वास्तविक विजयादशमी : पर्व की पुनर्स्थापना हेतु आम व्यक्तियों को स्वीकारना होगी राम की भूमिका
| Rainbow News - Oct 1 2017 3:51PM

हिन्दू पंचांगानुसार अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को न्याय प्रिय अयोध्या नरेश राम ने अन्यायी लंकेश रावण का वध किया था। भव्यता के साथ‘विजय-उत्सव’ आयोजित करके न्याय की पुनर्स्थापना का शंखनाद हुआ। इसे वर्षगांठ के रूप में हर वर्ष मनाया जाने लगा। यही क्रम निरंतरता के कारण रीतियों में परिवर्तित हुआ। फिर रीतियां मान्यताओं में बदलीं और वर्तमान में वही मान्यतायें, संस्कारों का रूप ले चुके हैं। इस  ‘विजयादशमी पर्व’ को‘दशहरा’ भी कहा जाता है। जनसाधारण के मध्य आज भी इस पर्व को ‘अन्याय पर न्याय’का विजयी-नाद माना जाता है।

प्रेरणादायक इस पर्व की पुनरावृत्ति उस युग के सामाजिक ढांचे को निरंतर स्थापित रखने के प्रति सचेत रहने हेतु है, न कि मात्र प्रतीकों के प्रदर्शनों की रूठवादिता तक सीमित रहने तक। वर्तमान समाज की समीक्षा से स्थिति स्वतः ही स्पष्ट हो जाती है। वर्तमान समाज में न्याय को स्वीकारने का दृष्टिकोण हर व्यक्ति का अलग-अलग होता जा रहा है। देश, काल और परिस्थितियों के साथ-साथ संबंधों के मूल्यों का भी प्रमुख स्थान है। ‘व्यक्तिगत’ की सीमा के अन्दर और बाहर के शब्द, व्याख्यायें और व्यवहार बदल जाते हैं। नियम, कानून, संविधान बौने होने लगे हैं। मनमानियों से लेकर मनाचार तक का साम्राज्य विस्तार पता जा रहा है।

‘शब्द’ की प्रत्येक व्याख्या को संदेह की भूमिका मिटाने की अग्नि-परीक्षा से होकर गुजरना पड रहा है। शंकाओं का बाजार निरंतर गर्म होता जा रहा है। अविश्वास का दावानल विश्वास के वर्चस्व को चुनौती देने लगा है। रक्त संबंधों से लेकर भावनात्मक संबंधों तक की खुले आम होली जलाई जा रही है। अध्यात्मवाद की आड में शारीरिक विलासता के अध्याय लिखे जा रहे हैं। शक्ति के आगे अनुशासन के मापदण्ड पानी भरने लगे हैं। धन, बल, भीड, पहुंच जैसे नये मानकों के आधार पर सम्मान और प्रतिष्ठा का ग्राफ तय होने लगा है। कागजों में लिखे संविधान ने इतिहास की धूल लगी किताबों का आकार लेना शुरू कर दिया है।

स्वःविवेक, मानवीय दृष्टिकोण, तात्कालिक आवश्यकता, मौखिक आदेश जैसे शब्दों ने मनमाने कृत्यों को संवैधानिक मान्यता प्रदान कर दी है। वर्तमान समय में यही मान्यता, देश के नागरिकों पर दोहरी न्याय व्यवस्था लागू करने की दिशा में निरंतर बढ रही है। जिस अपराध के लिए गरीब, लाचार, असहाय, उपेक्षित, पहुंचविहीन आमव्यक्तियों तत्काल सलाखों के पीछे ही नहीं पहुंच जाता है, उसी अपराध को दबंगी की मिसाल बनाकर पेश करने वाला सम्मान और प्रतिष्ठा पर स्थापित व्यक्ति खुलेआम समाज में विलासता भरी जिंदगी जीता है।

यदाकदा किसी दवाव के तहत देर-सबेर गिरफ्तार हुआ भी तो उसके लिए जेल की कोठरी को पांच सितारा सुविधा सम्पन्न होते देर नहीं लगती। रावण की विशाल से विशालतम होती काया आज अधिकांश सम्मानित और प्रतिष्ठित व्यक्तियों में समा चुकी है जिनके नाभुकण्डों से अमृत सुखाने के लिए देश के आमव्यक्तियों को राम की भूमिका में आना ही होगा, तभी वास्तविक विजयादशमी-पर्व की पुनर्स्थापना हो सकेगी। इसी के साथ इस आमव्यक्ति की सभी आमव्यक्तियों को ढेर सारी शुभकामनायें।



Browse By Tags



Other News