यहाँ की एकता बनी मिशाल, जहाँ राजनीति की नहीं गल रही है दाल
| Rainbow News - Sep 30 2017 2:37PM

-रिजवान चंचल/ विविधता में एकता इस देश की विशेषता रही है भले ही अलग अलग सियासी दलों द्वारा हिन्दू-मुस्लिम, अगड़ा- पिछड़ा, दलित-सवर्ण की संकीर्ण राजनीति कर अंग्रेजो की नीति फूट डालो राज़ करो की घृणित चालें स्वार्थ लोलुपता में चली जातीं रही हों ! कहना न होगा मौजूदा समय में जहाँ सियासतदां स्वार्थहित में लिप्त येन-केन-प्रकारेण सत्ता हथियाने के लिए जातिगत कार्ड खेल एक दूसरे के बीच  मतभेद-मनभेद पैदा कर समाज को विघटित करने पर आमादा है वहीं इन सियासतदानों के मंसूबों से इतर देश-प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में आज भी जातिगत भावना से ऊपर उठ हिन्दू-मुस्लिम कंधे से कन्धा मिला इकजहती व भाईचारे का पैगाम देने में पीछे नही हैं जिसके चलते इकजह्ती के आगे सियासी शोले भी फीके नज़र आते हैं !

देश का बड़ा हिस्सा आज भी आपसी सौहार्द भाईचारा और इकजहती का कायल है जो इस तरह की संकीर्ण सियासत करने वालों के मंसूबों पर पानी फेर रहा है. गंगाजमुनी तहजीब को  अपने आँचल में समेटे नबाबी शहर लखनऊ के बसीरत गंज में बने हिन्दू इमामबाडा किसनू खलीफा की ताज़ियेदारी देखती ही बनती है जो की हिन्दू मुस्लिम एकता की बेजोड़ मिसाल है यहाँ बड़ी संख्या में हिन्दू वर्ग के लोग ताज़ियेदारी और मातम में शिरकत कर आयोजित मजलिसे हुसैनी को सुनते हैं मौजूदा समय इस इमामबाड़े में ताज़ियेदारी किसनू खलीफा के पारिवारिक सदस्य हरिश्चंद्र करते हैं 28 सितम्बर को मजलिसे हुशैनी को यहाँ  मौलाना जावेद हैदर जैदी जैद्पुरी द्वारा जब खिताब किया जा रहा था तो तमाम हिन्दू भाइयों की आँखों से आंसू टपक रहे थे मजलिस में हरिश्चंद्र के रिश्तेदारों के अलावा यहाँ बड़ी संख्या आस पास के हिन्दू भाई मजलिसे हुसैनी में सिरकत करने पहुंचें थे किसनू खलीफा इमामबाड़े की सजावट हिन्दू मुस्लिम एकता की गवाही दे रहा था कही दुर्गा जी की फोटो लगी थी तो कहीं मैदाने कर्बला की भी तस्वीरें हिन्दू मुस्लिम एकता की गवाही ए रहीं थी हमने जब हरिश्चंद्र से मिलकर इकजह्ती की मिशाल बने किसनू खलीफा इमामबाड़े के इतिहास के बारे में जानकारी ली तो उन्होंने बताया की हमारे पूर्वजों के समय से यहाँ ताजियेदारी होती चली आ रही है

