राष्ट्रपति की बहू को नही मिला टिकट
| -K.P. Singh - Nov 11 2017 4:10PM

नगर पालिका चुनाव में सबसे दिलचस्प स्थिति कानपुर देहात की झींझक नगर पालिका सीट पर उभरी है। इस सीट पर भाजपा की जिला इकाई ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की भतीज बहू की टिकट अर्जी को ठुकरा दिया और उनकी जगह दूसरी आवेदक को पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर दिया। जिला इकाई की इस जुर्रत को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। इस नगर पालिका में 29 नवंबर को मतदान होना है।

कानपुर देहात की झींझक नगर पालिका में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के सगे बड़े भाई प्यारे लाल के पुत्र पंकज की पत्नी दीपा अध्यक्ष का टिकट भाजपा से मांग रहीं थीं लेकिन पार्टी की जिला इकाई ने उनका प्रार्थना पत्र मंजूर नही किया। जिला अध्यक्ष राहुल देव अग्निहोत्री ने बताया कि जिला कमेटी ने अपने स्तर पर सर्वे कराया था जिसमें दूसरी आवेदक सरोजनी देवी की स्थिति उनके मुकाबले ज्यादा बेहतर पाई गई इसलिए सरोजनी को उम्मीदवार बनाने का फैसला कर लिया गया।

इसके बाद दीपा ने पार्टी के इस फैसले से खफा होकर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन भर दिया है। हालांकि उनका नाम वापस कराने की कवायद पार्टी कर रही है। भाजपा के नेता उनके मान-मनोव्वल के लिए सक्रिय हैं। आलोचक कहेंगे कि भाजपा में दलित नेता कितनी भी ऊंची कुर्सी पर पहुंच जायें निर्णायक नही बन सकते। राष्ट्रपति की बहू का टिकट काटकर भाजपा की कानपुर देहात इकाई ने दलितों को पार्टी में उनकी स्थिति का आइना दिखा दिया है। लेकिन सच्चाई कुछ और ही है।

भाजपा के कानपुर देहात अध्यक्ष राहुल देव अग्निहोत्री ने वैसे तो राष्ट्रपति की बहू का टिकट काटने को लेकर अपने पराक्रम की डीगें हांकने में रामनाथ कोविंद के प्रति श्रद्धा जताते हुए भी कसर नही छोड़ी है। उन्होंने ऐसी चीजों को कांग्रेस पर निशाना साधने के औजार के रूप में पेश करने की अपनी पार्टी के लोगों की आम आदत के अनुरूप कहा है कि भाजपा में वंश वाद नही चलता राष्ट्रपति की बहू का टिकट कट जाना इसकी नजीर है। लेकिन अंदर खाने से आ रही खबरों के मुताबिक अपनी भतीज बहू का टिकट खुद राष्ट्रपति ने कटवाया है।

उन्हें उनके सर्वोच्च कुसी पर रहते हुए अपने परिवार के किसी सदस्य द्वारा बुनियादी स्तर का चुनाव लड़ना रास नही आया। जिसकी वजह से उन्होंने भाजपा हाईकमान को अपनी भतीज बहू का आवेदन स्वीकार न करने का संकेत कर दिया था और इसी के नतीजे ने अग्निहोत्री कागज की तलवार चलाकर शेखी बघार रहे हैं। यह बताने की जरूरत नही है कि भाजपा में कितने नेताओं के बेटे, बेटी, भाई, भतीजों को तरजीह दी गई है। वैसे वंशवाद और परिवारवाद भारतीय जनता पार्टी समेत सभी दलों की कमजोरी है और जिसके पीछे भारतीय समाज का चरित्र है।

पार्टियां टिकट वितरण में जिताऊ उम्मीदवार को सर्वोच्च प्राथमिकता देतीं हैं और भारतीय समाज में लोग नये चेहरे की बजाय बड़े आदमी के परिवार के सदस्य के प्रति हर मामले में आकर्षित रहते हैं। जिसकी वजह से राजनीति में भी बढ़त के लिए किसी का प्रमुख नेता के परिवार से होना पुश्तैनी पूंजी बन जाता है। पार्टियों को लगता है कि ऐसे उम्मीदवार को प्राथमिकता देने से जीत का लक्ष्य उसके लिए आसान हो जायेगा।

-के.पी. सिंह उरई, जालौन (उ.प्र.)



Browse By Tags



Other News