गोविंद साहब : जहां होता है सत्य से साक्षात्कार
| -Ghanshyam Bhartiya - Nov 27 2017 2:35PM

 मुख्य स्नान पर्व (28 दिसम्बर) पर विशेष 

मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथ राजू। रामचरित मानस की उपरोक्त पंक्तियां इस बात की प्रमाणिकता को सिद्ध करती है कि संतो का समाज वह मंगलकारी समाज है जिसके दर्शन, ध्यान और मनन मात्र से प्रसन्नता व मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। क्योंकि संत समाज चलते फिरते तीर्थ के समान होता है जहां श्रद्धा भाव से पहुंचने पर सभी क्लेश व पाप विनिष्ट हो जाते है।
              सिद्ध पुरूष महात्मा गोविन्द साहब जी महाराज उसी समाज की एक प्रमुख कड़ी है। उनकी तपोस्थली पर प्रति वर्ष अगहन मास के शुक्ल पक्ष के दशमी को श्रद्धालुओं का सैलाब उमडता है। लाखों लोग अपने कष्ट निवारण के लिए गोविन्द सरोवर में डूबकी लगाकर समाधि के दर्शन और मंदिर की परिक्रमा कर खिचड़ी चढ़ाते हैं। यहीं से शुरू हुआ गोविन्द साहब का मेला पूरे एक माह तक भारी गहमा गहमी के साथ चलता हैं। देश के बिगड़े माहौल में        
             इन्सानियत के हो रहे कत्लेआम और मानवीय आदर्शो की लुटती गरिमा के विरूद्ध कौमी एकता और आपसी सौहार्द एवं सद्भाव का संदेश देने वाले इस सिद्ध पुरूष ने अपनी ज्ञान गंगा के बेग से जाति धर्म की ऊंची हो चली दीवारों को तोड़कर मानवता को एक सूत्र में पिरोने में कामयाबी हासिल की थी। उन्होंने सत्य अहिंसा एवं कर्तव्य निष्ठा के प्रति जनता को जागरूक तो किया ही साथ ही भक्ति साहित्य का सृजन कर स्वयं को कबीर और नानक तथा रैदास की श्रेणी में खड़ा कर अमरत्व प्राप्त किया।
               भक्ति, साधना के दौरान सृजित साहित्य के प्रकाश पुंज से समूची मानवता को आलोकित करने वाले महान संत महात्मा गोविन्द साहब जी महाराज का जन्म जलालपुर कस्बे में भारद्वाज गोत्रीय सरयू पारीण ब्राह्मण कुल में संवत 1782 के अगहन मास शुक्ल पक्ष की दशमी को पृथु धर द्विवेदी एवं दुलारी देवी के पुत्र के रूप में हुआ था। बचपन में गोविन्दधर के नाम से जानी गयी यह मणि भारतीय संतो की लम्बी श्रृंखला वाली माला में आज दैदीप्यमान नक्षत्र के रूप में चमक रही है।
             धर्म परायण मां बाप ने बाल्यकाल में ही इनके अन्दर भक्ति भावना का समावेश कर दिया था। साथ ही तारा देवी नामक पति परायण कन्या से विवाह कर गृहस्थ जीवन में भी उतारा था। चूंकि बचपन में इनकी विलक्षण प्रतिभा से लोगो को इस बात का आभास हो गया था कि साधारण ब्राह्नण कुल का यह नन्हा बिरवा आगे चलकर विशाल वट वृक्ष का रूप अवश्य लेगा। जिसके आध्यात्मिक छांव में लोगो को दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से शंति मिलेगी और हुआ भी वही।
               माता पिता की व्यवस्थानुसार प्राथमिक शिक्षा जलालपुर में लेने के बाद गोविन्दधर ज्ञान की राजधानी काशी जाकर विव्दत मण्डली के सत्संग एवं अपनी लगन से अल्प समय में ही प्रकाण्ड विद्वान हो गये। तदुपरांत वे जलालपुर आये जहां सरल व मृदु स्वभाव तथा ओजस्वी वक्तव्यों से जलालपुर वासियों के हृदय में बस गये। इस दौरान भक्ति, साधना और प्रवचन के दौरान बाबा गोविन्द साहब ने थोड़े ही समय में भक्तों की एक लम्बी फेहरिश्त बना डाली। जिसमें वैश्य परिवार में जन्में संत पल्टूदास का नाम प्रमुख है। एक दिन दोनो के मन में कथा प्रवचन और श्रवण के बजाय सत्य की खोज का विचार आया। और दोनो लोग शब्द सोधन में निकल पड़े। पल्टूदास अयोध्या गये और गोविन्द साहब जी महाराज जगन्नाथ पुरी के लिए निकल पड़े।
    अपनी यात्रा के दौरान बाबा गोविन्द साहब भुड़कुड़ा गाजीपुर स्थित गुलाल पंथ के प्रवर्तक गुलाल साहब के आश्रम पहुंचे। जहां गुलाल साहब और उनके सुयोग्य शिष्य भीखा साहब से प्रभावित होकर दीक्षित होने की इच्छा प्रकट की। संतो ने पहले यात्रा पूरी करने फिर दीक्षा लेने की बात कही। आदेशानुसार जगन्नाथपुरी की यात्रा पूरी करने के बाद गोविन्द साहब ने संत प्रखर भीखा साहब से उनके आश्रम में दीक्षा ली और लगातार छः वर्षो तक साधना की आग में स्वयं को तपाकर तमाम सिद्धियां प्राप्त की। इसके बाद भ्रमण करते लोगों को उपदेश देते गोविन्द बाबा तत्समय के अहिरौली के जंगल आये जिसे अपनी साधना स्थली बना लिया। यही साधना स्थली आज उनके तपोस्थली के रूप में विख्यात है और उत्तर प्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर चमक रही है।