इस इमामबाड़े को सन 1880 में पूर्वज गयादीन व किसनू खलीफा द्वारा स्थापित किया गया था यहाँ बड़ी संख्या में  हिन्दू भाई अपनी मनोकामना  व मुस्लिम भाई मन्नते पूर्ण होने की आस्था रखते है यहाँ सातवी मुहर्रम से मजलिसों का दौर शुरू हो जाता है तथा या मौला अली, बजरंग बली की सदायें बलंद होती रहती हैं . सूबे के ही ललितपुर  जिले की तहसील तालबेहट में भी हिन्दू और मुस्लिम वर्ग के लोगों के बीच आपसी एकता व भाईचारे का बेमिसाल उदाहरण देखने को मिलता है यहाँ चाहे रामनवमी शोभायात्रा का आयोजन हो या दुर्गा पूजा या फिर मुहर्रम जुलूस यहाँ के लोग जाति-धर्म की दीवारों से ऊपर उठकर बतौर नगरवासी अपनी उपस्थिति दर्ज करा एक दूसरे के उत्सवों में पूरी सहभागिता निभातें चले आ रहें है आज भी यहाँ मुस्लिम युवकों द्वारा  भगवान् राम के स्वरूपों का माल्यार्पण कर तिलक लगाते हुए भी देखा जा सकता है. बताया जाता है कि यहाँ तालबेहट के मकरी घाट पर शिव मंदिर का निर्माण हामिद अली पत्रकार के द्वारा अपनी जमीन पर कराया गया है. और हामिद ही मंदिर की पूरी देखरेख भी करते चले आ रहें हैं तथा वे पिछले कई सालों से शिव बारात भी बड़ी ही धूम-धाम से निकालते आ रहे हैं. बुंदेलखंड के ललितपुर में ही बाबा सदनशाह उर्स को हिन्दू और मुसलमान आज तक मिलकर मनाते चले आ रहें हैं इसी तरह कानपुर देहात के रसूलाबाद क्षेत्र में भी हिन्दू मुस्लिम एकता देखने को मिलती है यहाँ रसूलाबाद पुलिस थाने परिसर में स्थित धर्मगढ़ बाबा मंदिर को हिंदू-मुसलिम दोनों की आस्था का केंद्र माना जाता है धर्म गढ़ बाबा मंदिर में जहां हिंदू भाई सिर झुकाते है वहीं मुसलमान भाई भी दर्शन के लिये यहाँ खासी संख्या में पहुँचते हैं.

यहाँ नन्हे मुन्ने बच्चे कांवर लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते है जनपद कानपुर देहात के रसूलाबाद में स्थित धर्मगढ़ बाबा नाम से प्रख्यात रसूलाबाद थाना परिसर में स्थित यह शिव मंदिर हिदू –मुस्लिम एकता का प्रतीक है यहाँ के बुजुर्ग बताते  है कि  रसूलाबाद पुलिस थाने में तैनात थानाध्यक्ष इसरार हुसैन को रात में सोते हुये भगवान शिव का स्वप्न आया ‘मैं यहाँ ही हूँ थाना परिसर में ही’ अत: इस जगह की खुदाई कराकर मेरी स्थापना कराई जाये, कहते हैं नींद खुलते ही थानाध्यक्ष इसरार हुसैन बेचैन हो गये और सुबह होते ही  उन्होने स्वयं कुछ लोगों के साथ मिलकर स्वप्न वाली जगह पर खुदाई करानी शुरू कर दी थोड़ी खुदाई होते ही वहां पर एक शिवलिंग की लाट निकली जिसे देख इसरार हुसैन कुछ देर के लिये अपने होश गवां बैठे उसी दौरान उन्होंने सारे काम छोडक़र सबसे पहले शिव मंदिर की स्थापना करवाई,फिर क्या था क्षेत्र के लोग वहां पूजा अर्चना करने लगे यहाँ के निवासी पत्रकार साथी संतोष गुप्ता से इस बावत वार्ता कर मामले की जब पुष्टि की तो उन्होंने मंदिर की स्थापना 1946 में थानाध्यक्ष इसरार हुशेन द्वारा कराये जाने की जानकारी दी. इसरारहुसैन के बाद थाने में तैनात हुए थानाध्यक्ष नागेंद्र सिंह ने मंदिर के शेष अधूरे कार्य को पूर्ण कराया। इसके बाद 1965 में स्थानीय लोगों द्वारा मंदिर की देख रेख के लिये धर्मगढ़ बाबा सत्संग मंडल का गठन किया गया इसके बाद वर्ष 1994 में मंदिर का जीर्णोद्धार तत्कालीन थानाध्यक्ष आर एस मौर्या व मंडल द्वारा कराया गया कांवर मेला कमेटी बनी और यहाँ सावन के आखिरी सोमवार को कांवर मेला कार्यक्रम का शुभारम्भ कर दिया गया.

