विचार क्रांति अभियान से बदलेगा विश्व का नकारात्मक वातावरण
| -Ravindra Arjariya - Oct 15 2017 11:27AM
समाज के वर्तमान व्यवहार में स्वार्थपरिता का समावेश बढता ही जा रहा है। जीवन को अर्थ को अनर्थ में बदलने वालों की संख्या में बढोत्तरी होती है। सत्य के स्थान पर सफलता के सभी वैध-अवैध उपाय आसीन होते जा रहे हैं। बदलते प्रतिमानों के मध्य मनुष्य के स्थान पर व्यक्ति का व्यक्तिवाद हावी होता जा रहा है। स्थितियों का विश्लेषण कुछ इसी दिशा में संकेत प्रदान कर रहा है। मन में उथल-पुथल चल रही थी। कार्यालयीन कार्य से मिले दो दिन के साप्ताहिक अवकाश का उपयोग इस प्रश्न का उत्तर तलाशने में लगाने का निश्चय किया। विचार क्रांति अभियान को माध्यम बनाकर विश्व परिवर्तन का शंखनाद करने वाले युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा के कार्यों को गति देने वाली दीदी शैलबाला पण्ड्या से मिलने का समय फोन से निर्धारित किया और निकल पडे उनसे सहज संवाद के लिए शांतिकुंज।
 
मन की जिग्यासा को समाधान देने का अवसर सामने आ चुका था। दीदीजी का अभिवादन कर पाता, उसके पहले ही उन्होंने आत्मीयता भरे भावों से हमारी ही कुशलक्षेम पूछ ली। रास्ते की परेशानियां, शांतिकुंज में मिली आवास-व्यवस्था एवं भोजन से लेकर पारिवारिक स्थितियों तक को रेखांकित करने के लिए कहा। हमने सोचा भी नहीं था कि अपनत्व का स्वरूप इस सीमा तक पहुंच सकता है। भावनायें अंगडाई लेकर वक्षस्थल पर ठोकर मारने लगीं। जिस संस्था को गति देने वाला व्यक्तित्व इतना सरल, सहज और पारदर्शी हो उसके स्वरूप की कल्पना, सांसारिकता से कहीं परे जाकर ठहरती है। प्रश्नों का उत्तर देने के बाद अपने मन की जिग्यासाओं को उनके सामने रखा। युगऋषि के व्यक्तित्व और कृतित्व को विस्तार से समझाने के बाद उन्होंने कहा कि ‘हम बदलेंगे, युग बदलेगा’ तथा ‘हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा’ का जयघोष साकार होते ही ‘मानव में देवत्व का उदय’ और ‘धरती पर स्वर्ग का अवतरण’ स्वतः ही हो जायेगा। इसके लिए विचार क्रान्ति अभियान के युग सेनानी समाज में अपनी निःस्वार्थ सेवायें देकर भागीरथी के अवतरण हेतु साधनारत हैं। ‘युग सेनानी’ शब्द को स्पष्ट करने के निवेदन पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि यह अखिल विश्व गायत्री परिवार के वे समर्पित परिजन हैं जो युगऋषि द्वारा निर्धारित लक्ष्य के सफल भेदन हेतु प्रयासरत हैं। विश्व के अनेक देशों में हमारी शाखायें वैदिक चिंतन पर आधारित विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने में लगीं हैं। आदिग्रंथों में वर्णित ज्ञान-विज्ञान को संस्था के संस्थापक द्वारा स्वयं अपनी कलम से सरलतम रूप प्रदान किया गया ताकि आम लोगों तक यह गूढ सूत्र पहुंच सकें। हमने विचार क्रांति अभियान का विश्लेषण करने की बात कही, तो उन्होंने मानवीय काया, वातावरणीय प्रभाव और सूक्ष्म शक्तियों की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि शारीरिक संरचना में मस्तिष्क का स्थान सर्वोच्च होता है। इसे ही नियंत्रक और संचालक का समुच्चय माना जाता है।
 
हम अपने मस्तिष्क के बहुत छोटे से भाग का ही उपयोग कर पाते हैं। शेष तो निष्क्रिय ही रह जाता है। जिसकी मानसिक क्षमता जितनी ज्यादा विकसित होगी, वह उतना ही ज्यादा सक्षम होगा। दूसरे स्थान पर वातावरणीय प्रभाव है जिसे हम बाह्य कारकों के आइने से समझ सकते हैं। हमारे आसपास के लोगों द्वारा की जाने वाली चर्चाओं से उत्पन्न होने वाली तरंगों से लेकर पर्यावरणीय स्थितियां तक का वातावरण निर्माण में महात्वपूर्ण योगदान होता हैं। सकारात्मक बातचीत के मध्य रहने वाले और नकारात्मक शब्दों के उच्चारण के युक्त स्थितियों में रहने वाले लोगों की मानसिकता भी उसी के अनुरूप निर्मित होगी। तीसरे और अन्तिम बिन्दु के रूप में हम जिन सूक्ष्म तरंगों को प्रभावी मानते है वे पूर्व वर्णित दौनों बिन्दुओं के संगम से उत्पन्न होतीं है। अपवाद को हाशिये पर रख दे तो दिखेगा कि ज्यादातर लोग अपने व्यक्तित्व को इन्हीं तीन कारकों के माध्यम से निर्धारित करते हैं जो आगे चलकर उनके कृतित्व में प्रदर्शित होता है। हम विचारों के प्रवाह को ही जब सकारात्मकता की ओर मोडने के लिए लोगों को प्रेरित करेंगे, तो निश्चय ही उनके चारों ओर का वातावरण भी उसी के अनुरूप ढलने लगेगा। सत्य की स्थापना हो सकेगी। भोजन में पौष्टिक और न्यूनतम आहार, आवास हेतु न्यूनतम स्थान और जीवकोपार्जन हेतु सीमित धनार्जन के साथ शरीर की आवश्यकताओं का अन्त हो जाता है। रक्त संबंधों पर आधारित परिवार की अवधारणा को आत्मा की स्थापना के साथ विश्व बंधुत्व तक पहुंचाते ही समभाव, समदृष्टि और समाचरण परिलक्षित होने लगता है। यही तो है सकारात्मकता का पहला चरण। जब इस तरह के विचारों को युद्धस्तर फैलाने के लिए संकल्प लिया जाता है तब वह क्रांति के स्वरूप भी धारण करता है और अभियान की तरह लक्ष्य भेदन भी। विचार क्रांति अभियान से बदलेगा विश्व का नकारात्मक वातावरण। चर्चा चल ही रही थी कि संस्था के एक स्वयं सेवक ने आकर अमेरिका से आये एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधि मण्डल को दिये गये समय का भान कराया। कमरे में लगी घडी को देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। हमने दिये गये समय से कहीं दो गुने से भी ज्यादा समय ले लिया था। सो अनजान में हुई इस गलती के लिए क्षमा मांगी। उन्होंने मुस्कुराते हुए अपना ही घर समझकर हमेशा आते रहने के लिए हमें अधिकृत किया तथा एक स्वयंसेवक को बुलाकर प्रसाद-भोजन कराने का निर्देश दिया। हमें अपने मन में चल रही उथल-पथल को शान्त करने का उपाय मिल गया था। इस बार बस इतना ही। अगले हफ्ते एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।


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