नकारात्मक सोच का परिचायक होता है आधारहीन विरोध
| Dr. Ravindra Arjariya - Nov 19 2017 11:38AM

समाज को विकास पथ पर अग्रसर करने के लिए उपाय करने वाले तंत्र की कथनी और करनी में निरंतर अंतर दिखता रहा है। राजनैतिक दलों के वायदों की मृगमारीचिका में फंसने के अलावा आम आवाम के पास कोई चारा भी तो नहीं बचा है। विकल्प की तलाश में नागरिकों की आंखें ही पथराने लगीं हैं। प्रत्येक चमकदार वस्तु को सोना समझने की भूल पर भूल होती रही है। क्षेत्रीय दलों की संकुचित मानसिकता ही उन्हें आगे बढने से रोकती है जबकि राष्ट्रीयस्तर पर परचम फहराने वाले दल हर बार पुरानी शराब ही नई बोतल में पेश करने की आदत से बाज नहीं आ रहे हैं। ‘अच्छे दिन’ से लेकर ‘सब का साथ, सब का विकास’ का नारा देने वाले भी परिवारवाद में जकडी पार्टी की परिपाटी पर ही चलती दिख रही है। जायें तो जायें कहां, की स्थिति ने मतदाताओं के पैरों में बेडियां डाल दी हैं। एक आशा की किरण देश की राजधानी के केन्द्र शासित प्रदेश पर चमकी, तो लोगों ने आप का भरपूर समर्थन कर दिया।परिणाम सामने है। आपसी अडंगेबाजी से लेकर अहम के टकराव तक ने दिल्ली को आंकडेबाजी से बाहर निकलने ही नहीं दिया। तो दूसरी ओर भगवां रंग को अपनाने वालों की अपनों के बीच ही हार हुई। चित्रकूट के परिणामों ने राम की शरणस्थली में ही फिलहाल ‘राम नाम सत्य’ कर दिया है।

मध्य प्रदेश की यह सीट गंवाने के बाद दावपेंचों का बाजार गर्म हो गया। निर्वाचन आयोग की ‘पप्पू’ जैसे सामान्य से उपनाम पर रोक, शिव भक्त होने का दावा करने वाले राहुल, ‘आर्ट आफ लिविंग’ को सेतु बनाकर श्री से श्रीश्री तक पहुंच चुके रविशंकर की अयोध्या मुद्दे पर पहल, देश के एक बडे क्षेत्र में चुनावी शंखनाद के मध्य चैनलों के आइने से तय होता लोकप्रियता का ग्राफ, पेड न्यूज को प्रमाणित करने वाली जटिल प्रक्रिया, चुनावी खर्चों की वास्तविकता तक पहुंचने के दिखावटी प्रयास जैसे विभिन्न कारकों को लेकर विचारों का झंझावात सनै-सनै तेजी पडने लगा। तभी फोन की घंटी बज उठी। मध्य प्रदेश शासन की महिला एवं बाल विकास मंत्री ललिता यादव जी का फोन था। परिचित होने के कारण वे आवश्यकता पडने पर हमसे सलाहमशवरा कर लेतीं हैं। बेवाक टिप्पणीकार की पहचान बना चुकी मंत्री ने चाय पर आमंत्रित किया। कारण कुछ खास नहीं था बल्कि लम्बे समय से कार्य की व्यस्तता के कारण औपचारिक मुलाकात भी नही हो सकी थी। सो चाय को माध्यम बना लिया। निर्धारित समय पर हम आमने-सामने थे। अभिवादन से लेकर कुशलक्षेम जानने-बताने की औपचारिकताओं के बाद हमने चित्रकूट में पार्टी की हार को रेखांकित किया, तो वे गम्भीर हो गईं। सामान्य बातचीत के क्रम ने नीतिगत शब्दों का जामा पहन लिया।