आज इस मंदिर में दूर दराज से लोग महाशिवरात्रि के दिन लाइन लगाकर भगवान शंकर के दर्शन कर उनका जलाभिषेक करते है। थानाध्यक्ष इसरार हुसैन की परम्परा को अभी तक यहाँ तैनात होने वाले हर थानाध्यक्ष निभाते चलें आ रहें है कुछ इसी तरह का आलम आजमगढ़ ज़िले के पहाड़पुर क्षेत्र में स्थित हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक बन चुके बाबा मशहूद गाजी सय्यद शालार के मजार का भी है यहाँ पर आयोजित होने वाले  उर्स मेले में हर साल  हजारों की संख्या में हिन्दू मुस्लिम श्रद्धालु सिरकत कर मन्नतें मांगतें हैं जिनकी मनोकामना, मन्नत पूर्ण हो जाती है वे बाबा के मजार पर अपनी श्रद्धानुसार प्रसाद और चादर चढ़ाते हैं दरअसल, यहां ऐसी मान्यता है कि यहां सभी वर्ग के लोगों की आस्था बीते कई सालों से जुड़ी हुई है यहाँ  हर समुदाय के लोग आते है और उनकी मन्नते भी पूरी होती है. हिन्दू मुस्लिम एकता का यह पैगाम दूर दूर तक फैलता जा रहा है इसका अंदाजा यहाँ उर्स में निरंतर बढ़ती भीड़ से भी पता चलता है ।   

ऐसे उदहारण केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में भी देखने को मिलते हैं.गोगाजी राजस्थान के लोक देवता हैं इन्हें जहरवीर गोगा जी के नाम से भी जाना जाता है.राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित गोगामेडी में गोगाजी का मंदिर है बताया जाता है की  यहाँ पर सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग मत्था टेकने के लिए दूर दूर से आते हैं यह स्थान भी हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक की मिसाल है. बताया जाता है कि मध्यकालीन महापुरुष गोगाजी हिंदू मुस्लिम सिख संप्रदायों की श्रद्धा अर्जित कर एक धर्मनिरपेक्ष लोकदेवता के नाम से पीर के रूप में प्रसिद्ध हुए।लोकमान्यता और लोककथाओं के अनुसार गोगाजी को सांपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि ये गुरु गोरखनाथ के प्रमुख शिष्यों में से एक थे. राजस्थान के छह सिद्धों में गोगाजी को समय की दृष्टि से प्रथम माना गया है। गोगादेव की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है और सैकड़ों वर्ष बीत जाने के बाद भी उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं विद्यमान है.

यहां गुरू गोरखनाथ का आश्रम भी है और वहीं गोगादेव की घोड़े पर सवार मूर्ति भी,भक्तजन इस स्थान पर कीर्तन करते हुए आते हैं और गोगाजी के मंदिर पर मत्था टेककर मन्नतें मांगते हैं। यहां आज भी सर्पदंश से मुक्ति के लिए गोगाजी की पूजा की जाती है। गोगाजी के प्रतीक के रूप में पत्थर या लकडी पर सर्प मूर्ति उत्कीर्ण की जाती है। लोक धारणा है कि सर्पदंश से प्रभावित व्यक्ति को यदि गोगाजी की मेडी तक लाया जाए तो वह व्यक्ति सर्प के विष से मुक्त हो जाता है। भादों माह के शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष की नवमी  को गोगाजी की स्मृति में विशाल मेला आयोजित होता है गोगाजी को उत्तर प्रदेश में जहरपीर तथा मुस्लिम लोग इन्हें गोगा पीर कहते हैं। नोहर उपखंड में स्थित गोगाजी के पावन धाम गोगामेड़ी में गोगाजी का समाधि स्थल स्थित है जो साम्प्रदायिक सद्भाव की अनूठी मिसाल है, यहां एक हिन्दू और एक मुस्लिम पुजारी खड़े रहते हैं, श्रावण शुक्ल पूर्णिमा से लेकर भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा तक गोगामेड़ी के मेले में वीर गोगाजी की समाधि तथा गोगापीर जहरपीर के जयकारों के साथ गोगाजी तथा गुरु गोरखनाथ के प्रति भक्ति की अविरल धारा बहती है। यही नहीं हिन्दू-मुस्लिम के बीच मतभेद की सियासत करने वालों के लिए अवरोध की दीवार साबित हो रहे बहुतेरे ऐसे लोग भी हैं जो एक दूसरे के मजहबी त्योहारों का मात्र हिस्सा ही नहीं बनते बल्कि उसे अपने जीवन का हिस्सा बना चुकें हैं उत्तर प्रदेश के झांसी जनपद में एक ऐसा मुस्लिम मूर्तिकार है जो माँ जगदम्बे की मूर्ति को प्रत्येक नवरात्र में बीते 26 वर्षों से बनाता आ रहा है.

