अनुभव से अनुभूतियों तक की जीवन्त यात्रा से प्राप्त होता है परमात्मा
| Rainbow News - Oct 8 2017 12:42PM

-रवीन्द्र अरजरिया/ वाणी से बोलने और कानो से सुनने का सामान्य क्रम जब मौन से बोलने और दृष्टि से सुनने की स्थिति में पहुंच जाये, तो समझ लेना चाहिये कि अध्यात्म के दरवाजे पर दस्तक होने लगी है। जीवन में सांसों के व्यापार से आगे भी बहुत कुछ है, जो जानना और करना बाकी है। ऐसे ही गूढ रहस्यों को उजागर करने वाले व्यक्तित्व के साथ संवाद करने का अवसर प्राप्त हुआ। स्थान था अध्यात्म मंथन केन्द्र के समीप बनायी गई कुटिया और अवसर था प्रातःकालीन अर्चना-उत्सव की बेला। उत्सव के उपरान्त मुख्य आकर्षण के रूप में उपस्थित थे संत मैथिलीशरण जी महाराज। श्रीराम चरित मानस को आचरण में जीवित रखने वाले महात्मा श्री रामकिंकर जी महाराज के शिष्य और उनके द्वारा स्थूल शरीर का त्याग करने के उपरान्त उत्तराधिकारी की पगडी से सम्मानित होने वाले व्यक्तित्व मैथिलीशरण जी से आमने-सामने की अनौपचारिक चर्चा करने की इच्छा जागृत हुई। कुछ समय बाद एक विशेष कक्ष में हम आमने-सामने थे। औपचारिकताओं के आदान-प्रदान के उपरान्त बातचीत का सिलसिला चल निकला। उनके भौतिक शरीर के जन्म से लेकर अध्यात्मिक स्वरूप के अंगीकार करने तक की यात्रा, उसके पडाव और अनुभवों को जानने का प्रयास किया। वर्तमान परिवेश से निकलकर वे अतीत की गहराइयों में डूब गये।

जन्मकाल से लेकर अबोधपन तक की कही-सुनी घटनायें, बचपन की स्मृतियां और अध्यात्म के पडाव एक साथ साकार होते चले गये। उत्तर प्रदेश के बरेली जिला मुख्यालय में निवास करने वाले हरिस्वरूप शेखधर और गंगादेवी शेखधर की दाम्पत्य बगिया में 7 अक्टूबर 1959 को तीसरा पुष्प विस्फुटित हुआ। इस पुत्र का नाम मैथिलीशरण रखा गया। समय बढता गया। शेखधर परिवार-कुंज में 4 पुत्र और 3 पुत्रियों की सुगन्ध बिखी। खेलने-कूदने के दिन कब 13 बसंत पार कर गये, उन्हें पता ही नहीं चला। सन् 1974 को अचानक आकाशीय बिजली चमकी। अस्पष्ट भी स्पष्टता के दायरे में आ गया। नेत्रों की सीमा का विस्तार होता चला गया। शरीर पर दूधिया सफेद कुर्ता, धोती, हाथ में काली छडी और आंखों पर हरे रंग का चश्मा, कुल मिलाकर आकर्षित ही नहीं बल्कि चमत्कारित कर देने वाली महान आत्मा से नजरें मिलीं। बाल मन व्याकुल हो उठा। जानकारी जुटाई गयी। वे महात्मा श्रीराम किंकर जी महाराज हैं, जो आनन्द आश्रम में श्रीराम कथा कर रहे हैं। सेठ काशीनाथ की कोठी के संत-कुटीर में ठहरे हैं। व्याकुल मन अपने शरीर के बोझ को लिए वहां भी पहुंच गया।

