निजी क्षेत्रों में चलने वाले विद्यालय बने लूट का अड्डा : डॉ मेला
| Dr. Anil Upadhyay 'Mela' - Dec 21 2017 4:20PM

अभिभावकों की जेबें ढीली करने में लगे हैं शिक्षा माफिया

शिक्षा माफियाओं द्वारा ऊंची अट्टालिकाओं का निर्मॉण कर उस पर रंग बिरंगे कलर, बसों की एक लंबी कतार, इसके साथ ही केरल के अंग्रेजी बोलने वाले चंद तड़क-भड़क के इगलिश टीचर का आडंबर खड़ा करके अभिभावकों की जेब ढीली करने का कुचक्र रचे है। ऐसे प्रबंधकों और उनके द्वारा खड़ी की गई यह ऐसी टीम है जो विज्ञापन के जरिए बच्चों को ऊंची शिक्षा दिलाने के नाम पर कहीं ना कहीं भावनात्मक ब्लैक मेलिंग कर रहे हैं।

एक तरफ सरकार सरकारी स्कूलों के प्रोत्साहन के लिए तरह तरह के संसाधन जुटा रही है इसी के साथ ही साथ योग्य शिक्षकों की फौज खड़ी कर रही है, जबकि प्राइवेट विद्यालयों में अमानत पूर्ण शिक्षक एवं कहीं ना कहीं गुणवत्ता विहीन शिक्षा जो भारतीय परिवेश के लिए कदाचित अच्छी नहीं साबित हो सकती। पर अभिभावक की नजर ठहर जाती है वह सदैव अपनी जेब ढीली कराने के लिए आतुर दिखते हैं कि हमारा बच्चा समाज में ऊंचा स्थान पा जाएगा। मेरी खुद की भी नाक ऊंची होगी कि....मेरा बच्चा फला विद्यालय में पढ़ता है।

दिल्ली महानगर के रेयान इंटरनेशनल से शुरू होकर फैजाबाद के टाइनी टाटस विद्यालय के नाम तो महज़ एक बानगी भर है। विद्यालयों में बच्चों के साथ, अभिभावकों का भी होने वाले शोषण की तमॉम दर्दनाक कहानियां ना तो अभिभावकों का आकर्षण खत्म कर पा रही है और ना ही सरकार उन पर कठोर से कठोर कदम उठा पा रही है। प्राइवेट विद्यालयों के फीस का ऊंचा स्तर बच्चों का रखरखाव मेंटेनेंस उनके आने जाने के वाहन पर खर्च के बावजूद बिना ट्यूशन के ABCD का ककहरा बच्चों को आने का तैयार नहीं है।

ऊपर से विद्यालयों को पुलिस स्टेशन जैसा थर्ड डिग्री का व्यवहार बच्चों पर किया जाना,एवं पावर गेम अभिभावकों पर मुकदमें पंजीक्रित करा देना स्वयं एक मानवाधिकार का बहुत बड़ा उल्लंघन है। जहां अभिभावक व बच्चे का कहीं ना कहीं शोषण के शिकार हो रहे हैं वहीं टीचिंग स्टाफ और प्रिंसिपल को दी जाने वाली सैलरी कहीं ना कहीं शर्मनाक प्रतीत होती है। प्रबंधकों की स्वार्थपूर्ति का जरिया बना आधुनिक प्राइवेट विद्यालय जब तक सरकार के मानक पर काम करने को तैयार नहीं होते तब तक एक जनपद में एक ऐसे स्थाई समिति का ही निर्माण हो जाए जो विद्यालयों पर निगहबानी रखें और अनियंत्रित व्यवस्था को नियंत्रित करने का कार्य करें।

यह कार्य केवल डीआईओएस बीएसए और जिलाधिकारी तक ही सीमित रखने लायक नहीं है। आए दिन विद्यालयों में होने वाली दुर्घटनाएं बलात्कार, हत्या, हिंसा, शारीरिक एवम मानसिक शोषण एक नए भारत के उदय में एक बहुत बड़ी बाधा है। शिक्षा का दायित्व एक प्रबल सरकार अगर खुद अपने हाथ में ले ले तो कुछ बुरा नहीं है। मगर स्थिति दूसरी है एक तरफ सरकार छोटे मोटे विद्यालयों पर मानक और अमानक की गतिविधियों को लेकर जहां तमाम किस्म की दुरूहता पैदा की है।

वही व्यापार जगत के बड़े लोग नेता, सॉसद, मॉफ़िया और बड़े अधिकारियों के दिमॉग़दार लोगों ने विद्यालय के धंधे में कदम रख कर अपने निजी स्वार्थ पूर्ति का साधन भले बनाया हो अभिभावक बच्चों और स्टाफ का हित मैनेजरों की स्वार्थपूर्ति के चलते संभव नहीं है।



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