अच्छे दिन : आम लोगों के या सत्ता के चहेतों के?
| Rainbow News - Oct 12 2017 12:33PM

-निर्मल रानी/ इस समय हमारे देश की राजनीति झूठ, भ्रष्टाचार तथा अनैतिकता के ज़बरदस्त दौर से गुज़र रही है। ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ का लॉलीपॉप देश की जनता को दिखा कर सत्ता में आई मोदी सरकार अपने कार्यकाल का लगभग साढ़े तीन वर्ष पूरा करने को है। चुनाव के समय किए गए वादे तो सरकार द्वारा पूरे नहीं किए गए परंतु पिछली सरकार की कई योजनाओं का नाम बदलकर तथा नोटबंदी व जीएसटी जैसी योजनाएं लागू कर सरकार ‘फ़ील गुड’ की तर्ज़ पर रात के काले अंधेरे में देशवासियों को अच्छे दिन की चकाचौंध का एहसास जबरन कराना चाह रही है। जिस जीएसटी को लेकर मोदी सरकार ने देश की संसद में रात 12 बजे जीएसटी लागू करने का जश्र कुछ इस तरह मनाया था गोया देश को आर्थिक स्वतंत्रता आज ही हासिल हुई हो। मात्र दो महीने के भीतर ही उसी जीएसटी में संशोधन कर अपने ही बनाए गए जश्र को झूठा भी साबित किया गया। विश£ेषकों का यह भी मानना है कि यदि गुजरात में विधान सभा चुनाव नज़दीक न होते और वहां के कारोबारियों ने अपने बिल व इनवॉयस पर यह लिखना शुरु न किया होता कि-‘हमारी भूल कमल का फूल’,यहां तक कि गुजरात के व्यापारियों की आत्म हत्या करने की ख़बरें न सुनाई देतीं और लाखों गुजराती कारोबारियों के व्यापार ठप्प न हो गए होते और इससे जुड़े लाखों लोग बेरोज़गार न हुए होते तो शायद जीएसटी का रिटर्न भरने की समय सीमा जो एक माह से बढ़ाकर तीन माह कर दी गई है,संभवतः सरकार ऐसा भी न करती।

सवाल यह है कि देश में अच्छे दिन यदि आए हैं तो वे किन लोगों के लिए हैं? आम आदमी को अच्छे दिन का फ़ायदा किस रूप में मिल रहा है? अब यदि हम कुछ ख़ास लोगों की संपत्ति और उनके व्यवसायिक उत्थान पर नज़र डालें तो हमें यह दिखाई देगा कि सरकार का अच्छे दिनों का वादा जनता के लिए नहीं बल्कि सरकार के चंद चहेतों के लिए ही था। देश में जियो सिम मु त बांटने वाली रिलायंस कंपनी के मालिक मुकेश अंबानी की संपत्ति में 2.47 लाख करोड़ की वृद्धि आंकी गई है। वर्तमान सरकार के कार्यकाल में इन्हें 67 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ ‘अच्छे दिन’ साफ़तौर पर दिखाई दे रहे हैं। योग गुरु से व्यवसायी बने बाबा रामदेव की पतंजलि कंपनी के नेपाली मूल के सीईओ आचार्य बाल कृष्ण भारत के शीर्ष सौ अमीरों की सूची में अचानक 48वें स्थान से छलांग मार कर 19वें स्थान पर पहुंच गए हैं। उनकी कुल संपत्ति 43 हज़ार करोड़ रुपये अनुमानित है। अभी पिछले दिनों देश के कई प्रतिष्ठित पत्रकारों द्वारा संचालित न्यूज़ वेबसाईट द वायर ने यह खुलासा किया कि किस प्रकार भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के पुत्र जय अमित शाह ने अपनी एक नाममात्र कंपनी जिसकी कुल जमा पूंजी मात्र 50 हज़ार रुपये थी उस कंपनी ने किस तरीके से दो वर्षों तक घाटा उठाने के बावजूद एक ही वर्ष में 80 करोड़ रुपये का मुनाफ़ा कमा डाला। निश्चित रूप से आम जनता के लिए हो या न हो परंतु अमित शाह के पुत्र के लिए इससे अच्छे दिन और क्या हो सकते हैं?