लम्बी प्रतीक्षा के बाद महाराजश्री की दृष्टि बाल शरीर पर पडी। निकट बुलाया। एक-एक रूपये के पांच नये नोटों दिये। स्वल्पाहार के लिए आई पनीर की पकोडियों में से कुछ बालक को भी दी गई। उनका अतीत की गहराइयों में डूबता चिन्तन अब अनन्त की ओर बढने लगा था, सो बीच में ही टोक दिया। वे चौंक कर हमारी ओर देखने लगे। मानो किसी निद्रा से बाहर आये हों। उन्होंने मुंह में आये पानी को जीभ के सहारे उदरस्थ किया। हमने प्रश्नवाचक नजरों से घूरा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि उन पकोडियों का स्वाद आज तक मुख में  रस में घोल रहा है। हमने तत्काल उस रस से इस रस तक पहुंचने की यात्रा को रेखांकित करने का निवेदन किया। गुरूवर के वो पांच नोट और पकोडियों की सौगात को अमूल्य धरोहर निरूपित करते हुए उन्होंने कहा कि महाराजश्री से हमने सेवा में आने की अनुमति मांगी जिसे एक वर्ष के लिए टाल दिया गया। यह एक वर्ष हमारे बाल जीवन का पहला प्रतीक्षित अनुभव था, जो मिलन की आस में बहुत मुस्किल से कटा। निर्धारित समय पर पूज्यवर पुनः बरेली पधारे और हमने भी अपने माता-पिता की अनुमति लेकर स्वयं को महाराजश्री के चरणों में समर्पित कर दिया। भक्त बनकर गुरूदेव की उपासना की। स्वयं को अभीष्ट में विलय करने का प्रयास करता रहा। अपेक्षाओं और अनुशासन पर खरा उतरने की कोशिश में आज भी लगा हूं। उनके मौन धारण करते ही हमने उनके उपनाम ‘भाईजी’ का संदर्भ जानने की कोशिश की।

नरसिंहगढ में आयोजित श्रीराम कथा के दौरान मनाये गये सीता-विवाह-उत्सव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि महाराजश्री के आदेश से हमने उस कार्यक्रम में माता सीता के भाई के चरित्र को सजीव किया था। तभी से महाराजश्री ने हमें ‘भाईजी’ का उपनाम दे दिया। नाम के अनुरूप अनुभवों का विस्तार बताने के लिए कहा तो उन्होंने अयोध्या स्थित कनक भवन की घटना का शब्द-चित्र प्रस्तुत किया। अयोध्या में रक्षाबंधन के दूसरे दिन गीता प्रेस की दुकान से श्रीराम चरित मानस की नयी प्रति लेकर वे कनक भवन पहुंचे। वहां के प्रबंधक अजय कुमार छापछइया से दरवार के सम्मुख ग्रन्थ को रखकर आशीर्वाद प्राप्त करने का निवेदन किया। श्री छापछइया ने ग्रन्थ को बीच में खोला तो श्रीराम-सीता विवाह का यशगान करने वाला संदर्भ ही सामने था। दरवार के सम्मुख रखते ही एक पुष्प भगवान के विग्रह से गिरकर सीधा ग्रन्थ के मध्य आकर ठहर गया। हम सभी आश्चर्यचकित होने के साथ-साथ रोमांचित भी हो उठे। भवन में ही बैठकर ग्रन्थ पढने लगा, तभी पुजारी जी ने नजदीक ही माता सीता के वस्त्र लाकर उन्हें झाडकर तह करने का उपक्रम किया। वस्त्र झाडने के दौरान उनमें से एक राखी निकलकर हमारे हाथ पर आ गिरी।

हजारों सूर्य के प्रकाश से युक्त बिजली चमकी। रोमांच का चरम था। नेत्रों से जलधार बहने लगी। शब्द कंठ में चिपक गये। मस्तिष्क शून्य हो गया। श्री छापछइया ने आत्मीय भाव से हमें सहलाया। दरवार से मिलने वाले अनुदान और वरदान के संकेतों को समझाया। समझ तो हम पहले ही गये थे परन्तु अपनत्व भरे स्पर्श से निहाल हो गया। अनुभव ने अनुभूतियों का स्वरूप ग्रहण कर लिया। स्थूल स्पर्श, सूक्ष्म सत्ता की साक्षात उपस्थिति का प्रत्यक्षीकरण कराने लगी। संतश्री भाव से भावुकता की ओर बढने लगे। शब्दों का प्रवाह हृदय से न होकर कहीं अनन्त से होने लगा। हमें लगा कि अनुभव से अनुभूतियों तक की जीवन्त यात्रा से ही प्राप्त होता है परमात्मा, और यह स्थिति स्वतः ही निर्मित हो चुकी थी। वे व्यक्ति से व्यक्तित्व बन चुके थे, सो हमने भौतिक शरीर की सीमा के अन्दर ही पडाव निर्धारित किया और उन्हें पारलौकिक अनुभूतियों से लौकिक अनुभवों तक वापिस लाने का उपक्रम किया। इच्छा पूर्ण हो चुकी थी। मौन शब्दों से हमने इस अंतरंग संवाद के लिए उनका धन्यवाद ज्ञापित किया। प्रति उत्तर में मुस्कुराहट भरा अपनत्व मिला। इस बार बस इतनी ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।



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