मटर को कीट एवं रोगों से कैसे सुरक्षित रखे किसान : डा. रवि प्रकाश
| Rainbow News - Jan 6 2018 1:02PM

मटर एक महत्वपूर्ण रबी की दलहनी  फसल है। इसका प्रयोग ताजा डिब्बाबंद व सूखी मटर के रूप में किया जाता है। फसल पैदावार में अधिकतम अस्थिरता हेतु किसान भाई कृषि की विभिन्न प्रक्रियाओं को अपनाते है। इसी कड़ी में कीटों और रोगों के प्रबंधन पर  सही ध्यान नहीं दिया गया तो उत्पादन में बढ़ोतरी बहुत कठिन होती है। नाशक जीवों और रोगों से फसल की उपज में काफी कमी आती है।

नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौधोगिक विश्व विधालय कुमारगंज फैजाबाद द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र पाँती अम्बेडकर नगर के कार्यक्रम समन्वयक डा. रवि प्रकाश मौर्य ने  बताया कि मटर को प्रभावित करने वाले विभिन्न कीट और रोगों व उनके नियंत्रण की जानकारी होना आवश्यक है। मटर मे फली छेदक कीट का प्रकोप फली बनने से प्रारंभ होकर अप्रैल तक चलता है। अंडे से निकली हुई सुंडी अपने चारों ओर जाला बुनती तथा छेदकर फली में घुसकर दानों को खाती रहती हैं। उससे काफी नुकसान होता है। फलिया बदरंग हो जाती है तथा उनमें पानी भर जाता है। ऐसी फलियों से दुर्गंध आने लगती है। इसके नियंत्रण के क्विनालफॉस 25 ई.सी.500 मिली या बी.टी. 250 ग्राम,एजाडिरेक्टिन 0.03%डब्लू. एस.पी.750 ग्राम  को150 लीटर पानी मे घोल कर प्रति बीघा की दर से छिड़काव करें।

बुकनी रोग में सफेद चूर्ण पत्तियों व पौधे के अन्य भागों पर दिखाई देता है। नियंत्रण के लिए घुलनशील गंधक 80 %डब्लू.पी. 500 ग्राम या  150 मिली. डायनोकेप 48 ई.सी. या 100 मिली ट्राइडेमार्फ़ 80 ई.सी. 150 लीटर पानी मे घोल कर प्रति बीघा की दर से 10 दिन के अंतराल पर2-3 छिड़काव करे।अल्टर नेरिया पत्ती धब्बारोग  मे पत्तियो पर छल्ले के समान गोल धब्बे दिखाई पड़ते है।अनुकुल परिस्थितियो मे धब्बे आपस मे मिल जाते है,जिससे पूरी पत्तियो झुलस जाती है।नियंत्रण के लिए मैंकोजेब 75 डब्लू.पी. 500ग्राम या जिनेब75 डब्लू पी.500ग्राम को 150 लीटर पानी मे घोलकर प्रति बीघा की दर से 10, 15 दिन के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव करें।



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