युगदृष्टा डा. भीमराव अम्बेडकर
| Rainbow News - Dec 6 2017 11:39AM

6 दिसम्बर/महापरिनिर्वाण विशेष

-राजेश कश्यप/ डॉ. भीमराव अम्बेडकर बहुत बड़े युगदृष्टा थे। उन्होंने अछूतों व दलितों की मुक्ति के अभिशाप की थाह और उससे मुक्ति की राह स्पष्ट रूप से देख ली थी। इसीलिए, उन्होंने आजीवन गरीबों, मजदूरों, अछूतों, दलितों, पिछड़ों और समाज के शोषित वर्गों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आदि हर क्षेत्र में बराबर का स्थान दिलाने के लिए अनूठे संघर्ष किए और अनंत कष्ट झेले। उन्होंने समाजसेवक, शिक्षक, कानूनविद्, पदाधिकारी, पत्रकार, राजनेता, संविधान निर्माता, विचारक, दार्शनिक, वक्ता आदि अनेक रूपों में देश व समाज की अत्यन्त उत्कृष्ट व अनुकरणीय सेवा की व अपनी अनूठी छाप छोड़ी। डॉ. भीमराव अम्बेडकर को वर्ष 1990 में देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत-रत्न’ से अलंकृत किया गया।

डा. भीमराव रामजी अम्बेडकर जी का जन्म 14 अपै्रल, 1891 को मध्य प्रदेश में इंदौर के निकट महू छावनी में एक महार जाति के परिवार में हुआ। विकट और बुरे दौर में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म हुआ था। सामाजिक कुरीतियों के चलते उन्हें अछूत के नाम पर प्रतिदिन अनेक असहनीय अपमानों और यातनाओं का सामना करना पड़ता था। वर्ष 1907 में उन्होंने मैट्रिक, वर्ष 1912 में बी.ए. की परीक्षा, 1915 में एम.ए. की डिग्री और वर्ष 1916 में अर्थशास्त्र में अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. पूरी की। जनवरी, 1923 में उन्हें डी.एस.सी. अर्थात डॉक्टर ऑफ  साईंस की उपाधि प्रदान की गई। लंदन के ‘गेज इन’ से उन्होंने बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे 3 अपै्रल, 1923 में डॉक्टर ऑफ साईंस, पी.एच.डी. और बार एट लॉ जैसी कई बड़ी उपाधियों के साथ स्वदेश लौटे।

स्वदेश लौटकर उन्होंने मुंबई में वकालत के साथ-साथ अछूतों पर होने वाले अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाना शुरू कर दिया। अपने आन्दोलन को अचूक, कारगर व व्यापक बनाने के लिए उन्होंने ‘मूक नायक’ पत्रिका भी प्रकाशित करनी शुरू की।  वर्ष 1927 में उन्होंने ‘बहिष्कृत भारत’ नामक एक पाक्षिक मराठी पत्रिका का प्रकाशन करके अछूतों में स्वाभिमान और जागरूकता का अद्भूत संचार किया। उन्हें  वर्ष 1927 और 1932 में मुंबई विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया। वर्ष 1929 में उन्होंने ‘समता समाज संघ’ की स्थापना की। उन्होंने वर्ष 1936 में ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ की स्थापना करके अपने घोषणा पत्र में अछूतों के उत्थान का स्पष्ट एजेण्डा घोषित कर दिया। वर्ष 1937 के आम चुनावों में डॉ. अम्बेडकर को भारी बहुमत से अभूतपूर्व विजय हासिल हुई और कुल 17 सुरक्षित सीटों में से 15 सीटें नवनिर्मित ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ के खाते में दर्ज हुईं। वे 12 वर्ष तक बम्बई में विधायक रहे। इसी दौरान वे बम्बई कौंसिल से ‘साईमन कमीशन’ के सदस्य चुने गए। उन्होंने लंदन में हुई तीन गोलमेज कांफ्रेंसों में भारत के दलितों का शानदार प्रतिनिधित्व करते हुए दलित समाज को कई बड़ी उपलब्धियां दिलवाईं।

वर्ष 1942 में उन्हें गर्वनर जनरल की काऊंसिल का सदस्य चुन लिया गया। उन्होंने शोषित समाज को शिक्षित करने के उद्देश्य से 20 जुलाई, 1946 को ‘पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी’ नाम की शिक्षण संस्था की स्थापना की। इसी सोसायटी के के तत्वाधान में सबसे पहले बम्बई में सिद्धार्थ कालेज शुरू किया गया और बाद में उसका विस्तार करते हुए कई कॉलेजों का समूह बनाया गया। 29 अगस्त, 1947 को डॉ. भीमराव अम्बेडकर को संविधान निर्मात्री सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष पद पर सुशोभित किया गया। उन्होंने संविधान में यह प्रावधान रखा कि, ‘किसी भी प्रकार की अस्पृश्यता या छुआछूत के कारण समाज में असामान्य उत्पन्न करना दंडनीय अपराध होगा’। इसके साथ ही उन्होंने अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों में आरक्षण प्रणाली लागू करवाने में भी सफ लता हासिल की। उन्होंने महिलाओं की सामाजिक व आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने पर पर बराबर बल दिया। 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया और इसे 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया गया। इस संविधान के पूरा होने पर डॉ. अम्बेडकर के आत्मिक उद्गार थे कि, ‘‘मैं महसूस करता हूँ कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है, पर साथ ही इतना मजबूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोडक़र रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब था, बल्कि इसका उपयोग करने वाला अधम था।’’

