‘ओम शान्ति’ में छुपा है जीवन के आदि, मध्य और अन्त का सार
| Rainbow News - Oct 2 2017 2:09PM

शाश्वत सत्य की खोज में मानवीय जीवन गुजर जाता है। विभिन्न मतावलम्वियों के अलग-अलग दृष्टिकोण होने से भ्रम की स्थिति निर्मित हो जाती है। अपने को ही सर्वोच्च प्रमाणित बताने वालों के पास संस्कृत के श्लोकों, आदि-ग्रन्थों के कथानकों और मनमानी व्याख्याओं के अलावा सामने दिखाने के लिए कुछ भी नहीं होता। अनुभव, अनुभूति और आत्मदर्शन के उपदेश सुन-सुनकर ऊब चुका था। कर्मकाण्डों से लेकर दर्शन तक के विद्वानों के मर्म को टटोलने के बाद अध्यात्म के प्रचलित सिद्धान्तों तक खंगालने का प्रयास किया किन्तु ‘बिन गुरू ज्ञान नहीं’ के आदर्श वाक्य ने अपनी सार्थकता स्थापित कर ही दी। यह मानसिक भूख कब जागृत हो गई, पता ही नहीं चला। जब भी एकांत में होता, विचारों का प्रवाह शिथिल होते ही शाश्वत सत्य तक पहुंचने की जिग्यासा बलवती हो उठती।

विचार चल ही रहा था कि तभी नौकर ने आकर बताय कि  सफेद परिधान में कुछ महिलायें आयीं हैं और हमसे मिलना चाहतीं हैं। उन्हें सम्मान सहित ड्राइंग रूम में बैठाने तथा स्वागत करने के लिए कहा। कपडे बदलकर हमने तत्काल डाइंग रूम में पहुंचकर उनका स्वागत किया। उन्होंने प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के माउण्ट आबू स्थित मुख्यालय में होने वाले नेशनल मीडिया कान्फ्रेन्स-2017 के आमंत्रण सहित प्रसाद, साहित्य और टेबिल कलैण्डर आदि भेंट किये। आत्मिक स्नेह के साथ आमंत्रण स्वीकार करने का निवेदन किया। निवेदन इतना भाव-भरा था कि कार्य की व्यस्तता के बाद भी मना नहीं कर सका। उन्होंने बिना देर किये एक प्रपत्र हमारी ओर बढा दिया। हमने कब और कैसे उसे भर कर वापिस कर दिया, पता ही नहीं चला। उनके प्रस्थान के बाद मानो चेतना ने दस्तक दी, तब कहीं जाकर उस अनजाने से सम्मोहन से बाहर निकल सका।

सामने रखी मेज पर शिव बाबा का साहित्य हमें अपनी ओर आकर्षित करने लगा। कुछ पुस्तकों के पन्ने पलटे। तभी फोन की घंटी बज उठी। आफिस से हमारे सहयोगी का फोन था, उन्हें अपेक्षित जानकारी देने के बाद कार्यालय जाने की तैयारी में जुट गया। समय बढता रहा, दैनिक कार्य अपनी यांत्रिक गति से चलते रहे। इस मध्य ब्रह्मकुमारी आश्रम से निरंतर कान्फ्रेन्स में जाने की याद दिलायी जाती रही। तीन बार तो वहां के प्रतिनिधियों ने स्वयं आकर स्मरण कराया। निर्धारित तिथि को हम माउण्ट आबू स्थित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के मुख्यालय पहुंच गये। मीडिया को-आर्डीनेटर शान्तनु से पहली मुलाकात हुई। न्यू डायमण्ड भवन में आवासीय व्यवस्था देने के साथ ही उन्होंने निर्धारित कान्फ्रेन्स का स्वरूप, मुख्यालय की दिनचर्या सहित सभी आवश्यक जानकारी दी।

