संक्रमणकाल से गुजर रहीं है रागात्मक अभिव्यक्तियां
| Dr. Ravindra Arjariya - Dec 17 2017 3:55PM

‘साहित्य, संगीत और कला के बिना मनुष्य बिना पूंछ का जानवर होता है’, इस वाक्य को कहावत के रूप में चरितार्थ करने वाला वर्ग आज अपनी पहचान तलाशने का प्रयास कर रहा है। साहित्य के नाम पर मनमाना लेखन, संगीत के धरातल पर पश्चिमी वाद्ययंत्रों का शोर और कला के क्षितिज पर अनुशासनविहीन तूलिका ने वर्चस्व जमा लिया है। परम्परागत शैलियां हाशिये के बाहर पहुंचा दी गईं हैं। रसखान जैसे कवियों, तानसेन जैसे संगीतज्ञों और दामोदर जैसे चित्रकारों को आज ढूंढना पड रहा है जबकि इन शैलियों के सैकडों नहीं हजारों नाम रोजनामचों पर दर्ज हो रहे हैं। गोष्ठियों के नाम पर मिलने वाली सरकारी राशि में एक बडे भाग का बंदरबाट करने की होड सी मची है। ऐसे में भावनात्मक थाथी लेकर समाज का अंग बनने वाली प्रतिभायें आज खुले आसमान के नीचे सोने पर मजबूर हैं और लाचार हैं वास्तविक हस्ताक्षर भी, जो अंकुरित प्रतिभाओं को चाहकर भी संरक्षण नहीं दे पा रहे हैं।

इसी लाचारी की पीडा झेल रहे चर्चित कथाकार महेन्द्र ‘भीष्म’ से अचानक हिंदी साहित्य सम्मेलन के एक कार्यक्रम में मुलाकात हुई। आयोजन के मुख्य अतिथि की गरिमा से उन्होंने ‘क्या कहें’ कहानी में अनकही पीडा व्यक्त की। कार्यक्रम के समापन के बाद वे स्वल्पाहार के दौरान हम से मुखातिब हुए। पुराना परिचय था, सो बिना किसी औपचारिकता के साहित्य जगत को रेखांकित करते हुए चर्चा शुरू हो गई। भूत के सुखद अनुभवों पर वर्तमान के अवरोधों को विवेचना में लिया गया ताकि भविष्य की तस्वीर स्पष्ट हो सके। धन-बल से भौतिक सुखों की होड में लगी मानवीय काया की विस्त्रित विवेचना करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में मानसिक संतुष्टि से पलायन किया जा रहा है। शारीरिक विलासता के साधन जुटाये जा रहे हैं। आधुनिकता की अंधी होड में पाश्चात्य की भौडी नकल की जाने लगी है या फिर किसी निर्धन कलम की सशक्त रचना पर स्वयं का नाम लिखकर ढिंढोरा पीटने की नीति अपनाई जा रहा है। दौनों ही स्थितियों को सुखद कदापि नहीं कहा जा सकता।

आज संक्रमणकाल से गुजर रहीं है रागात्मक अभिव्यक्तियां। ‘स्वान्तः सुखाय’ बनकर रह गया है वास्तविक सृजन। पन्नों पर लिखे अलंकरण, कैनवासों पर चढती गुबार और अभ्यास कक्ष में गूंजती ध्वनियां, आज बूढी सी हो चलीं हैं। उन्हें संरक्षण देने के खोखले दावे तो पडोसिन बुढिया की सेवा से मिलने वाले पदक की तरह हो गये हैं जिस पर इतराती सांसों ने अपनी मृत्यु-सैय्या कराहती मां की जर्जर होती काया को चारपाई के अधटूटे धागों के बीच झूलने के लिए छोड दिया है। उन्हें भावुकता की भंवर से बाहर लाकर धरातल की कठोर धरती का अहसास करते हुए हमने कहा कि यह सब कुछ हिंदी या हमारी क्षेत्रीय भाषाओं के साथ हो रहा है या समूचा विश्व भी इसकी चपेट में है। अन्य भाषाओं तथा देशों की सजगता के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी में पहचान बनाकर चमकने वाले धरती के लोग भी आज अंग्रेजी के आसमान में उडने लगे हैं। फिल्मी दुनिया से लेकर हिंदी की वकालत करने वाले ठेकेदारों की दुकाने भी अंग्रेजी के तलुये चाटने में गौरव महसूस करती है। आदमी से सितारा बन चुके लोग हिंदी को कमाई का धंधा या मूर्खों को बेचे जाने वाला कचरा सामान बनाने में जुटे हैं। इसके लिए अब माफियागिरी के फारमूले भी आजमाये जाने लगे हैं ताकि स्वतंत्र भारत की बची-खुची सांस्कृतिक विरासत को भी नस्तनाबूत किया जा सके। यह पूरा षडयंत्र योजनावद्ध ढंग से संचालित हो रहा है।

उनकी विवेचना को बीच में ही रोकते हुए हमने बिना भूमिका के समस्या की जड तक पहुंचने की बात कही। राष्ट्रीयता की भावना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि स्वयं की पहचान पर गर्व करने, उसे ही सर्वोच्च मानने तथा वंशानुगत रूप से हस्तांतरित करने की अनिवार्यता के बिना अपनी परम्परागत पहचान को बचा पाना बेहद कठिन है। जापान, चीन जैसे देश आज भी अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने संस्कारों को न केवल जीवित रखे है बल्कि उनको पोषण देकर विकसित करने में भी जुटे हैं। हमारी पुरातन धरोहर आक्रान्ताओं की भेट चढ गई और शेष को चाटुकारों ने फलीदा लगा दिया। अंग्रेजियत के शिकंजे में जकडे गुलामी पर गर्व करने वाले बचे-खुचे अस्तित्व को भी समाप्त करने में जुटे हैं। संरक्षण के नाम पर आवंटित होने वाली धनराशि तो भाई-भतीजावाद, चमचागिरी और बंदरबाट की तिकडी को भेंट करने के लिए ही आवंटित होती हैं ताकि आंकडों की स्याही से विकास की इबारत लिखी जा सके।

दूसरी ओर वास्तविक रचनाकार को अपनी तपस्या के बदले में दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो पाती। जीवकोपार्जन के लिए उसे किसी साधना के अलावा धंधे, नौकरी या फिर छोटे-मोटे व्यवसाय को अंगीकार करना पडता है। वर्तमान परिस्थितियों में रचनाकार मात्र निरीह प्राणी बनकर रह गया है। चर्चा चल ही रही थी कि तभी फोन की घंटी बज उठी। नम्बर देखा तो अचानक याद आया कि हमारे साथ एक अन्य मित्र भी कार्यक्रम में आये हैं जिन्हें वापिस घर तक पहुंचाने का हमने पहले ही वायदा कर दिया था। वे थोडी दूर खडे मंद-मंद मुस्कुराते हुए हमें व्यंगात्मक नजरों से घूर रहे थे। सो चर्चा को अन्तिम सोपान पर पहुंचाते हुए  हमने इस विषय पर फिर कभी लम्बी बातचीत का वायदा करके ‘भीष्म’ जी से विदा ली। इस बार बस इतनी ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।



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