मामा, फूफा और जीजा रिश्ते वाले वर्दी आफीसर की पीड़ा
| By- Reeta Vishwakarma - Nov 24 2017 3:10PM

शादी-ब्याह का मौसम चल रहा हो तो रिश्ते में मामा, जीजा, फूफा जैसे लोगों की माँग काफी बढ़ जाती है। मांगलिक अवसर पर होने वाले रस्मों के सकुशल सम्पादन हेतु इन रिश्तों की अहम भूमिका होती है। वर और कन्या पक्ष के लोगों द्वारा मामा, जीजा, फूफा जैसे रिश्तों वाले प्राणियों को सादर आमंत्रित किया जाता है ताकि सारी पारंपरिक रस्में सोल्लास सकुशल निभाई जा सकें। वहीं ये प्राणी भी उस मांगलिक तिथि की बेसब्री से प्रतिक्षा करते हैं जिस पर इन्हें बहैसियत उपरोक्त रिश्तेदार बनकर जाना होता है। यह बहुत कम ही देखा गया है कि रस्म अदायगी पर ये रिश्ते वाले लोग न पहुँचते हों।

परदेस में रहने वाले इस तरह के रिश्तेदार सात समन्दर पार से मांगलिक कार्यक्रम में रस्म अदायगी करने के लिए लकदक होकर पहुँचते हैं। इनकी अगुवानी घर की महिलाएँ बड़े जोश-ओ-खरोश से करती हैं और इन्हीं को लेकर स्वरचित गीत-गानें भी गाती हैं। एक ऐसा मंजर देखने को मिलता है कि मामा, फूफा, जीजा का रूतबा वर, समधी व सहबाले से कहीं अधिक हो। यदि मामा को थोड़ा दूर रखा जाए तो फूफा और जीजा का रूआब कुछ अधिक ही होता है। हालांकि जीजा और फूफा जैसे रिश्तों में एक पीढ़ी का अन्तर होता है लेकिन ये दोनों रिश्ते एक परिवार के ही होते हैं। जिसमें वर्तमान पीढ़ी द्वारा पहले वाले को फूफा और बाद वाले को जीजा कहा जाता है।

यहाँ हम एक ऐसे व्यक्ति की पीड़ा को प्रस्तुत कर रहे हैं जो अपने खास रिश्ते में होने वाले शादी-ब्याह जैसे मांगलिक कार्य में शिरकत नहीं कर सका। ऐसे में उसके अन्तस की पीड़ा भी छलक आई। वह व्यक्ति उम्र के इस मुकाम पर है जहाँ फूफा होते हुए भी एक खूबसूरत जीजा सा दिखाई पड़ता है। एक स्मार्ट, हैण्डसम, गौरवर्णीय (युवा प्रौढ़) लेकिन संयोग यह कि वह एक जिम्मेदार वर्दी ऑफिसर पद पर नियुक्त होने की वजह से चुनाव के अवसर पर पूर्व से ही निर्धारित मांगलिक कार्य जैसे सुनहरे मौके पर नहीं पहुँच सका। जिसका मलाल उसे शायद हमेशा रहेगा। अपनी पीड़ा को उस हैण्डसम, स्मार्ट व्यक्ति ने अपने खास मित्रों से ही साझा किया और कहा कि पुलिस नौकरी सबसे खराब नौकरी होती है, सारा उत्साह धरा का धरा रहा गया।

पत्नी, बच्चे काफी मायूस थे और सबसे ज्यादा मायूसी इस पुलिस आफीसर को थी जो पिछले कई महीनों से बहैसियत फूफा-जीजा मांगलिक कार्यक्रम में पहुँचने की प्रतीक्षा कर रहा था। इसे उस घड़ी का इंतजार था जब इसके पहुँचने पर इसकी हमउम्र और बड़े व छोटे इनका भव्य स्वागत करते और कहते भइया देखो ये फलां के दूल्हा हैं शादी के 20-25 साल बाद भी इनका रंग-रूप पहले की तरह ही दैदीप्य है, और ये हम लोगों का सौभाग्य है कि ये पुलिस डिपार्टमेन्ट में एक तेज-तर्रार व अथक परिश्रमी अफसर के रूप में पहचान रखते हैं। हालांकि उक्त वर्दी आफिसर पर उसकी पत्नी द्वारा पति की व्यस्तता और संवादहीनता की लम्बी अवधि बीतने पर उलाहना देना और यह कहना कि- तेरी दो टकिया दी नौकरी.......हाय-हाय ये मजबूरी.......इससे भी ज्यादा भारी पड़ा उसका वैवाहिक कार्यक्रम में न पहुँच पाना।

आप भी अपने को मामा, फूफा, जीजा जैसे रिश्ते में आत्मसात करके उक्त पुलिस आफीसर की पीड़ा को महसूस करें। -रीता

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सर- फूफा किसे कहते हैं

छात्र- जी, फूफा एक रिटायर्ड जीजा होता है, जिसने एक जमाने में जिस घर में शाही पनीर खा रखा हो और उसे सुबह शाम धुली मुंग की दाल खिलाई जाए, उसका फू और फा करना वाजिब है, इसलिए ऐसे शख्स को फूफा कहना उचित है 😂😝😜

