लघु उद्योग : भारतीय अर्थव्यवस्था की लाइफ लाइन
| Rainbow News - Nov 2 2017 2:47PM

-संजय कु. आज़ाद/ भारत वर्ष में सदीओ से एक संस्कृति प्रवाह निरंतर चलते आ रहा है. यह हिन्दू संस्कृति का प्रवाह है .हमारे वेदों में जो दुनियां के प्राचीनतम ग्रन्थ है उसकी आर्थिक चिंतन सदा जिओ और जीने दो पर अवलम्बित रही है.चर-चराचर में ब्याप्त हर जीव को सामान अधिकार के सहारे जीने का पर्याप्त चिंतन हिन्दू संस्कृति में रही है.क्योंकि अपनी विचार पद्यति एकात्म विचार पद्यति रही है.अपने यहाँ की अर्थ रचना एवं अर्थव्यवहार के बारे में बहुत विस्तार से और बहुत गहराई से विचार किया गया है.वैदिक वांग्मय के अध्ययन नही करने वाले अनेक विचारक यह भूल कर बैठे की भारतीय चिंतन में अर्थ आधारित चिंतन परम्परा थी ही नही.भारतीय अर्थचिन्तन के सूत्र वेदों से मिलते है.वेदों में सम्पन्नता ,धन-धान्य का प्राचुर्य तथा विभिन्न प्रकार की सम्पदा की प्राप्ति करने का उल्लेख है.अर्जित सम्पति का कैसे उपयोग करना इसका भी उल्लेख है. ईशावास्योपनिषद का प्रथम मन्त्र ;-

ईषा वास्यं इदं सर्वं य्तिकयञ्च जगत्यां जगत्.

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम्.

इस मन्त्र क भाव है कि त्यागपूर्ण भोग करो,लालच मत करो, यह सम्पूर्ण प्राकृतिक संपदा तुम्हारी नहीं है,यह परब्रह्म का आवास है. अत;यह संपदा सबकी है. सभ्यता के उषाकाल मे ही हिन्दू चिंतन धन के निर्बाध उपयोग एवं एकाधिकार को वर्जित कर दिया था.अब प्रश्न उठता है की इतनी सुदृढ़ व्यवस्था और चिंतन के बाद भी आज के परिपेक्ष्य में हम इतने अर्थ दुर्बल क्यों है?लेकिन ऐसी बात नही है मुद्रा का सबसे पहला प्रयोग इसी भारतभूमि पर हुआ था वेदों में हिरण्यपिंड का उल्लेख मिलता है.हिरण्य यानी सोना पिंड यानी मुद्रा .यानी उस समय हमारे पूर्वज सोने को कूटपिट एक निश्चित बजन में बदल कर उससे लेनदेन भी करते थे.वेदों में हमें मौद्रिक विनिमय प्रणाली के अनेक उदाहरण मिलते है.आगे चलकर पाणिनि और पातंजली के महाभाष्यो मे शतमान,शाण, निष्क, ओर सुवर्न मुद्राओ के नाम मिलते है.शुक्रनीति मे वस्तु के तीन गुण बताये हैं वे है—उपयोगिता,सिमितता ओर हस्तानतर्नियता कौटिल्य के अर्थशास्त्र मे तो सारी नितिओ कि प्रविष्टिया हि भरि पडी है. कहने का तात्पर्य यः है कि वैदिक काल से लेकर मुगलो के गुलामि से पूर्व तक भारत कि अर्थव्यवस्था जिस साचे मे चलायमान थि व्ह राष्ट्र के निर्माण की महत्वपूर्ण कड़ी रही थी.हमारे देश में वस्तुओ का उत्पादन उसका वितरण उसका उपभोग और उसके लाभांश की अत्यंत विकसित व्यवस्था रही थी .लघु उद्योग उस वक्त की व्यवस्था की रीढ़ थी.समाज का हर वर्ग इस लघु उद्योग के माध्यम से निर्माण और वितरण में संलग्न रहे थे.हम अपनी सामाजिक आवश्यकताओ को ध्यान में रखकर प्राकृतिक संसाधनों का पोषण करते थे ना की दोहन.