               बताते है कि यहां अहिरौली के जंगल मे रहकर साधना करते हुए इनकी ख्याति थोड़े ही दिन में व्यापक रूप ले बैठी और श्रद्धालुओं के आने का क्रम शुरूहो गया। अपने जन्म दिन पर ही ये सार्वजनिक रूप से भक्तों को दर्शन देते थे। इन्हीं कृपा से बलिया के एक व्यापारी की माल बन्दी नाव डूबने से बची। कई निःसंतान दम्पत्तियों को संतान सुख प्राप्त हुआ। आजमगढ़ की एक गायक मण्डली को चमत्कारिक रूप से नेपाल नरेश की कैद से मुक्ति मिली। बताया तो यह भी जाता है कि सैय्यद हजरत मखदूम अशरफ सिमनानी किछौछवी व संत पल्टूदास से भी इनका जबर्दस्त शास्त्रार्थ हुआ और सभी ने शिष्यत्व स्वीकार कर इनकी महानता ही बखानी।
    यही रहकर महात्मा गोविन्दसाहब जी महाराज ने भक्ति साहित्य का सृजन कर यह प्रमाणित किया कि इनकी भक्ति साधना का पक्ष जितना उज्जवल रहा साहित्य का ज्ञान पक्ष उससे कम नहीं रहा। तमाम पदो, छंदो, भजनों का सृजन कर बाबा गोविन्द साहब ने स्वयं को कबीर, नानक, दादू दयाल और रैदास की कोटि में खड़ा किया। सत्य, अहिंसा और एकता का संदेश देकर महात्मा गोविन्दसाहब जी महाराज सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का बीजारोपण कर संवत 1879 के फाल्गुन कृष्णपक्ष एकादशी को अपने भक्तों को अंतिम उपदेश देकर ब्रह्नलीन हो गये। आज उनकी समाधि स्थली पर भव्य मंदिर और इसी से सटा गोविन्द सरोवर लाखों लोगो की श्रद्धा व आस्था का केन्द्र बना है।
          इनकी शिष्य परम्परा के छठवी पीढ़ी के महन्त कोमलदास ने इस मंदिर व सरोवर का जीर्णोद्वार कराया। जिसके प्रति जन आस्था को देखते हुए कैबिनेट मंत्री स्व0 रामलखन वर्मा के प्रयास से उत्तर प्रदेश सरकार ने डेढ़ दशक पूर्व एक तपोस्थली को पर्यटन स्थल घोषित कर सौन्दर्यीकरण भी कराया। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि यहां धवल संगमरमर के पत्थरों से निर्मित आलीशान मंदिर और उनके अंदर बनी बाबा की समाधि के दर्शन मात्र से मन में उस महामानव का चित्र अंकित हो जाता है। लाखों लोगो की आस्था व श्रद्धा का केन्द्र का केन्द्र बना यह पवित्र धाम भक्ति साधना का अद्भुत संगम है। यहां लोगो का सत्य से साक्षात्कार होता है। यद्यपि यहां का मुख्य स्नान पर्व कल 28 दिसंबर को है परंतु आज रात से ही यहां के पवित्र सरोवर में श्रद्धालुओं का असनान शुरू हो जाएगा।



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