विद्या ददाति विनयम् का समावेश प्राचार्य डॉ. ए.के. त्रिपाठी में है या......???
| By- Reeta Vishwakarma - Jan 4 2018 2:55PM

डॉ. अवधेश कुमार त्रिपाठी, प्राचार्य, बी.एन.के.बी. पी.जी. कॉलेज

विद्या ददाति विनयम्, विनयाद याति पात्रताम।
पात्रत्वाद धनमाप्नोती-धनाद धर्मस्ततः सुखं।।

अर्थात् विद्या विनय देती है- विनय से पात्रता/योग्यता- योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म के पालन से सुख प्राप्त होता है। शिक्षा ग्रहण करने के स्थान जन्म लेने के उपरान्त मातृअंक (गोद), गृहशाला, शिक्षालय-पाठशाला, स्कूल, विद्यालय, कॉलेज, विश्व विद्यालय में व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करता है। कहते हैं कि शिक्षितजनों में विनम्रता होती है- इनमें सहनशीलता एवं सहजता का वास होता है। शिक्षित लोग राग-द्वेष से सर्वथा दूर रहकर कार्यों का सम्पादन करते हैं- कहते होंगे......................।।

विद्यार्थी के पाँच लक्षण बताए गए हैं- काक चेष्टा, वको ध्यानम्, स्वान निद्रा तथैव च। अल्पहारी, गृहत्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम्।। मतलब तो सभी जानते हैं- ऐसा होता भी है-यह तो हमें नहीं मालूम-? यह मत सोचिए कि किसी मानव प्राणी की प्रथम पाठशाला मातृअंक (माँ के गोंद) से लेकर विश्व विद्यालय तक के स्थान लिखने का हमारा मकसद आपको किसी गूढ़ विषय से दो-चार कराना है। बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। पंक्षी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।। छोड़िए इसे भी अब आइए-

एक उच्च शिक्षित मानव (व्यक्ति) की बात कर ली जाए जिसमें विद्यार्थी के लक्षण रहे होंगे इस पर प्रश्नचिन्ह इसलिए लग सकता है कि वह किसी भी कोण से शिक्षित/उच्चशिक्षित नहीं दिखता। अंग्रेजों जैसा बोलचाल कड़क स्टाइल भाव में सुपीरियारिटी काम्पलेक्स- क्या खूब....... जातिवर्णीय व्यवस्था में सर्वोच्च स्थान प्राप्त। क्या इन्होंने अपनी माँ के गोद में पहला अक्षर बोलना/कहना सीखा होगा- क्या इन्होंने अपने गाँव की पाठशाला में पंडित जी, मंुशी जी, बाबू साहेब, मोलवी साहेब जैसे विद्वानों से आरंभिक शिक्षा ग्रहण की होगी। तदुपरान्त क्या कोसों पैदल चलकर मिडिल स्कूल, इन्टर कॉलेज जाकर माध्यमिक शिक्षा लिया होगा? मुझे तो यह भी नहीं प्रतीत होता है कि यह सज्जन-पैदल अथवा साइकिल से चलकर डिग्री कॉलेज में पढ़े होंगे- या फिर उसके उपरान्त विश्व विद्यालयी शिक्षा ली होगी।

व्यक्ति अहंकारी-दंभी हो यह कोई नई बात नहीं। आजकल दिखावा एक प्रतिस्पर्धा सा बन गया है। शिक्षा का- ओहदे का- सभी का। यह एक स्टेटस सिम्बल भी है। पैसा कमाना और वैभव प्रदर्शन करना आम बात हो गई है। शिक्षा जगत से जुड़े लोग शिक्षा माफिया बन गए हैं। आप भी बन जावोगे लेकिन पंडित महामना मदन मोहन मालवीय नहीं बन पावोगे। पैसा हो सकता है, आप चर्चित हो सकते हैं लेकिन लोकप्रियता को स्पर्श करना आप जैसों के लिए असम्भव है।

