औचित्य की तराजू पर कर्मयोगी का जन्म शताब्दी समारोह
| Rainbow News - Oct 12 2017 12:25PM

देश के प्रसिद्ध समाजसेवी नानाजी देशमुख के जन्म शताब्दी समारोह का भव्य आयोजन दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा में किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुख्य अतिथि की गरिमा से ग्रामीण विकास के अतीत, वर्तमान और भविष्य की तस्वीर खींची। नानाजी के साथ ही लोकनायक जयप्रकाश नारायण को भी श्रद्धा-सुमन अर्पित किये गये। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के अन्त्योदय को भी याद किया गया। विभूतियों के प्रेरणादायक कार्यो को रेखांकित किया गया। सरकार के विभिन्न विभागों के संयुक्त संकल्पों को उजागर करते हुए व्यवस्था तंत्र की स्थितियों पर भी प्रकाश डाला गया। लोगों को करने योग्य विभिन्न कार्य बताये गये। दूर-दराज के गांवों से बुलाये गये लोगों को प्रतिनिधि मानकर तालियों की गडगडाहट के मध्य सरकारी आंकडों की बाजीगरी दिखाई गयी।

कार्यक्रम का सीधा प्रसारण भी प्रचार-प्रसार के माध्यमों से किया गया ताकि समाज के अंतिम छोर पर बैठा व्यक्ति भी भविष्य के प्रति आशावान हो सकें। सरकारी मंशा को वजनदार शब्दों तथा प्रभावी उच्चारण से आकर्षित बनाया गया। मगर राजधानी की चकाचौंध के मध्य गांवों के भविष्य को निर्धारित करने, गांवों के छात्रों को शहरी विद्यालयों के सापेक्ष सुविधायें मुहैया कराने, आधुनिक सुख-सुविधायों से धूलधूसित गांवों को सजाने जैसी घोषणायें, सहज स्वीकार नहीं हो पातीं। जिला पंचायतों से लेकर ग्रामीण विकास मंत्रालय तक के वातानुकूलित चैम्बरों की अनुभूतियां क्या ग्राम पंचायत भवन में बैठने वालों को हो सकतीं हैं, महानगरों में स्थापित सरकारी-गैर सरकारी अस्पतालों की लम्बी श्रंखला होने के बाद भी क्या मेडिकल कालेज या एम्स जैसे संस्थानों को पिछडे क्षेत्रों में स्थापित करने की पहल हो सकती है, क्या राज्य और केन्द्र द्वारा स्थापित विभिन्न शोध संस्थानों का अस्तित्व गांवों की धरती पर हो सकता है, क्या बडे नेताओं से लेकर अधिकारियों तक के चौपालों पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में शहरी माइक-टैंट के स्थान पर गांव के टैंट वालों की सुविधायें ली जा सकेंगी, क्या औद्योगिक इकाइयों के लिए रेल लाइन-सडक सम्पर्क वाले पिछडे क्षेत्र को चुना जा सकेगा, इस तरह के अनेक प्रश्न समारोह मंच के साथ-साथ चलने लगे।

जब तक रोजगार के अवसरों को गांवों की चौपालों की ओर नहीं मोडा जाता तब तक इस तरह के समारोहों में दिये जाने वाले वक्तव्य किसी मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले प्रवचन से अधिक महात्वपूर्ण नहीं हो सकते। देश के विभिन्न क्षेत्रों में से किसी एक को ही गांव की ओर अग्रसारित कर दिया जाये तो विश्वास है कि उस प्रयोगात्मक पहल को आदर्श के रूप में स्थापित होते देर नहीं लगेगी। जब नानाजी देशमुख चित्रकूट जैसे पिछडे क्षेत्र को अपनी कर्मस्थली बनाकर कोल-भीलों के मध्य सेवा कर सकते हैं तो फिर लोकतांत्रिक सरकार वास्तविक लोक से दूर भागकर महानगरीय संस्कृति की पोषक क्यों बनती जा रही है। सरकार की विकेन्द्रीकरण की नीतियां जब तक गांवों की ओर नहीं मुडतीं तब तक गैर सरकारी इकाइयों से इस दिशा की ओर रुख करने की आशा नहीं की जा सकती। महानगरों के दबाव को कम करने के लिए गांवों की ओर मुडना ही होगा तभी शहरों की रौनक गांवों में हो सकेगी अन्यथा समारोहों की औपचारिकताओं के मध्य नागरिकों को हर बार एक नई मृगमारीचिका की सौगात ही मिलती रहेगी।



Browse By Tags



Other News