.....दिसम्बर गुजर रहा है
| Posted by- Editor - Dec 14 2017 12:14PM

जीव जब प्राणी के रूप में जन्म लेता है और ऊपर वाले की असीम अनुकम्पा से मानव योनि को प्राप्त होता है उसी समय से उसके माँ के गर्भ से बाह्य संसार में आगमन पर विज्ञान और साहित्य का संयुक्त समावेश उसके क्रिया-कलापों से परिलक्षित होने लगता है। नवजात जब रोता है तो निकलने वाली ध्वनियाँ जहाँ साहित्य का बोध कराती हैं वहीं रोने की क्रिया विज्ञान का। तात्पर्य यह कि चाहे किसी ने विज्ञान की शिक्षा ली हो या न ली हो वह जन्मजात प्रकृति प्रदत्त विज्ञानी होता है साथ ही माँ सरस्वती की कृपा से एक कुशल साहित्यकार भी। हम यहाँ विज्ञान में परास्नातक तक की शिक्षा ग्रहण कर सरकारी सेवा में अपना योगदान देने वाले एक रचनाकार की पहली रचना जो हमें प्राप्त हुई है उसका प्रकाशन कर रहे हैं।

हम बात कर रहे हैं युवा रचनाकार अंशुमाली शंकर के बारे में जो उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जनपद में जिला खाद्य विपणन अधिकारी के पद पर नियुक्त हैं। अपने विभागीय दायित्वों का बखूबी निवर्हन करने के साथ-साथ एक साहित्यानुरागी की तरह साहित्य का अवलोकन, अध्ययन व सृजन भी कर रहे हैं। विभागीय कार्यों की व्यस्तता, जीवन की भाग-दौड़ में ऐसा कर पाना मुश्किल होता है फिर भीं युवा रचनाकार अंशुमाली शंकर का यह कार्य अवश्य ही सराहनीय कहा जा सकता है।

सुधी पाठकों और साहित्यानुरागियों, समीक्षकों, रचनाकारों के समक्ष रचनाकार अंशुमाली शंकर की नवसृजित रचना प्रस्तुत है।

 

 ....दिसम्बर गुजर रहा है 

 

मयस्सर डोर से फिर एक मोती झड़ रहा है,
तारीखों के जीने से दिसम्बर उतर रहा है।

कुछ चेहरे घटे, चन्द यादें जुड़ी गए वक्त में,
उम्र का पंछी नित दूर और दूर उड़ रहा है।

गुनगुनी धूप और ठिठुरती रातें जाड़ों की,
गुजरे लम्हों पर झीना-झीना पर्दा गिर रहा है।

मिट्टी का जिस्म एक दिन मिट्टी में ही मिलेगा,
माटी का पुतला किस बात पर अकड़ रहा है।

जायका लिया नहीं और फिसल रही है जिन्दगी,
आसमां समेटता वक्त बादल बन उड़ रहा है।

.....फिर एक दिसम्बर गुज़र रहा है।



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