झांसी जिसे दूसरी काशी के नाम से भी जाना जाता है यहां का इतिहास संप्रभुता के साथ समन्वय सामंजस्य और मानवीय मूल्यों का प्रतीक रहा है, अतीत गवाह है कि भाई चारे की जो तस्वीर झांसी ने पेश की वह अपने में बेमिसाल है. झांसी में आज भी अब्दुल नाम के इस मुस्लिम युवक द्वारा देवी देवताओं की अप्रतिम प्रतिमाओं को आकार देकर हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की जा रही है. अब्दुल के पहले उनके मरहूम वालिद हिन्दू -मुस्लिम भाईचारे की तस्वीर को पेश करते रहे उसी परंपरा को अब्दुल खलील भी बड़े ही सिद्दत के साथ आगे बढ़ा रहा है.झांसी महानगर में कालीबाडी इलाके में रहने वाले अब्दुल खलील करीब 40 वर्ष के हैं वे बताते हैं कि ज 14 साल की उम्र से वे मां दुर्गा की मूर्ति बनाते आ रहें हैं. यह कला उन्हें  अपने पिता से विरासत में मिली है. अब्दुल कहतें हैं की  वे  देवी देवताओं की मूर्तिया रुपयों के लिए नहीं बल्कि हिन्दू मुस्लिम एकता जो कि हमारे देश की तहजीब व विशेषता रही है उसके  लिए वे इस काम को अंजाम देते चले आ रहें  है। यहीं नहीं अब्दुल खलील हिन्दुओं के त्योहारों  को भी बड़े सिद्दत से मनाते हैं.उनका कहना है कि मूर्तियां बनाने का उद्देश्य मात्र इतना है कि हम हिन्दू मुस्लिम भाई प्रेम और भाईचारे के साथ मिलकर अपना फर्ज करते हुए अपनी संप्रभुता में आस्था रखे ।

धर्म मजहब के नाम आपस में दीवार खड़ी न हो, हम उस देश  के वासी हैं जहां विविधता में एकता का अनोखा संगम हैं इसे जीवंत रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। अब्दुल कहते हैं कि संकीर्ण सियासती सोच के चलते देश में आए दिन हिंदू.मुस्लिम लोगों में विवाद की स्थिति उत्पन्न होती रहती है जो की नहीं होना चाहिए। वे बताते हैं कि उनके वालिद ‘नेशनल हाफिज सिद्दीकी’ कालेज में लैब टेक्नीशियन हुआ करते थे उन्हें मूर्ति बनाने का बहुत शौक था,उन्होंने मूर्ति बनाने की कला को  सीखने के लिए एक बंगाली मूर्तिकार को अपना गुरू बना लिया था 14 साल की उम्र में मैंने भी ये कला अपने वालिद से सीख ली और जब से पिता का देहांत हुआ है, तब से अकेले मूर्तियां बनाने के काम को अंजाम देता चला आ रहा हूं मुझे हिन्दू भाइयों से भाई जैसा प्यार मिलता है और हम भी उन्हें भाई ही मानते है.कुल मिलाकर आज भी जब हम सियासती संकीर्ण मानसिकता को किनारे कर हिदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक बन चुके ऐसे आयोजनों उत्सवों पर्वों को देखते हैं तो ना केवल भारत रूपी इस गुलशन में विविध रंगों के फूलों की महक हमें ऊर्जा देती है बल्कि ह्रदय तल से अनेकता में एकता इस देश की विशेषता की आवाज़ स्वयमेव प्रफुस्टित हो पड़ती है.



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