शिक्षित व्यक्ति में क्या अहं या फिर हीन भाव होता है। ये सभी मानवीय गुण हैं। कलयुग में ऐसा सम्भव है वह भी शत-प्रतिशत। जी नहीं ऐसा तो वेद-पुराणों, महाग्रन्थों में लिखा है कि क्रोध परमब्रम्ह को आता है। दम्भी, हीनभाव से ग्रस्त तो बड़े-बड़े विद्वान हुआ करते हैं। हिन्दुओं के आदिदेव, सृष्टि के रचनाकार को जब क्रोध आता था सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता था। रावण जैसा महापराक्रमी-विद्वान भी दम्भी होने से नहीं बच सका था तो वर्तमान के इस युग में साधारण आदमी का क्या---? कोई व्यक्ति स्वयं भू विद्वान बनकर अपनी पीठ थपथपा सकता है, परन्तु वास्तविक रूप से जब तक अन्य न कहें वह वैसा हो ही नहीं सकता......?

उनसे मिलने का संयोग भी गजब का था। सर्द दिवस के तीन-चार दिन तक उनके बारे में पता किया तो ज्ञात हुआ कि वह अपनी कुर्सी पर नहीं हैं। प्रतीक्षा किया किसी तरह उनका दूरभाष नम्बर (क्रमांक) पता करके तीन-चार प्रयास पर वार्ता सम्भव हुई। हमने आदतानुसार अपना परिचय एक मीडिया कर्मी के रूप में दिया था और मिलने का प्रयोजन भी बताया। वह बोले आ जावो मैं अपने चैम्बर  में हूँ। मैंने चैम्बर में प्रवेश कर अपना परिचय दिया, जिससे वह असहज हो गए बोले- छात्रा हो तो छात्रा की तरह बात करो, पत्रकार बनकर नहीं। यह पत्रकार/मीडियाकर्मी क्या होता है? मैं भी पत्रकार रह चुका हूँ........आदि........आदि। कहना पड़ा सर- आदत है इसलिए मुँह खुला और वाणी से स्वर फूट कर निकल पड़े। इससे आप आहत हुए हों तो हमें खेद है। आपके सम्मान को ठेस पहुँचाना हमारा उद्देश्य नहीं था। पुनः क्षमा प्रार्थना के साथ- मैं रीता जिस कार्य हेतु आप के चैम्बर में आई हूँ कृपा कर उसका सम्पादन करें।

अन्त में- क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात। पूर्ण विश्वास भले ही न हो परन्तु अल्प ही सही कि मेरी धृष्टता को क्षमा करेंगे। यहाँ हमने किसी उच्च पदस्थ व्यक्ति से मिलने और तत्पश्चात आए विचारों का एक संक्षिप्त चित्रण लेखनी के माध्यम से किया है। मैं आपके कॉलेज की छात्रा रही हूँ- परन्तु आपने मुझे एक अक्षर भी नहीं पढ़ाया है। मेरी छात्रावस्था में इस गुणनिष्ठ संस्था के मुखिया (प्राचार्य) डॉ. अजित कुमार सारस्वत, डी. लिट. आपसे अधिक शिक्षित रहे हैं जो अब सेवानिवृत्त होकर गृहस्थ जीवन सामाजिक सरोकारों के साथ जी रहे हैं। मैं उनकी शिष्या रही हूँ। उन्होंने मुझे शिक्षा के साथ- साथ स्नेह और वात्सल्य भी दिया है। वर्तमान में संयोग ही है कि आप उन्हीं के उत्तराधिकारी के रूप में इस पद पर आसीन हैं।

यह आलेख उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जनपद के मुख्यालयी शहर अकबरपुर स्थित बी.एन.के.बी. पी.जी. कॉलेज के वर्तमान प्राचार्य डॉ. अवधेश कुमार त्रिपाठी को समर्पित है। -रीता

(लेखिका रीता विश्वकर्मा, सम्पादक- रेनबोन्यूज के विचार डॉ. ए.के. त्रिपाठी से मिलने के उपरान्त उपजे हैं और सर्वथा निजी हैं।)



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