आश्चर्य की बात यह है कि जब देश का कोई पत्रकार या लेखक अदानी, अंबानी बालकृष्ण, रामदेव, जय अमित शाह, अमित शाह अथवा सत्ता से जुड़े अन्य कई लोगों के ‘अच्छे दिनों’ का ज़िक्र करता है तो सरकार जुड़े लोगों को यह बातें अच्छी लगने के बजाए बुरी लगने लगती हैं। द वायर ने केवल इतना बताया कि किस-किस प्रकार से अमित शाह के बेटे की संपत्ति में अचानक 16 हज़ार गुणा का मुनाफ़ा हुआ? इस ख़बर के जवाब में भारत सरकार के रेल मंत्री पीयूष गोयल तथा उत्तर प्रदेश के एक मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने जय अमित शाह के पक्ष में तथा द वायर के विरुद्ध पत्रकार स मेलन बुलाकर ज़बरदस्त मोर्चा खोल दिया। यहां तक कि पीयूष गोयल ने यह सूचना दी कि सोमवार को अर्थात् 9 अक्तूबर को जय अमित शाह अहमदाबाद में  द वायर के विरुद्ध सौ करोड़ रुपये की मानहानि का दावा करेंगे। और जय अमित शाह ने ऐसा ही किया। यदि यह मान लिया जाए कि द वायर द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट का मकसद जय अमित शाह पर आरोप लगाना था तो देश की जनता क्या यह जानना नहीं चाहेगी कि उन आरोपों के जवाब में केंद्र सरकार व उत्तर प्रदेश के मंत्रियों को एक आरोपी के पक्ष में सरकार की ओर से मोर्चा खोलने की ज़रूरत क्या थी? क्या मंत्रियों के समय व उनके संसाधनों का प्रयोग किसी आरोपी का बचाव करने के लिए किया जाएगा? परंतु कुछ लोग ऐसे भी हैं जो जय अमित शाह के प्रकरण को किसी घोटाले,घपले या मनी लांड्रिंग के रूप में देखने के बजाए एक कुशल व योग्य व्यापारी के रूप में भी देख रहे हैं। ज़ाहिर है ऐसे लोगों को यह हक भी है कि वे उनसे प्रेरणा लेते हुए यह जानने की कोशिश करें कि आख़िर किन तिकड़मबाज़ियों व तौर-तरीकों से अपने लाभ को एक ही वर्ष के भीतर 16 हज़ार गुणा बढ़ाया जा सकता है?

बड़ी हैरानी की बात है कि जिस समय समूचा विपक्ष भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर उनके पुत्र के प्रकरण को लेकर हमलावर हो रहा था उस समय अमित शाह अपने बेटे पर लगने वाले आरोपों से बेफ़िक्र होकर इस विषय पर कोई जवाब देने के बजाए अमेठी में राहुल गांधी के विरुद्ध मोर्चा खोले बैठे थे। वे अमेठी की जनता के बीच ललकार कर राहुल गांधी के परनाना,दादी,पिताजी और माताजी से अमेठी का विकास कथित रूप से न कर पाने का हिसाब मांग रहे थे। साथ-साथ वे अपने ख़ास एवं पूर्वाग्रही अंदाज़ में यह भी कह रहे थे कि चूंकि राहुल गांधी की आंखों पर इटेलियन चश्मा लगा हुआ है इसलिए उन्हें हिंदुस्तान की चीज़ें दिखाई नहीं देतीं। गोया जब अपने पांव के नीचे से ज़मीन खिसकने लगे और जनता के मध्य अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार का जवाब देने के लिए कोई माकूल तर्क सुझाई न दे तो आप किसी को इटेलियन बता दें या उनकी चार पुश्तों से विकास का हिसाब मांगने लगें और यदि कोई आपकी ग़लत नीतियों का विरोध करे तो उसे राष्ट्रविरोधी बता डालें, उसे पाकिस्तानी बता दिया जाए। कोई छात्र विरोध करे तो उसे वामपंथी या माओवादी होने का तमग़ा दे दिया जाए। कोई देश में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा की बात करे तो आप उसे तुष्टीकरण की राजनीति का पक्षधर बता डालें। और यदि कोई अमितशाह के बेटे की संपत्ति में हुई अकल्पनीय बढ़ोतरी पर सवाल उठाए तो आप उसपर या तो सौ करोड़ का मुकद्दमा ठोक कर उसे डराने की कोशिश करें या फिर ऐसे पत्रकारों को कांग्रेस समर्थक पत्रकार बताकर वास्तविकता से मुंह मोड़ने की कोशिश करें? यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि द वायर की जिस पत्रकार रोहिणी सिंह ने अमितशाह के बेटे की व्यवसायिक अनियमितताओं का भंडा फोड़ किया है उसी पत्रकार ने रार्बट वढेरा को ज़मीन के लेन-देन में हुई अनियमितताओं की भी कलई खोली थी।

परंतु मंहगाई,बेरोज़गारी,गैस व पैट्रोल के मूल्यों में हो रही बढ़ोतरी, व्यापार में छाई मंदी,नोटबंदी व जीएसटी के चलते व्यवसाय में आ रही गिरावट अथवा किसानों की बदहाली की बात यदि कोई करे तो आप उसे ‘निराशा का माहौल फैलाने वाला’ बता देते हैं। चाहे वे आप ही के समर्थक यशवंत सिन्हा हों,अरूण शौरी हों,सुब्रमण्यम स्वामी या फिर राम जेठमलानी जैसे भाजपा के ही नेता हों। अच्छे दिनों का दावा करने वाली तथा नोटबंदी को एक क्रांतिकारी कदम बताने वाली सरकार के पैरोकार क्या यह बता सकते हैं कि भारतीय स्टेट बैंक ने पिछली तिमाही के दौरान न्यूनतम बैलेंस न रख पाने के चलते देश की जनता से 235.6 करोड़ का जुर्माना वसूल किया है। आख़िर यह लोग किस श्रेणी के लोग हो सकते हैं जोकि स्टेट बैंक की नीति के अनुसार अपने बचत खाते में तीन हज़ार रुपये की राशि भी नहीं रख सके? अपने ख़ून-पसीने की कमाई से बैंक को जुर्माना देने वाला व्यक्ति अच्छे दिन का आनंद ले रहा है या एक वर्ष में 16 हज़ार गुणा का मुनाफ़ा कमाने वाला सत्ता का कोई चहेता? 2019 में देश की जनता इन सवालों को ज़रूर उठाएगी?



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