1949 में उन्हें स्वतंत्र भारत का प्रथम विधिमंत्री बनाया गया। वर्ष 1950 में डॉ. अम्बेडकर श्रीलंका के ‘बौद्ध सम्मेलन’ में भाग लेने के लिए गए और बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों से अत्यन्त प्रभावित होकर स्वदेश लौटे। उन्होंने वैचारिक मतभेदों के चलते वर्ष 1951 में विधिमंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया। वे वर्ष 1952 से वर्ष 1956 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। देश व समाज में दलितों, शोषितों व अछूतों को अन्य जातियों के समकक्ष लाने के लिए उन्होंने 1955 में ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ की स्थापना की और 14 अक्तूबर, 1956 में अपने 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर एक नए युग का सूत्रपात कर दिया। उनका मानना था कि अछूतों के उत्थान और पूर्ण सम्मान के लिए यही एकमात्र अच्छा रास्ता है। उन्होंने अपने जीवन में दर्जनों महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी पुस्तकों और ग्रन्थों की रचनाएं कीं।

डा. अम्बेडकर का साफ  मानना था कि  ‘‘अस्पृश्यता गुलामी से भी बदतर स्थिति है। यह एक सामाजिक बुराई है और भारत पर एक बदनुमा दाग है। गैर-बराबरी की व्यवस्था, लोकतांत्रिक देश पर काला धब्बा है।’’ डा. अम्बेडकर के अनुसार ‘‘किसी का शोषण करना, मानवता के खिलाफ  है। समस्त मानव एक समान हैं।’’ डा. अम्बेडकर का मानना था कि ‘‘देश की सभी समस्याओं की जड़ जातिवाद है। जातिवाद ने ही आम आदमी की भावना को कुचला है। वर्ण और जातियां राष्ट्र विरोधी हैं। जातिविहीन समाज की स्थापना के बिना सच्ची आजादी नहीं आयेगी।’’ डा. अम्बेडकर ने देश में व्याप्त छूत-अछूत जैसी भयंकर बुराईयों पर कड़े प्रहार करते हुए कहा था कि ‘‘छुआछूत की भावना हिन्दू वर्ग के लिए उचित नहीं है। छुआछूत का भेदभाव हिन्दु धर्म पर एक कलंक है। सम्मानजनक जीवन जीना मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है।’’ उन्होंने महिलाओं के संबंध में कहा कि ‘‘किसी भी समाज की प्रगति का अनुमान, समाज में महिलाओं की प्रगति से लगाना चाहिए। महिलाओं के बिना हमारा आन्दोलन सफ ल नहीं हो सकता।’’

वे कहते थे कि ‘‘अवतारवाद, स्वर्ग, नरक, भाग्य, भगवान, पुनर्जन्म सब झूठ हैं। आप इस बात को त्याग दें कि दु:ख पूर्व निर्धारित हैं और आपकी गरीबी पिछले जन्मों के कर्मों का फ ल है।’’ वे धर्म की बजाय कर्म को प्रधान मानते थे। वे कहते थे कि ‘‘धर्म का आधार नैतिकता और मनुष्य है। धर्म मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य धर्म के लिए। धर्म को व्यक्तिगत जीवन तक सीमित रखना ही श्रेयस्कर होता है। यदि धर्म असहाय समाज की प्रगति में बाधक है तो उसे त्याग दो। जो धर्म एक व्यक्ति को निरक्षर व दूसरे को साक्षर बनाना चाहता है, वह धर्म सही नहीं है।’’ डा. अम्बेडकर भाग्य और ईश्वर में कभी विश्वास नहीं करते थे। उनका मानना था कि ‘‘भाग्यवाद व्यक्ति को बुजदिल, कायर, दब्बू व कमजोर बनाता है।’’ उनका तो यहां तक कहना था कि ‘‘यदि ईश्वर असहाय समाज की प्रगति में बाधक है तो उसे त्याग दो।’’ उनका स्पष्ट कहना था कि ‘‘ शिक्षा ही मनुष्य के सर्वांगीण विकास का मार्ग है।’’

डा. अम्बेडकर ने देश को आगाह करते हुए कहा था कि ‘‘भारत के संविधान के उद्देश्य को तोडऩा राष्ट्रद्रोह के समान होगा। सावधान कानून सिर्फ  कागजों पर ही न रह जाए।’’ उन्होंने कहा कि ‘‘जहां सहनशीलता समाप्त हो जाती है, वहां क्रांति का उदय होता है। जुल्म करने वाले से जुल्म सहने वाले अधिक गुनहगार होता है। न्याय और अधिकार मांगने से नहीं मिलते, उन्हें लडक़र लिया जाता है। डा. अम्बेडकर कहते थे कि ‘‘जिस समाज में हमारा जन्म हुआ है, उसका उद्वार करना हमारा कत्र्तव्य है। चरित्र ही स्वस्थ समाज की बुनियाद होता है।’’ उन्होंने अपनी अंतिम अभिलाषा इस सारगर्भित सन्देश के माध्यम से प्रकट करते हुए कहा था कि ‘‘ जिस कारवां को मैं यहां तक लाया हूँ, उसे आगे नही ंतो पीछे भी न जानें दें। मेरे उठाए हुये कार्यों को पूरा करना ही मेरा सबसे बड़ा सम्मान है।’’ इस महान आत्मा को कोटि-कोटि नमन है।



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