बांसुरी की सशक्त तरंगों से उत्पन्न होता है आकर्षण
| Dr. Ravindra Arjariya - Dec 1 2017 8:58PM

आधुनिकता के परिवेश में तनाव का बाहुल्य चारों तरफ देखने को मिल रहा है। भौतिक विलासता की ओर बढ रही प्रवृतियों ने रागात्मक पक्षों को हाशिये पर छोड दिया है। कला, साहित्य और संगीत की आवृतियां, सीधे साक्षात्कार के स्थान पर यांत्रिक रूप में परिवर्तित होने लगी है। कलाकारों की एक बडी संख्या अपनी साधना की प्रशंसा में दो शब्द सुनने को तरसने लगी है। तनाव को दूर करने वाला संगीत भी कहीं गुम सा हो गया है। कृष्ण की बांसुरी से लेकर कबीर की अल्हड गायकी तक को खोज पाना कठिन होता जा रहा है। समय-चक्र में विभाजित रागों का वर्गीकरण पर्यावरणीय असंतुलन की भेंट चढ चुका है। शास्त्रीय विधाओं के महारथी विरले ही बचे हैं और पहुंचने लगे हैं अल्पसंख्यक की परिभाषा में गुरू-शिष्य परम्पराओं का निर्वहन करने वाले साधक। वर्तमान परिस्थितियों में शास्त्रीय संगीत की विरासत को सहज पाने की चुनौती, किसी यक्ष प्रश्न की तरह मन में उभरने लगी। इसी दौरान हमें गुरूग्राम में आयोजित एक महासाधना शिविर का आमंत्रण प्राप्त हुआ। महासाधना शब्द के मोहपाश में बंधकर साध्य तक पहुंचने की चेष्टा की। उस चार दिवसीय कार्यक्रम में देश के उच्चकोटि के संगीत-साधकों ने भागीदारी दर्ज की।

सत्र की समाप्ति के बाद बांसुरी के सुरों को अध्यात्मिक दर्शन के साथ मिलाकर प्रस्तुत करने वाले डा. मोहन पलारिया से चाय की टेबिल पर मुलाकात हुई। पहला परिचय ही मित्रवत संबंधों की आधारशिला बन गया। शिविर के दूसरे दिन विस्त्रित बातचीत के लिए समय और स्थान निर्धारित कर लिया गया। अगले दिन हम पूर्व निर्धारण के अनुसार आमने-सामने थे। औपचारिकताओं और कुशलक्षेम पूछने-बताने का क्रम समाप्त होते ही हमने मन में उभरे यक्ष-प्रश्न का उत्तर तलाशना शुरू कर दिया। सृष्टि के निर्माण में संगीत के योगदान की पौराणिक व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि स्कन्द पुराण के केदार खण्ड में नाद का व्यापक वर्णन है। नाद को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है।

देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप राग का चयन करके उसे उपचार, समाधान तथा आनन्द के लिए प्रयुक्त किया जाता रहा है। संगीत की तरंगों से अभीष्ट प्राप्ति तक सम्भव है। आहद-नाद को साकार और अनाह-दनाद को निराकार माना जाता है। कानों को अंगुलियों से बंद करने के बाद भी ध्यान से सुनने पर एक ध्वनि का आभास होता है, यही अनाहद-नाद है। संगीत के इतिहास पर ज्ञानार्जन करने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं था, सो बीच में ही टोक दिया। संगीत के शास्त्रीय पक्ष की लोकप्रियता में आने वाली कमी और आम आवाम द्वारा उसके उपयोग होने वाली गिरावट से संबंधित प्रश्न करते हुए हमने संगीत की अनन्त क्षमताओं को रेखांकित करने का निवेदन किया। गायन, वादन, नृत्य तथा शास्त्र सहित चार भागों में संगीत का वर्गीकरण करते हुए उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संस्कृत की भौंडी नकल करने वाले नवकुबेरों के फैशन में, शुमार हो चुकी समझ से परे गायकी और कानफोडू संगीत के कोलाहल को, कान्वेन्ट कल्चर में परवरिश पाने वाले युवा भले ही अपना आदर्श मानते हों परन्तु समाज का एक तबका अभी भी शास्त्रीय संगीत की कद्र करता है।

तनाव मुक्ति से लेकर चिकित्सा जगत तक में संगीत के अभिनव प्रयोग किये जा रहे हैं। श्वेत क्रांति में संगीत की स्वर लहरियों से दूध उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है। इस दिशा में किये गये प्रयोगों को वैज्ञानिक स्वीकृति भी मिल चुकी है। रेखांकित प्रश्न के विस्त्रित होते उत्तर को नई दिशा हेतु हमने कृष्ण के श्रंगारिक आकर्षण और बांसुरी की ध्वनि-तरंगों में स्थापित संबंध को स्पष्ट करने के लिए कहा। पुरातन वाद्य यंत्रों की सीमित अभिव्यक्ति-क्षमता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बांसुरी ही एकमात्र ऐसा वाद्ययंत्र है जिसमें जीवन के विभिन्न पहलुओं से जुडे सभी नौ रसों को उत्पन्न करने की क्षमता है। यही कारण है कि नटखट श्याम सुन्दर से योगेश्वर तक की यात्रा में मुरली का विशेष योगदान है।

बांसुरी की सशक्त तरंगों से उत्पन्न ऊर्जा ही आकर्षण उत्पन्न करती है, सम्मोहन पैदा करती है और कराती है अभीष्ट की प्राप्ति। ध्यान, एकाग्रता तथा साधना के लिए प्रयुक्त होने वाले संगीत में बांसुरी का बहुतायत प्रयोग होता है। तरंगों को अनन्त तक फैलाने की क्षमता बांसुरी में सर्वाधिक है। इसीलिए प्राकृतिक प्रकोपों से निदान तथा लौकिक समस्याओं के समाधान हेतु निर्धारित संगीत में बांसुरी का प्रयोग आवश्यक किया जाता है।

हमारे अनुरोध पर उन्होंने अनेक रागों के अद्भुद संयोजन पर आधारित एक संगीत प्रस्तुति भी दी। इस दौरान अन्तःकरण में एकाग्रता के अनेक चरण स्वतः ही घटित होते रहे और कब समय पंख लगाकर उड गया, पता ही नहीं चला। इस सप्ताह बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज। 



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