लहसुन बेचारा! सब्जी या मसाला? है तो जीएसटी का मारा
| Rainbow News - Dec 7 2017 12:41PM

-ऋतुपर्ण दवे/ जीएसटी को लेकर जहां शुरू से ही ऊहापोह है। हमेशा कुछ नया, कुछ अलग, कुछ सुधार तो कुछ संभावनाओं की बातें होती रहती हैं। वहीं इसी से जुड़ा एक अलग मामला इन दिनों राजस्थान हाईकोर्ट में चल रहा है। क्या लहसुन मसाला है या सब्जी और इसका जीएसटी से कैसा वास्ता? मामला रोचक है साथ ही दिलचस्प भी लेकिन उससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात इसके मूल में है क्योंकि असल वजह है इस पर कभी लगने तो कभी नहीं लगने वाला जीएसटी!

लहसुन जब सब्जी बन बिकता है तो जीएसटी से मुक्त होता है और जब मसाला बनता है तो जीएसटी के दायरे में। ऐसे में कारोबारियों में भी खासी भ्रम की स्थिति बनी रहती है। अक्सर ग्राहकों और उनके बीच नोकझोंक भी होती है। मजेदार यह है कि सरकार ने भी इसे सब्जी और मसाला दोनों श्रेणियों में रखा है। इसी से कहीं ग्राहकों को लहसुन सस्ता मिलता है तो कहीं महंगा। यही वजह है जो लहसुन की कीमत को लेकर बाजार में भ्रम रहता है। पूरी हकीकत भी यही है और इसी कारण जोधपुर के आलू,प्याज, लहसुन विक्रेता संघ ने एक जनहित याचिका हाईकोर्ट में दायर कर कहा कि सरकार ने लहसुन को सब्जी और मसाला दोनों श्रेणी में रखा हुआ है जिससे इस पर जीएसटी को लेकर पशोपेश की स्थिति बन गई है। सब्जी के रूप में बेचने पर लहसुन पर जीएसटी नहीं लगता है तो मसाले के रूप में बेचने पर जीएसटी लगने लगता है। वहीं सब्ज़ी मंडी में बेचने पर बिचौलिओं का कमीशन छह प्रतिशत होता है जबकि अनाज मंडी में इसी पर केवल दो प्रतिशत कमीशन होता है। बस यही लहसुन बेचने वालों की परेशानी का सबब है।

इस जनहित याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि वह स्पष्ट करे कि टैक्स के लिहाज से लहसुन सब्जी है या मसाला? भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि असल में लहसुन मूलत: सब्ज़ी है जिसका इस्तेमाल मसाले के तौर पर भी होता है। मसाला बनाने के लिए इसे विशेष रूप से प्रोसेस किया जाता है। यह भी हकीकत है कि एक तो लहसुन हमेशा से ही सब्जी मण्डी में ही बिकता रहा है। कभी भी इसे अनाज मण्डी में नहीं बेचा गया और न बिकते देखा गया। दूसरा इसकी खेती भी सब्जी के रूप में होती रही है। मामले में 5 दिसंबर को जवाब पेश होना था, लेकिन किसी कार्यक्रम की वजह से अदालती कार्यवाही एक घंटा कम चली और उस दिन सुनवाई नहीं हो पाई। यद्यपि यह थोड़ा हंसी-मजाक का भी मामला है लेकिन असल सच्चाई यह है कि राजस्थान सरकार के 2016 के नए कानून के मुताबिक लहसुन को अनाज मंडी में बेचा जाएगा जबकि पहले यह सब्जी मंडी में बिकता था।

इसके पीछे भी एक कहानी है पिछले 50 बरसों से लहसुन सब्ज़ी मंडी में बिका करता था और किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। समय के साथ सब्ज़ी मंडियां छोटी पड़ने लगी वहीं साल 2016 में लहसुन की बंपर पैदावार हुई तो सरकार ने लहसुन की सब्जी मण्डी में व्यवस्था करने के बजाए कानून में ही  बदलाव कर दिया और लहसुन को अनाज मंडी में बेचने का प्रवाधान बना दिया। इसी 6 दिसंबर को जवाब पेश किया गया जिसमें अतिरिक्त महाधिवक्ता श्याम सुंदर ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने लहसुन के कंद अनाज मण्डी में बेचने के लिए राजस्थान कृषि उत्पादन बाजार एक्ट 1962 का अगस्त 2016 में संशोधन किया। संशोधन किसानों के हित में था क्योंकि प्रदेश में जब भी लहसुन का भारी उत्पादन होता है तो इसकी कीमतें गिर जाती हैं।

वहीं सब्जी मण्डी में भी जगह कम होने से लहसुन सही कीमत पर नहीं बिक पाता है इसीलिए सरकार ने किसानों को लहसुन खुले अनाज मार्केट में भी बेचने के आदेश दिए थे। लेकिन यदि अनाज मण्डी में भी लहसुन बेचा जा रहा है तो भी उसमें कोई टैक्स नहीं लगता। इसके विपरीत उन्हें अनाज मार्केट में सिर्फ 2 फीसदी कमीशन बिचौलिये को देना पड़ता है। जबकि सब्जी मार्केट में बिचौलियों का कमीशन 6 फीसदी है। इस जवाब से एक तरह से सरकार का रुख तो साफ हो गया है जिसमें लहसुन कहीं भी बेचें टैक्स नहीं लगेगा। लेकिन याचिका में मूल याचना है कि सरकार ने लहसुन को सब्जी और मसाला दोनों ही श्रेणी में रखा है। सब्जी के रूप में लहसुन के बिकने पर जीएसटी नहीं लगता और मसाले के रूप में बेचा जाए तो जीएसटी लगता है। ऐसे में उन्हें लहसुन को किस श्रेणी में रखना बेचना है? जाहिर है इसका फैसला राजस्थान हाईकोर्ट को ही करना है और अब सबकी निगाहें अदालत की फैसले पर हैं।



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