प्र०: फूफा पर निबन्ध लिखिए।

उत्तर: - फूफा: बूआ के पति को फूफा कहते हैं। फूफाओं का बड़ा रोना रहता है शादी ब्याह में। किसी शादी में जब भी आप किसी ऐसे अधेड़ शख़्स को देखें जो पुराना, उधड़ती सिलाई वाला सूट पहने, मुँह बनाये, तना-तना सा घूम रहा हो। जिसके आसपास दो-तीन ऊबे हुए से लोग मनुहार की मुद्रा में हों तो बेखटके मान लीजिये कि यही बंदा दूल्हे का फूफा है! ऐसे मांगलिक अवसर पर यदि फूफा मुँह न फुला ले तो लोग उसके फूफा होने पर ही संदेह करने लगते हैं। अपनी हैसियत जताने का आखिरी मौका होता है यह उसके लिये और कोई भी हिंदुस्तानी फूफा इसे गँवाता नहीं !

फूफा करता कैसे है यह सब?

वह किसी न किसी बात पर अनमना होगा। चिड़चिड़ाएगा। तीखी बयानबाज़ी करेगा। किसी बेतुकी सी बात पर अपनी बेइज़्ज़ती होने की घोषणा करता हुआ किसी ऐसी जानी-पहचानी जगह के लिये निकल लेगा, जहाँ से उसे मनाकर वापस लाया जा सके!

अगला वाजिब सवाल यह है कि *फूफा ऐसा करता ही क्यों है?

दरअसल फूफा जो होता है, वह व्यतीत होता हुआ जीजा होता है। वह यह मानने को तैयार नहीं होता है कि उसके अच्छे दिन बीत चुके और उसकी सम्मान की राजगद्दी पर किसी नये छोकरे ने जीजा होकर क़ब्ज़ा जमा लिया है। फूफा, फूफा नहीं होना चाहता। वह जीजा ही बने रहना चाहता है और शादी-ब्याह जैसे नाज़ुक मौके पर उसका मुँह फुलाना, जीजा बने रहने की नाकाम कोशिश भर होती है।

फूफा को यह ग़लतफ़हमी होती है कि उसकी नाराज़गी को बहुत गंभीरता से लिया जायेगा। पर अमूमन एेसा होता नहीं। लड़के का बाप उसे बतौर जीजा ढोते-ढोते ऑलरेडी थका हुआ होता है। ऊपर से लड़के के ब्याह के सौ लफड़े। इसलिये वह एकाध बार ख़ुद कोशिश करता है और थक-हारकर अपने इस बुढ़ाते जीजा को अपने किसी नकारे भाईबंद के हवाले कर दूसरे ज़्यादा ज़रूरी कामों में जुट जाता है।

बाकी लोग फूफा के ऐंठने को शादी के दूसरे रिवाजों की ही तरह लेते हैं। वे यह मानते हैं कि यह यही सब करने ही आया था और वह अगर यही नहीं करेगा तो क्या करेगा !
ज़ाहिर है कि वे भी उसे क़तई तवज्जो नहीं देते।

फूफा यदि थोड़ा-बहुत भी समझदार हुआ तो बात को ज़्यादा लम्बा नहीं खींचता। वह माहौल भाँप जाता है। मामला हाथ से निकल जाये, उसके पहले ही मान जाता है। बीबी की तरेरी हुई आँखें उसे समझा देती हैं कि बात को और आगे बढ़ाना ठीक नहीं। लिहाजा, वह बहिष्कार समाप्त कर ब्याह की मुख्य धारा में लौट आता है। हालांकि, वह हँसता-बोलता फिर भी नहीं और तना-तना सा बना रहता है। उसकी एकाध उम्रदराज सालियां और उसकी ख़ुद की बीबी ज़रूर थोड़ी-बहुत उसके आगे-पीछे लगी रहती हैं। पर जल्दी ही वे भी उसे भगवान भरोसे छोड़-छाड़ दूसरों से रिश्तेदारी निभाने में व्यस्त हो जाती हैं।

फूफा बहादुर शाह ज़फ़र की गति को प्राप्त होता है। अपना राज हाथ से निकलता देख कुढ़ता है, पर किसी से कुछ कह नहीं पाता। मनमसोस कर रोटी खाता है और दूसरों से बहुत पहले शादी का पंडाल छोड़ खर्राटे लेने अपने कमरे में लौट आता है। फूफा चूँकि और कुछ कर नहीं सकता, इसलिये वह यही करता है।

इन हालात को देखते हुए मेरी आप सबसे यह अपील है कि फूफाओं पर हँसिये मत। आप आजीवन जीजा नहीं बने रह सकते। आज नहीं तो कल आपको भी फूफा होकर मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा हो ही जाना है। अाज के फूफाओं की आप इज़्ज़त करेंगे, तभी अपने फूफा वाले दिनों में लोगों से आप भी इज़्ज़त पा सकेंगे। एक फूफा की दर्द भरी दास्तान, सभी फुफओ को समर्पित || 🙏



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