"ज़िन्दगी के सफ़र की दास्तान"
| Rainbow News - Jan 8 2018 1:15PM

कवि अवतार सिंह बहार का जन्म तो अमृतसर, पंजाब में हुआ लेकिन कुछ वर्षों बाद वे अपने परिवार के साथ लखनऊ आ गये। यहीं वे स्कूली शिक्षा से विश्वविद्यालय तक की पढ़ाई कर वकालत करने लगे। वकालत के साथ ही वे साहित्यिक, सामाजिक व राजनैतिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं। पिछले दशक से वे सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली चले गये लेकिन उनका लखनऊ के प्रति, लखनऊ के लोगों के प्रति अनुराग बना रहा। वे यहाँ कि आबो-हवा से दूर अधिक समय तक ठहर नहीं पाते हैं। उनकी यादें उन्हें लखनऊ से बाहर ज्य़ादा देर बर्दाश्त नहीं करती। इन्हीं सब बातों का नतीजा है-"कवितायेः ज़िन्दगी से छूता सफ़र"। यह बहार जी का पहला काव्य संग्रह है। हालाँकि उनके लेखन का सफ़र बहुत लम्बा है। उनकी काव्य रचनाएँ निरन्तर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं तथा उन्होंने कई महत्वपूर्ण शोधपरक व समसामयिक पुस्तकें लिखी हैं, यथा- आज का तिब्बत, खच्चर की लीद, इंकलाब विचारों की खोज आदि। वे 'रंगत' जैसी कई तूफानी पत्र - पत्रिकाओं के सम्पादक भी रहे हैं।
       एशियाई समाचार से प्रकाशित बहार जी  की ताजा काव्य कृति " कवितायें: ज़िन्दगी से छूता सफ़र " कवि के कठिन व सुनहरे यादों को उजागर करती हुई लखनऊ शहर का ऐतिहासिक दस्तावेज़  हैं। इस पद्य संग्रह में कवि ने लखनऊ शहर में अपने गुज़रे दिनों को बड़ी बेबाकी से चित्रित किया है। कवि जहाँ लखनऊ शहर की पहचान, लखनऊ के लोगों की ख़ासियत व उनके गुफ्तगू को सजीवता के साथ प्रस्तुत करता है , वही कंडियाला(जन्म स्थान) से कनाडा तक के सफ़र के खट्टे-मीठे पलों को भी सामने लाता है।
      48 पद्य रचनाओं के इस संग्रह में सभी रचनाओं का कालक्रम एक नहीं है इसलिए यह संग्रह कवि के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का आईना है। 'काफी हाउस का निज़ाम' शीर्षक से लिखी गई एक रचना में कवि काफ़ी हाउस के स्वर्णिम इतिहास को प्रस्तुत करता है। कवि दिखाता है कि बड़े-बड़े कवि , लेखक, नेता, पत्रकार काफ़ी हाउस में ही बड़े हुए हैं। तमाम पुराने  बड़े नाम भी कवि गिनाता है। 'विश्वविद्यालय का सर्वे' में कवि पूरी ईमानदारी के साथ विवि में अपने बीते दिनों को साझा करता हुआ यह बता जाता है कि सत्तर के दशक में लखनऊ विश्वविद्यालय का माहौल कैसा था। 'सुरमे वाला', 'तेरा मुखड़ा', 'दिल और मन' जैसे गीतों में कवि अपने युवा मन का हाल बयां करता है।
     इस संग्रह की जान 'लखनऊ की भुतनी' है जिसमें कवि अपनी भावुकता , मन में व्याप्त अर्न्तद्वन्द को छुपा नही पाता है। लखनऊ के प्रमुख , हलचल से भरे स्थानों, यहाँ के लोगों की ख़ासियत व उनके अंदाज को कवि बड़ी सफलता के साथ प्रस्तुत करता है। दरअसल यह रचना कवि के लखनऊ से दूर हो जाने का विरह गीत है। उसकी यादें उसका पीछा नहीं छोड़ती। उसका मन उसे लखनऊ के गौरवशाली अतीत व वर्तमान की दुहाई देते हुए बार-बार कह उठता है कि 'लखनऊ छोड़ दिल्ली न जाइये'।
           प्रतिक्रिया, जंग की महफिल, इंकलाब, आज़ादी के सत्तर साल व संदर्भ -जैसी कृतियों में कवि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी आम अवाम के जीवन में छाई अनिश्चितता,गरीबी, समाज में व्याप्त असमानता, जुल्म  व अन्याय के चेहरे को खोलकर रख देता और देश के हुक्मरानों को चेतावनी देते हुए नौजवानों का आह्वान करता है कि 'छोड़ो फूल और पत्थर उठो लो' । कवि का मानना है कि  भूख,डर व नफ़रत के अन्धकार को क्रांति की ज्वाला ही दूर करेगी। कवि समाज की पीड़ा से बहुत व्याकुल है। वह लोगों को चेतावनी देता है, क्रांति का संदेश देता है और अन्तत: वह एक नई सुबह का स्वप्न देखने लगता है।
      इस संग्रह में कवि ने कहीं पंजाबी शब्दों का प्रयोग किया है तो कहीं -कहीं उर्दू व अंग्रेजी के शब्दों का भी बेतरीन इस्तेमाल किया है मुख्यतः कवि की भाषा ठेढ़ हिन्दी है।कवि अपने भाव को व्यक्त करते हुए कई जगह पद्य से गद्य की सीमा लांघ गया है।इस कृति की कुछ रचनाओं को 'चंपू' कह देना बेइमानी न होगी।कुल मिलाकर यह रचना संग्रह पठनीय व संग्रहणीय है।

पद्य रचना: ज़िन्दगी से छूता सफ़र
रचनाकार:अवतार सिंह बहार
प्रकाशक:एशियाई समाचार
वितरक:यूनिवर्सल बुक सेलर्स , हजरतगंज, लखनऊ
समीक्षक:वीरेन्द्र त्रिपाठी, लखनऊ
सम्पर्क :9454073470

-वीरेन्द्र त्रिपाठी, लखनऊ
सम्पर्क: 9454073470



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