय बना हुआ था। साफ-सफाई और सजावट व महक चतुर्वेदी की एक अलग पहचान बनाता था। इतर और अन्य रासायनिक उच्च ब्राण्ड के परफ्यूम का प्रयोग करना उनका शगल था। लोगों ने उनके इस शौक केे उन्हें नखलउवा नवाब कहना शुरू कर दिया था। लोग तो यहाँ तक कहते थे कि कौन उनके बाप का पैसा जा रहा है या उनकी जेब या खून-पसीने की कमाई का जा रहा है। जिले के विकास महकमें के मुखिया हैं, जनता के लिए आये सरकारी धन का सदुपयोग कर नफासत भरी जिन्दगी जी रहे हैं।

इस शौक के मामले में उस समय यहाँ तैनात जिला मजिस्ट्रेट भी हृदय शंकर चतुर्वेदी से काफी पीछे हुआ करते थे। जानकारों का तर्क है कि सरकार द्वारा ऐशो-आराम के लिए किसी भी सरकारी मुलाजिम को फाण्डिंग नहीं दी जाती है ऐसा करने वाला अधिकारी अपने दम पर व्यक्तिगत तौर पर करता है। तत्समय ए.डी.एम. हुआ करते थे एस.पी. आनन्द, उनसे पूछा गया कि क्या आप बता सकते हैं कि जिले में कितने सरकारी मुलाजिमों को ए.सी. लगवाने का सरकार की तरफ से प्रावधान है? उन्होंने कहा था कि इसकी जानकारी तो मुझे नहीं है हाँ यदि देखना है तो आकर मेरा चैम्बर देख लीजिए आपको स्वयं पता लग जाएगा कि कम से कम ऐसी सुख-सुविधा उनके चैम्बर में नही है, और न ही उन्होंने इस तरफ ज्यादा ध्यान ही दिया। उनका कहना था कि जिस कार्य के लिए मुझे यह पद दिया गया है मैं उसका बखूबी निर्वहन कर रहा हूँ।

इसी अवधि में जिले में स्वास्थ्य विभाग की कमान सी.एम.ओ. के रूप में डॉ. लियाकत अली साहेब संभाला करते थे। दिन भर में सैकड़ो उच्च कोटि के पान-मसाले व महंगा पान चबाना उनका शौक हुआ करता था। बहैसियत एक कलमकार मैंने डॉ. लियाकत अली साहेब को मुख्य किरदार में रखते हुए एक आर्टिकिल लिखा था जिसका शीर्षक कुछ यूँ था- ‘‘पीकदान वाले चचा जान’’। स्पष्ट कर दूँ कि जऩाब मोहतरम लियाकत जी ने अपने चैम्बर में रखे गए बड़े डस्टबिन को पीकदान बना रखा था, जिसमें वह मुँह में रखी हुई पान की गिलोरियाँ व उसका पीक डाला करते थे। बड़े निर्भीक व्यक्ति थे। उन्हें इस बात की जरा भी परवाह नहीं थी कि कैंसर के बचाव के लिए जो विभाग जन जागरूकता पैदा कर रहा है या फिर उसके बचाव के लिए जिम्मेदार है उसी का जिला मुखिया स्वयं कैंसर उत्पादक सामग्रियों का सेवन धड़ल्ले से कर रहा है। सी.एम.ओ. डॉ. लियाकत अली का यह शौक उनके अधीनस्थों व प्रियजनों काफी पसन्द आता था।

लगभग 18 साल पहले की बात है उस समय प्रदेश में ग्राम पंचायत चुनाव का दौर  चल रहा था, जिलाधिकारी थे सुरेन्द्र बहादुर सिंह। उमस और गर्मी से जन-जीवन बेहाल था। पर्यवेक्षक के रूप में शासन से सचिव स्तरीय अधिकारी मंजीत सिंह (आई.ए.एस.) जिले में तैनात किए गए थे। मैंने ऐसे ही प्रसंगवश जिलाधिकारी से कहा कि आपके चैम्बर में ए.सी. क्यों नहीं लगा है, क्यों नही लगवा लेते (यह प्रश्न मैंने जिलाधिकारी से तब किया था जब पर्यवेक्षक के सुख-सुविधा के दृष्टिगत कलेक्ट्रेट में फौरी तौर पर ए.सी. लगवाया गया था, और उनके प्रवास की व्यवस्था ए.टी.पी.सी. विद्युतनगर गेस्टहाउस के वातानुकूलित कक्ष में की गई थी) तो उन्होंने कहा था नौकरी करना आसान नहीं है, किसी भी कलेक्टर या सरकारी मुलाजिम को ऐसा करने की छूट नहीं है। उनके इस कथन से मैंने चुप्पी मार लिया था।

