रोटियों की पीठ पर पड़े हैं छाले...हर-हर गंगे !
| -Ram Prakash Varama - Jan 2 2018 12:33PM

रोटियों की पीठ पर पड़े हुए काले, भूरे छालों से भले ही उसकी तकलीफ का एहसास न हो लेकिन जब रूमाली /खमीरी रोटी मुसलमान हो कर 4-5 रु. में बिके, तन्दूरी रोटी पंजाबी या सिक्ख हो कर 15-20 रु. में , चपाती (तवा रोटी) हिन्दू हो कर 10-15 रु. में, गुजरती रोटला हो कर 15-20 रु. में, जाट-गूजर हो कर 8-10 रु. में और बिहारी, मराठी, बंगाली, असमिया, कश्मीरी होती हुई पांच सितारा रोटी 50-80 रु. में बिके तब देश में भूख से मरने वालों की गिनती के साथ-साथ रोटियों की पीठ पर पड़े छालों की पीड़ा पर चीखना-चिल्लाना ही होगा| वह भी तब और जरूरी हो जाता है, जब देश-प्रदेश की सरकारें करोड़ों रूपये खर्च करके हगने से लेकर दीवाली, होली खेलने का शऊर बता रही हों, इससे भी आगे जब डब्ल्यूटीओ से अनाज समझौता वार्ता विफल हो जाये | यहां यह बताना जरूरी होगा कि 60 करोड़  देशवासी अन्न सुरक्षा के दायरे में आते हैं| इनका पेट कैसे भरा जायेगा जब सरकार के पास पर्याप्त अनाज का भंडार ही नहीं होगा? वहीं जब उत्तर प्रदेश के बरेली से खबर आती है कि भूख से परेशान माँ-बाप ने अपने ही बेटे को 10 हजार में बेच दिया या भूख से सड़क पर एक आदमी कि मौत तब भी रोटी की एमआरपी तय होगी?

गजब ये कि बढ़ती महंगाई पर सरकारों के बयान हैरान कर देते हैं, एक तरफ महंगाई पर अंकुश लगाने कि बात होती है| दूसरी ओर प्याज,टमाटर की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी पर देश के खाद्यमंत्री का बयान आता है कि इनकी कीमतों को कम करना उनके हाथ में नहीं है, सवाल ये है कि फिर किसके हाथ में है ? सब्जियों, अंडे, चीनी, दूध, ईधन की कीमतों में भारी उछाल के साथ बोतल बंद पानी भी जमीन से लेकर आसमान तक खासा महंगा बिक रहा है| दूसरी ओर इस पीड़ा से कराहते जनमानस को हिंदुत्व व राष्ट्रवाद के मोटे भावनात्मक शामियाने तले इकट्ठा करके वोटों का जादुई खेल दिखाया जा रहा है? और इसके लिए गजब ऐलान हो रहे हैं, मकर संक्रांति में गोमा घाटों को चमकाएंगे और भव्य गोमा आरती होगी, जबकि इन्हीं घाटों की दुर्दशा और उस पर ढकी गई झूठ की चादर को कार्तिक पूर्णिमा में देखा जा चूका है| विपक्ष के विरोध के बाद भी अर्धकुम्भ को कुंभ मानकर मेला विधेयक पारित करने के साथ कुंभ का लोगो भी जारी कर दिया गया, इस आयोजन कि तैयारियों के लिए तकरीबन 75 हजार लाख रूपये खर्च किये जाने इंतजाम किया गया है| अखाड़ा परिषद के साथ तमाम साधू-संतों के विरोध को भी दरकिनार कर दिया गया| यहां बताते चलें कि यूनेस्को ने कुंभ को विश्व विरासत का दर्जा देते हुए दुनिया का सबसे शांतिपूर्ण आयोजन करार दिया| पिछली सपा सरकार  में हुए कुंभ आयोजन को सर्वत्र सराहा गया था| 2019 के अर्धकुंभ से पहले माघ मेले में साधू-संतों के नाराज होने की खबरें आ रही    हैं| गोकि हर-हर गंगे भी सरकारी पहरे में भजना होगा?

रामायण सर्किट में जनता के करोड़ों रूपये खर्च करके दीवाली मनाने पर विरोध में उंगली उठने पर मुख्यमंत्री ने इसे अपनी आस्था बताया था| सवाल यह है कि इससे पूर्व यह आस्था कहाँ थी? निकाय चुनावों के दौरान तीर्थस्थलों कि पहचान खत्म करने व अयोध्या समाधान में बाधा डालने का आरोप लगाया था और एलान किया था अयोध्या की तरह प्रदेश के सभी शहर जगमगायेंगे| काशी-मथुरा के पर्यटन को अलग पहचान मिलेगी| अभी तक तो कागजों पर ही नक्शे बनाये जा रहे हैं, हाँ.. विदेशी-देशी पर्यटकों से बदसलूकी की खबरें जरूर सुर्खियाँ पा रही हैं| नैमिषारण्य के विकास के लिए 200 करोड़ दिए और इसे सर्कार की जिम्मेदारी बताया गया| गौशालाएं खोले जाने के साथ गौ अभ्यारण्य बनाये जाने का ऐलान, नदियों के प्रमुख घाटों पर आरती होने ,मथुरा में पुलिस की वर्दी में श्रीकृष्ण के फोटो वाला बिल्ला लगने के साथ 24 फरवरी को बरसाने में (जनता के) 60 करोड़ रूपये से मुख्यमंत्री के होली खेलने का ऐलान|

इतना ही नहीं स्कूलों में गीता पढ़ाई जायेगी व उस पर प्रतियोगिताएं होंगी, ट्रैफिक नियमों, तीन तलाक, हलाला  को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा| तीन तलाक,हलाला पर बीएचयू ने एमए इतिहास के छात्रों से पहले सेमेस्टर की परीक्षा के पेपर में सवाल पूछ ही लिया है| हिंदुत्व की अलख जगाकर  समाज में बदलाव लाया जाएगा| भगवा रंग अग्नि और सूर्य का है इसलिए इसे पूज्य माना जाना चाहिए, शायद इसीलिए राजकीय बसों से लेकर स्कूलों तक को भगवा रंग में रंगवाया जा रहा है? क्रिसमस मानाने के लिए वर्ग विशेष को न्यायालय कि शरण में जाना पड़ रहा, तो स्कूल में भाजपा के पूर्व विधायक की प्रपौत्री को सांता क्लाज की टोपी पहनाने पर व क्रिसमस मनाने पर बवाल हो जाता है| हद है आंध्र सरकार ने मन्दिरों में नयासाल मानाने पे प्रतिबन्ध लगा दिया है| वंदेमातरम्, लव जिहाद, उर्दू, गाय, गंगा के नाम पर फसाद?

ये सारे बदलाव या ऐलान वोटों का गणित भले ही भाजपा के पक्ष में करने के कारगर हथियार हों लेकिन समाज को बांटने के औजार नहीं साबित होरहे हैं? गाय आज भी सड़कों पर घूम कर कचरे में अपना भोजन तलाश रही है| गंगा आज भी पहले जैसी गंदी है| आदमी से लेकर कुत्ते तक पूर्ववत गोश्त के टुकड़ों के भक्षक हैं| फिर यह हंगामाखेज जुम्ले किसलिए ? दो तरह का आचरण क्यों ?



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