ये कोचिंग सेन्टर हैं या फिर सिनेमाहाल
| By- Reeta Vishwakarma - Nov 1 2017 4:22PM

बड़ी बेरोजगारी है। आजकल काफी पढे़-लिखे डिग्री धारक लोग बड़े परेशान से दिखते हैं। एक बात तो है कि इन लोगों ने ट्यूशन पढ़ाने का धन्धा शुरू कर दिया है वर्ना भय था कि कहीं कलम के बजाय कट्टा न उठा लें। ऐसा नहीं कि इनके इस कार्य से मुझे कोई आपत्ति है। हाँ इतना जरूर दुःख है कि ये लोग घनी आबादी में रिहायशी कालोनियों और ऐसे स्थानों पर ट्यूशन पढ़ाते हैं जहाँ के रहने वालों के लिए इनके स्टूडेन्ट्स का शोर-शराबा कष्टकारी होता है। हमारे शहर के कई गली मुहल्ले ऐसे हैं जहाँ किराए दार के रूप में रहने वालों ने ट्यूशन केन्द्र खोल रखा है।

ट्यूशन केन्द्र यानि कोचिंग सेन्टर ये पंजीकृत नहीं है या न ही मुहल्ले वासियों को इससे कोई लेना-देना है, लेकिन जब छात्र-छात्राएँ हल्ला-गुल्ला करते इन केन्द्रों से कथित पढ़ाई करके निकलते हैं, तब इनकी अश्लील बातों, मोबाइल टाक्स सुनकर हर कोई सोंचने पर विवश हो जाता है। एक नहीं अनेकों मुहल्ले ऐसे हैं जहाँ रिहायशी आवासों में किराए पर रहकर गुरूजी, सरजी ट्यूशन पढ़ाते हैं और वे छात्र-छात्राएँ सुबह, दोपहर, शाम किसी भीं समय इन गुरूजनों के कोचिंग केन्द्रों पर आते जाते दिखाई पड़ते हैं।

बेरोजगार गुरूजनों के लिए यह धन्धा लाभकारी हो सकता है, लेकिन क्या इन कोचिंग केन्द्रों पर पढ़ाने वाले छात्र-छात्राओं के हाव-भाव से तो नहीं प्रतीत होता है कि ये लोग अतिरिक्त मेहनत करके पढ़ाई कर रहें हैं। हमें तो लगता है कि ये किशोर उम्र के छात्र-छात्राएँ अपने माता-पिता को आर्थिक रूप से चोट पहुँचा रहें हैं, साथ ही दिनभर मटरगश्ती करके किशोरावस्था को आनन्द उठा रहें हैं। महंगा ट्यूशन पढ़ाने वाले अभिभावकों को कहाँ फुरसत है कि वे लोग आकर देख सकें कि उनके बच्चे आखिर क्या करते हैं। पढ़ रहें हैं या फिर मौजमस्ती कर रहें हैं।

रिहायशी कालोनियों की सँकरी गलियों से जब ट्यूशन पढ़ने वाले किशोर-किशोरियों का हुजूम चलता है तो प्रतीत होता है कि ये लोग मनपसन्द फिल्में देखने जा रहें हैं या फिर देखकर लौट रहें हैं। तात्पर्य यह कि कोचिंग सेन्टर शिक्षालय न होकर गोया सिनेमा हाल हो। जब कालोनियों के रहने वाले इन्हें देखते हैं तो वे लोग अवश्य ही नकारात्मक सोंच में पड़ जाते है।। मोबाइल हाथों में लिए, मोटर बाइक पर सवार किशोर उम्र छात्र-छात्राओं की गतिविधियाँ संदेहास्पद तो लगती हैं साथ ही ट्यूशन सेन्टर (कोचिंग केन्द्रों) के संचालकों के अनुशासन पर भीं प्रश्न चिन्ह लगता है।

प्रबुद्ध वर्गीय लोगों के लिए ऐसे कोचिंग सेन्टर चिन्ता का विषय बनने लगें हैं। इनका कहना है कि बच्चे जब ऐसे केन्द्रों से बाहर निकलते हैं तो यह प्रतीत ही नहीं होता कि ये लोग पढ़कर निकल रहें हैं। हँसी-ठिठोली और शोरगुल तथा अश्लील असंसदीय वार्तालाप सुनकर ताज्जुब होता है कि ट्यूशन केन्द्रों के गुरूजनों ने आखिर क्या पढ़ाया है? या फिर हर माह प्रति विषय हजारों रूपए के रेट से लेना ही इनका कर्तव्य व दायित्व है ये तो पूर्णतया व्यवसायी हैं। पढ़े-लिखे प्रत्यक्ष दर्शियों का कहना है कि यदि हमारे शहर के लोग कोचिंग केन्द्रों पर ट्यूशन पढ़ाना अपना स्टेटस सिम्बल नन मानें और बच्चों को घरों पर ही रहकर स्वयं पढ़ने, अध्ययन करने की बातें कहें तो वह ज्यादा कारगर होगा।

कई ऐसे गुरूजनों को कहते सुना गया है कि तुम लोग हमारे यहाँ ट्यूशन पढ़ों परीक्षाएँ उत्तीर्ण कराने का हम जिम्मा लेते हैं। परीक्षा केन्द्रों पर नकल की व्यवस्था करा देंगे थोड़ा पैसा अधिक खर्च करना होगा। बच्चे भीं पढ़ने से फुर्सत पा जाते है, और ऐसे गुरूजनों से अच्छी खासी रकम देकर ट्यूशन पढ़ते हैं। ऐसे शिक्षकों के बारे में कहा जाता है कि ये शुद्ध रूप से दलाल हैं और इनके सम्बन्ध शिक्षा माफियाओं से हैं जहाँ ठेके पर नकल कराकर बच्चों को ‘पास’ कराया जाता है।



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