साधु-संतों और सनातन धर्म को स्वीकार करने वालों की अधिकता वाले इस क्षेत्र के मतदाताओं की मानसिकता को उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि परिवर्तन के माध्यम से नवीनता प्राप्त करने की इच्छा ही तो है जो समाज को बदलाव की ओर ले जाती है। यहां के चुनावी परिणाम के लिए यही कारक उत्तरदायी है। विरोधियों ने लोकलुभावन वायदों के आधार पर मतदाताओं को रिझाने की कोशिश की। बडी-बडी बातें की। सब्जबाग दिखाये। वहां के लोगों ने आजमाने के लिए ही उन्हें यह मौका दिया है ताकि वे अवसर न मिलने की फिर कभी शिकायत न कर सकें। जिनके पास सक्षम नेतृत्व, स्पष्ट चिन्तन और राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत ही नहीं है, वे जब समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति के विकास की बात करते हैं, तब फिल्मी स्क्रिप्ट में वातनुकूलित संस्कृति में रचा-बचा अभिनेता फटेहाल होने की भूमिका को जीवित करता प्रतीत होता है। जो देश की धरातली वास्तविकता से कोसों दूर हो वह अपने हास्यास्पद कृत्यों के द्वारा लोगों का मनोरंजन तो कर सकता है, परन्तु विरासत में मिली पार्टी की कमान का नेतृत्व कदापि नहीं कर सकता।

कुशल राजनेता की तरह विषय को लम्बा खींचते देखकर हमने उन्हें बीच में ही टोकते हुए रविशंकर द्वारा अयोध्या मुद्दे पर की जाने वाली पहल को भाजपा पोषित कार्यक्रम के आरोप को सामने रख दिया। विपक्ष के आधारहीन विरोध को नकारात्मक सोच का परिचायक निरूपित करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म जब अधर्म बन जाता है तब उसे स्वीकारोक्ति मिलना कठिन ही नहीं असम्भव होती है। यही हाल विपक्ष का है। वह विरोध करने के लिए अनर्गल प्रलाप कर रहा है। कुछ लोग नहीं चाहते कि सौहार्द का वातावरण निर्मित हो। भाईचारा स्थापित हो। सुख-शान्ति आये। यदि यह सब हो जायेगा तो फिर कारणरहित सकारात्मक राजनीति के नये युग की शुरूआत होगी। जहां विरोध के स्थान पर सहयोग का अनुशासन होता है। अहम समाप्त हो जाता है। सामूहिक हित, सामाजिक विकास और मानव धर्म स्थापित होता है। इसे ही ‘राम-राज्य’ कहा जाता है। ‘राम’ शब्द पर जोर देते हुए हमने कहा कि क्या इसी कारण ‘राज्य’ करने के लिए राम का सहारा लिया जा रहा । शब्दों का मर्म समझते हुए उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि हमारे लिए तो जनता जनार्दन है। हम तो सेवक थे, हैं और रहेंगे।

राज्य जैसा शब्द तो शहजादे ही बोल सकते हैं, जो जन्म के आधार पर सत्ता हासिल सपना संजोये बैठे हैं। बातचीत चल ही रही थी कि तभी नौकर ने कमरे आकर सामने रखी टेबिल पर विभिन्न तरह के भोज्य पदार्थों को सजाना शुरू कर दिये। व्यवधान उत्पन्न हुआ। यूं तो अभी ढेर सारे अनुत्तरित प्रश्न बाकी थे, जिन्हें कहीं अन्यत्र प्राप्त करने की मन बनाकर हमने शिष्टाचारवश चल रहे संदर्भ को भी समेटना शुरू कर दिया। उन्होंने आगे बढकर अतिथि सत्कार की परम्परा का निर्वहन किया। भोज्य पदार्थों से भरी तस्तरियां एक-एक कर के हमारे सामने करना शुरू कर दीं। हमने उन्हें बीच में ही रोकते हुए कहा कि आपकी राजनैतिक भूमिका फिलहाल विश्राम कर रही है। अब हम परिचितों के दायरे में हैं। अतः औपचारिकताओं को विराम दें। उन्होंने मुस्कुराते हुए हमारी बात को स्वीकार किया। इस बार इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।



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