असली हीरो भगत सिंह
| Rainbow News - Sep 28 2017 12:26PM

कोई व्यक्ति हीरो हो कर पैदा नहीं होता बल्कि समाज में व्याप्त विभिन्न प्रकार के अन्याय, अत्याचार, शोषण व जुल्म के खिलाफ संघर्ष कर के, इंसानी मूल्यों को अर्जित करके समाज का हीरो हो जाता है।भगत सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं, वे ही हमारे हीरो है। उनका जन्म  28 सितंबर 1907 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के लायलपुर जिले के बंगा ग्राम में हुआ था। उनके पिता किशन सिंह एक देशभक्त क्रांतिकारी थे और माता विद्यावती कौर एक निडर एवं साहसी महिला थी। भगतसिंह के जन्म के दिन ही उनके चाचा स्वर्ण सिंह और अजीत सिंह जेल से रिहा हुए थे तथा उनके पिता किशन सिंह नेपाल से लौटे और सरकार के खिलाफ बगावत के आरोप में चलाए गए मुकदमे में जमानत छूटे थे।

इसलिए नवजात बालक की दादी ने उसे भागो वाला कहा और उसका नाम भगत सिंह रख दिया। भगत सिंह ऐसे परिवेश में पले-बढ़े की धीरे-धीरे उन पर क्रांतिकारी आन्दोलन का प्रभाव पड़ने लगा। घर का ऐसा माहौल मिला उनको जिससे अंग्रेजों के प्रति नफरत, उनके मन में इतनी गहराई तक पहुंच गई थी कि जिसका प्रतिबिंब उनके बालसुलभ खेलों में भी झलकता था। एक दिन जब वे खेत में खेल रहे थे तो प्रसिद्ध राष्ट्रवादी मेहता आनन्द किशोर जी ने उन्हें मिट्टी में तिनके गाड़ते देखकर पूछा कि 'बेटा क्या कर रहे हो? 'भगतसिंह ने गर्व से जबाब दिया-' बंदूके बो रहा हूं।'फिर मेहता जी ने पूछा-' ऐसा क्यों कर रहे हो बेटा?'
"अपने मुल्क को आजाद करने के लिए"-भगतसिंह का जबाब था। छोटे, अबोध बालक के मुंह से ऐसा जबाब सुनकर मेहता जी पहले तो दंग रह गए मगर बाद में शायद उन्हें भी यह महसूस हुआ होगा कि यह बालक आगे चलकर निश्चय ही असाधारण बनेगा।

जलियांवाला बाग  हत्याकांड के समय वे छात्र थे।इस हत्याकांड से पूरा देश तड़प उठा था।भगत सिंह पर भी इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा।जलियांवाला हत्याकांड में बड़ी संख्या में की गई हत्याओं तथा अंग्रेजी हुकूमत द्वारा अपनाए गई घृणित तौर तरीकों और निहत्थे आम लोगों पर हुए इस बर्बर अत्याचार के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने में समझौतावादी धारा की विफलता के कारण भगत सिंह स्वतंत्रता सेनानी बनने की ओर अग्रसर हुए।दरअसल भारतीय आजादी आन्दोलन शुरूआत से ही दो विपरीत धाराओं में विकसित हुआ।गांधी जी और उनके अनुयायियों  के नेतृत्व समझौतावादी धारा विकसित हुई।दूसरी ओर थी गैरसमझौतावादी धारा जो खुदीराम से आगे बढ़ते हुए गौरवपूर्ण संघर्षों से विकसित होते हुए नेताजी के नेतृत्व में आईएनए द्वारा अंग्रेजों से लड़े गए ऐतिहासिक युध्द के रूप में शिखर तक पहुंची।

भगत सिंह ने अपने अदम्य साहस और बुलन्द इरादों से बहुत ही कम उम्र में ही क्रांतिकारियों में विशिष्ट स्थान हासिल कर लिया था।उन्होंने न केवल देश की परिस्थितियों को गम्भीरता से समझा बल्कि क्रांतिकारी आदर्श को एक वैचारिक आधार दिया।उन्होंने पूरे स्वतंत्रता आन्दोलन का मूल लक्ष्य क्या हो और इसे कैसे हासिल किया जाए, के सम्बन्ध में एक सटीक अवधारणा देने की कोशिश की।शोषित -पीड़ितों के प्रति उन के मन में गहरा प्यार ही उन्हें क्रांतिकारी जीवन में खींच लाया था तथा शोषण करने वालों के प्रति सशस्त्र संघर्ष में शामिल होने हेतु प्रेरित किया किया था।इसलिए उन्होंने कहा था, "क्रांति से हमारा अभिप्राय व्यक्तिगत हिंसा नहीं है और न ही खून खराबा हमारा उद्देश्य है।यह बम और पिस्तौल की पूजा नहीं है।

क्रांति से हमारा अभिप्राय है कि शोषण और अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था का आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए।"उनका सपना एक ऐसी व्यवस्था का था जहां किसी व्यक्ति के द्वारा दूसरे व्यक्ति का शोषण न हो।जहां किसी को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए तरसना न पड़े। भगत सिंह का जीवन एवं चरित्र इस बात का सशक्त प्रमाण है कि क्रांतिकारी राजनीति दर्शन और वर्ग संघर्ष के साथ जुड़कर एक उच्चतर संस्कृति का निर्माण करती है।जोकि उनके रोजमर्रा के जीवन तथा दूसरों के साथ  संबंधों में दिखाई पड़ता था।साथियों के बीच सुन्दर आपसी संबंध, उनकी विनम्रता एवं दूसरों के प्रति उनका गहरा प्यार अनगिनत उदाहरण एवं घटनाओं में साफ झलकता है।किसी भी महान व्यक्ति की पृष्ठभूमि में सामाजिक परिस्थिति सक्रिय रहती है।कोई पैदा होते ही महान नही बनता,महान व्यक्तित्व  संघर्षमय प्रक्रिया की उपज होता है।

-वीरेन्द्र त्रिपाठी, लखनऊ, मो- 9454073470



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