भारत के गावों में हमारी जरूरत की सभी चीजे इन्ही लघु उद्योगों के माध्यम से बनती थी. सूक्ष्म, लघु एंव मध्यम उद्योग देश की सम्पूर्ण औद्योगिक अर्थव्यस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते है। यह अनुमान किया जाता है कि मूल्य के अर्थ में यह क्षेत्र निमार्ण की दृष्टि से 39% एवं भारत के कुल निर्यात के 33% के लिए जिम्मेदार है। इस क्षेत्र का लाभ यह है कि इसकी रोजगार क्षमता न्यूनतम पूंजी लागत पर है। 31 मार्च 2007 की स्थिति के अनुसार यह क्षेत्र 12.84 मिलियन माइक्रो और लघु उपक्रमों के जरिये अनुमानत 31.2 मिलियन व्यक्तियों को रोजगार देता है। इस क्षेत्र में मजदूरों की तीव्रता वृहद् उद्योगों की तुलना में करीब 4 गुना ज्यादा अनुमानित की गई है। इसी तरह खादी और ग्रामीण उद्योग का एक अन्य लाभ यह भी है कि इन्हें स्थापित करने के लिए पूँजी की आवश्यकता नहीं (या बिलकुल कम) के बराबर होती है, जो इन्हें ग्रामीण गरीबों के लिए एक आर्थिक रूप से व्यवहार्य विकल्प बनाता है। कम आय, एवं क्षेत्रीय और ग्रामीण/नगरीय असमानताओं के मद्देनजर भारत के संदर्भ में इसका महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। लघु उद्योगों की आवश्यकता देश की परम्परागत प्रतिभा व कला की रक्षा हेतु भी आवश्यक है। अन्य महत्वपूर्ण दृष्टिकोण से लघु उद्योग निर्यात संवर्धन व देश को आत्म निर्भरता की और जाने हेतु है लघु उद्योग आयात प्रतिस्थापन में सहायक है। वे निर्यात की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

सन १८३५ तक भारत के सामानों का विश्व के बाज़ार में ३५ प्रतिशत का दबदवा रहा है.इन्ही लघु उद्योगों के माध्यम से तैयार लोहा विश्व में सर्वोत्कृष्ट माना जाता था खासकर अपना पडोसी राज्य आज का छतीसगढ़ और झारखंड के ही क्षेत्रों में ऐसे लोहा निर्माण के १००० से अधिक कारखाने थे.अपने यहाँ लगभग ३६ प्रकार के लघु उधोग थे जिसके कारण गाँव आत्मनिर्भर था. लोग सोने के सिक्के गिनकर नही तौलकर रखते थे और आय या व्यापार का मुख्य केंद्र ये छोटे छोटे उधोग ही थे.गावों में २००० से अधिक प्रकार के प्राथमिक उत्पाद तैयार होते थे जिनमे १८ प्रकार के कारीगर जैसे बुनकर, धुनकर,तेली,कुम्हार जैसे समृद्ध पेशेवर थे जिन्हें कालान्तर में कुटिल लोगो ने जातिगत व्यवस्था में डाल दिया.

यदि हम ध्यान दे तो १८वि सदी विश्व में वनिकवाद और राजतंत्र ने विश्व को बाज़ार बनया १९वि सदी में पुन्जिपतिओन का दबदवा बनता गया और २०वि सदी साम्यवादियो ने अपनी व्यवस्था कायम विश्व की अर्थवयवस्था पर करने का प्रयास किया इससे भारत भी अछूता नहीं रहा. आजादी के पूर्व अंग्रेजो ने हमारी अर्थवयवस्था की रीढ़ लघु उद्योग को ही निशाना बनाना शुरू किया .आने प्रकार के चुंगी लगाकर लघु उधोग को बंद करने पर मजबूर कर दिया.हमारी इस विकसित अर्थवयवस्था को वर्वाद करने के लिए लघु उद्यमियो का कमर तोड़ने के अंग्रेजो ने ३७३५ ऐसे कानून बनाए की हमारी ग्रामीण अर्थ व्यवस्था पंगु हो गयी.जो लघु उधोग ने कभी भारत को सोने की चिड़िया बना दी थी जिस उधोय्ग के सहारे भारतीय समाज दूध दही की नदी बहने बाली धरती माँ भारत थी वह दूसरों के सहारे पर चलने को मजबूर होती गयी है.

साम्यवादी और समाजवादी लोग हिन्दू चिंतन के अभाव में कमुनिज्म और कन्जुमरिज्म दोनों ने आजादी के बाद इस उद्योग को पनपने नही दिया.पश्चिम की सोच टुकडो वाली सोच है जबकि हिन्दू सोच एकात्म सोच रही है.पश्चिमी सोच पर आजादी के बाद के चिंतको ने साम्यवादी और समाजवादी चाशनी में जिस उधोय्ग की निब डाली उस सोच में वृहत उधोय्ग रहे इनके सोच में में लघु उधोय्ग कहीं था ही नही. साम्यवादी और समाजवादी सोच ने आर्थिक आत्मनिर्भरता के बजाय इसे राजनितिक चश्मे से देखा जिसके तहत सिर्फ व्यक्ति और वर्ग संघर्ष को स्थान दिया और यह चिंतन हिन्दू चिंतन का विपरीत है. आज प्रत्येक व्यक्ति के मन में उद्यमी बनने, सम्पत्ति कमाने, नाम कमाने तथा आत्मनिर्भर बनने की इच्छा होती है. मूलतः उद्यमी होने के लिए पाँच कसौटियाँ हैं. उद्यमी बनने का निर्णय करने पर इन कसौटियों को पार करने के लिए उचित 'अभ्यास' करना आवश्यक है. सम्पत्ति अर्जित करने के लिए लगन, स्वभाव और आचार में लचीलापन, व्यवसाय प्रक्रिया के रहस्य की जानकारी, उद्योग की श्रृंखला, परस्पर सम्बन्ध निर्माण करने की तैयारी तथा बिना थके, बिना निराश हुए कोशिश करते रहने की मानसिक - शारीरिक - सांस्कृतिक तैयारीही हमें सफलता के सोपान पर आरूढ़ करती है.