तभी यहां की मीडिया विंग के वाइस चेयरमेन आत्मप्रकाश सहित अनेक वरिष्ठजनों ने स्वागत कक्ष में प्रवेश किया। हम अपने आवंटित आवास की ओर जाने के लिए उठते कि उसके पहले ही उन्होंने अपना परिचय देते हुए हमें आवास तक पहुंचाने के लिए स्वयं को प्रस्तुत कर दिया। आश्चर्य की सीमा नहीं रही। एक अन्तर्ऱाष्ट्रीय समाजसेवी संस्था का वरिष्ठ पदाधिकारी और सादगी भरा सहज निवेदन। हम ठगे से रह गये। बैटरी से चलने वाली गाडी से उन्होंने स्वयं हमें आवास तक पहुंचाया। उनके कुछ अन्य सहयोगी भी साथ थे। साफ-सुथरा सुसज्जित और सुव्यवस्थित आवास देखकर दिल खुश हो गया। हमने उनकी व्यस्तता जानने के बाद अपनी जिग्यासाओं को उनके सामने रखा। वे अपने अतीत में कहीं खो गये। आंखे शून्य को निहार रहीं थीं। शरीर स्थिर था। वे सन् 1957 में पहुंच गये थे जब पटियाला इंजीनियरिंग कालेज में अध्ययनरत थे।

होस्टल के बगल वाला कमरा और सहपाठी ओमप्रकाश का चेहरा सब कुछ सजीव हो उठा उनके जेहन में। कुछ पल वहां के विचित्र किन्तु सुखद अनुभवों से गजरे के बाद वे दिल्ली के राजौरी गार्डेन में एक अध्यात्मिक आयोजन में पहुंच गये, जहां इस संस्थान के संस्थापक के साथ उनकी पहली प्रत्यक्ष मुलाकात हुई थी। ‘यह पढाई तुम्हारे काम की नहीं है’ संस्थापक का यह सूत्र वाक्य याद कर वे रोमांचित हो उठे। हमने उन्हें यादों के दायरे से बाहर निकालने का उसी समय उद्योग किया। उन्हें सामान्य होने में कुछ समय लगा। जग में रखा पानी गिलास में डालकर पीने के बाद वे मुस्कुराते हुए बोले कि वो दिन है और आज का दिन है। सन् 1961 में हमने पूर्ण समर्पण कर दिया। केवल हम ही नहीं हमारे पूरे परिवार ने, जिसमें माताजी, पिताजी, 4 भाई, एक बहिन हैं, ने संस्था के सिद्धान्तों को पूरी तरह अंगीकार कर लिया।

हमने जीवन के सार को रेखांकित करने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि ‘ओम शान्ति’ में छुपा है जीवन के आदि, मध्य और अन्त का सार। हम कौन है और परमात्मा कौन है, इन दो प्रश्नों का उत्तर अवतरित होते ही शाश्वत सत्य स्वतः ही स्पष्ट हो जायेगा। हम उनसे विस्तार में उतरने का निवेदन करते, तब तक उनके फोन की घंटी बज उठी। विदेशी पत्रकारों का एक दल कान्फ्रेन्स में भाग लेने के  लिए स्वागत कक्ष पहुंच चुका था। उन्होंने विवसता दर्शाते हुए पुनः लम्बी चर्चा हेतु मिलने का आश्वासन दिया और जाने की अनुमति मांगी। हमने परिस्थितियों से समझौता करते हुए उन्हें आवास के गेट तक पहुंचाने की औपचारिकता निभाई।

वापिस आकर हम ‘ओम शान्ति’ का सूत्र वाक्य हल करने में उलझ गये। काफी देर प्रयास के बाद लगा कि शायद ‘ओम’ शब्द सृष्टि के सृजन का कारक है और ‘शान्ति’ उसका शाश्वत स्वरूप, जिसके संतुलित समुच्चय से ही सत्य को समझा जा सकता है। अपने संकलित ज्ञान, तर्क और श्रद्धा के प्रिज्म से सूर्य की किरणों का विश्लेषण करने का प्रयास करने लगा। तभी घंटी ने चाय का समय होने का संकेत दिया। विचार तंत्रिका टूटी, इस विषय का इतना ही समाधान स्वीकार कर आगे की यात्रा के लिए पुनः प्रयास करने का संकल्प लिया और चाय के लिए डायनिंग हाल की तरफ चल दिये। फिलहाल इतना ही। अगले हफ्ते एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।



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