सोचने लगा था कि क्षत्रिय जाति का अफसर या अन्य सरकारी मुलाजिम बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखता है। उसकी नौकरी न चली जाए उसे हमेशा इसका डर बना रहता है इसलिए वह कोई भी ऐसा कार्य नहीं करता जिससे उसके क्षत्रित्व से उसकी नौकरी पर कोई आँच आए। शौकीन और धाकड़ किस्म के सरकारी मुलाजिमों का जिक्र करना इस आर्टिकल में इसलिए भी आवश्यक है कि बदले हुए सिनेरियो में यह कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि कौन सरकारी आदेशों का माखौल उड़ा स्वेच्छाचारी बनकर अपनी वाली कर रहा है और कौन कथित व तथाकथित कर्मठ, ईमानदार सरकारी मुलाजिम है।

उप कृषि निदेशक विनोद कुमार के बारे में आगे बढ़ने के क्रम में यह बताना लाज़िमी हो गया है कि कुछ असंतुष्ट लोगों ने उन पर कई ऐसे आरोप भी लगाए जिनसे प्रभावित हुए बगैर अपनी कार्यकुशलता के चलते ये अपना कार्य बदस्तूर जारी रखे हुए हैं। इस समय सरकारी योजना ‘फसली ऋण मोचन योजना’ की वजह से इनकी व्यस्तता बढ़ गई है। वर्कलोड के बावजूद भी विनोद कुमार किसान हित को सर्वोच्च रखते हुए अपने आकर्षक, भव्य सजावट युक्त वातानुकूलित कक्ष में बैठकर कार्य दिवस में अपने कार्यों का सम्पादन/निष्पादन करते देखे जाते हैं। इनके चेहरे पर किसी भी तरह की सिकन नहीं देखने को मिलती है। अपने चैम्बर में आने वाले आगन्तुक का हंसकर स्वागत करना और अपनी विशेष स्टाइल से अधीनस्थों को हैण्डल करना उनकी खासियत है।

विनोद कुमार पर सबसे पहले यह आरोप लगा कि वह सवर्णों की अनदेखी करते हुए पिछड़ों को ज्यादा तरजीह देते हैं। हालांकि यह आरोप दबी जुबान से लगा था जिसमें यह भी कहा गया था कि इन्होंने एक अखबार के सम्पादक को लाखों रूपए का विभागीय विज्ञापन दिलाकर आर्थिक लाभ पहुँचाया और निरंकुश होकर विभागीय कोष में जमा जनता के पैसों का जमकर दुरूपयोग भी किया। यही नहीं इन्होंने मीडिया जगत से जुड़े अभिनव लोगों को ऐसा सबक भी सिखाया जो उनके धाकड़ प्रवृत्ति का सबूत देता है। नए मीडिया परसन्स को उन्होंने बेलौस होकर पत्रकारिता सीखने की सीख दिया, जिसे युवा वर्गीय लोगों ने अवश्य ही अन्यथा लिया होगा परन्तु उक्त सीख को अनदेखा नहीं किया जा सकता। हालाँकि इन्होंने अपने ऊपर लगने वाले सभी आरोपों को सिरे से यह कहते हुए खारिज किया है कि निराधार आरोप वे लोग लगा रहे हैं जो कहीं न कहीं उनके कार्यशैली व अनुशासन से असंतुष्ट हैं। कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए कि जिले में एक दशक के बाद कोई धाकड़, स्वच्छता पसन्द व शौकीन मुलाजिम है तो वह हैं उप कृषि निदेशक पद पर आसीन विनोद कुमार। 



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