भारत जैसे विशाल अर्थव्यवस्था के विकास में लघु उद्योग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लघु उद्योग स्थानीय संसाधनो का उचित / इष्टतम उपयोग द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने के अवसर प्रदान करते है.लघु उद्योग में हुए विकास ने आधुनिक तकनीक अपनाने तथा लाभकारी रोजगार में श्रम शक्ति का अवशोषण करने के लिए उद्यमशीलता की प्रतिभा का उपयोग करने को प्राथमिकता प्रदान की है. जिससे उत्पादकता और आय के स्तर को बढ़ाया जा सके। लघु उद्योग उद्योगो के प्रसार तथा स्थानीय संसाधनों के उपयोग में सुबिधा प्रदान करती है. जीएसटी लागू होने से अब सभी छोटे उद्योग औपचारिक प्रणाली के तहत आएंगे, ऐसा उनकी वृद्धि के लिए जरूरी है. शरुआत में उन्हें थोड़ी दिक्कत हो सकती है, लेकिन इससे उनके आगे विकास के रास्ते खुलेंगे. भारत में लगभग 35% हिस्सा लघु और छोटे उद्योगों का है.

भारत सरकार के स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, भारत के युवाओं के उज्ज्वल भविष्य के लिये सरकार द्वारा चलाया गया नया अभियान है। ये अभियान देश के युवाओं के लिये नये अवसर प्रदान करने के लिये बनाया गया है। ये पहल युवा उद्यमियों को उद्यमशीलता में शामिल करके बहुत बेहतर भविष्य के लिये प्रोत्साहित करेगी। ये पहल भारत का सही दिशा में नेतृत्व के लिये आवश्यक है.स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया योजना का मुख्य उद्देश्य उद्यमशीलता को बढ़ावा देना हैं लघु उधोगो की ओर लौटना है जिससे देश में रोजगार के अवसर बढ़े. यह एक ऐसी योजना हैं जिसके तहत नये छोटे-बड़े उद्योगों को शुरू करने के लिए सरकार द्वारा प्रोत्साहन दिया जा रहा है. जिसमे ऋण सुविधा, उचित मार्गदर्शन एवं अनुकूल वातावरण आदि को भी शामिल कर एकबार फिर हिन्दू चिंतन की अर्थधारा को प्रवाहित करने का सार्थक पहल है.

लघु उद्योगों के रूप में हमारे उद्यमी लेखन सामग्री का उत्पादन, सौंदर्य व श्रृंगार प्रसाधन उद्योग, प्रिंटिंग इंक उद्योग, अगरबत्ती उद्योग, आइस-क्रीम उद्योग, डेरी उद्योग, मोमबत्ती उद्योग, वाशिंग डिटरजेंट पाउडर, पापड़, बड़ियां और चाट मसाला उद्योग, हवाई चप्पल बनाना, पेपर पिन (आलपिन) तथा जेम-क्लिप बनाना, तार से कीलें बनाना, टीन के छोटे डिब्बे - डिब्बियां, कॉर्न फ्लेक्स, फलों व सब्जियों की डिब्बाबन्दी एवं संरक्षण, खिलौना और गुड़िया उद्योग, दियासलाई उद्योग, मसाला उद्योगसर्जिकल कॉटन, सर्जिकल बैंडेज उद्योग, होजरी उद्योग, रेडीमेड गारमेंट उद्योग, स्विच और प्लग उद्योग,बिस्कुट उद्योग, चीनी उद्योग (खांडसारी), मक्खन और मसालों की सुगन्धें, चिप्स तथा वेफर्स, नूडल्स एवं सेवइयां, मक्का स्टार्च, सूखी संरक्षित और डिब्बा बंद सब्जियां, सॉसेज, केचअप व अचार, दुग्ध पाउडर, घी, पनीर, कत्था निर्माण उद्योग, पेंट निर्माण उद्योग में एकबार फिर आपको आगे बढना होगा तभी भारत आत्मनिर्भर होगा. भारत की आर्थिक समस्याओं का हल विदेशी ऋण या विदेशी पूंजी निवेश में कभी हो ही नही सकता.बल्कि हमारी आर्थिक समसयाओ का हल इन्ही लघु उद्योग के विकास से जुडी है.लघु उद्योग की महता को ध्यान में रखकर ही भारत सरकार प्रत्येक वर्ष ३० अगस्त को लघु उद्योग दिवस मनाती है.



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