आम की फसल को कीटों व रोगो से बचाये बागवान : डा. रवि प्रकाश मौर्य
| Rainbow News - Jan 8 2018 4:24PM

आम मे मंजर आने वाला है। वर्तमान समय में जलवायु में नमी ज्यादा होने के कारण फसल में रोग लगने का खतरा सबसे ज्य़ादा रहता है। कीटनाशक के बहुत अधिक प्रयोग से निपटने का अव्वल तरीका यह है कि सही समय पर ही कीट की पहचान कर कीटनाशक या अन्य विधियों से उससे निपटा जाए। कीट की समस्या गंभीर होने और फिर कीटनाशक के भीषण छिड़काव से बचा जाए।

कीटों व रोगों को सही समय पर पहचान कर उनका उपचार करने की पूरी जानकारी दी नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौधोगिक विश्व विधालय कुमारगंज फैजाबाद द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र अम्बेडकर नगर के कार्यक्रम समन्वयक डा. रवि प्रकाश मौर्य ने बताया कि आम मे जाला कीट प्रारम्भिक अवस्था में पत्तियों की ऊपरी सतह को तेजी से खाता है। उसके बाद पत्तियों का जाला बनाकर उसके अन्दर छिप जाता है और पत्तियों को खाना जारी रखता है। रोकथाम का पहला उपाय तो यह है कि एज़ाडीरेक्टिन नीम आधारित 2 मिली को प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। दूसरा संभव उपाय मोनोक्रोटोफास 36 ई. सी. 1 मिली प्रति लीटर पानी मे मिलाकर 2-3 बार छिड़काव करें।दीमक सफेद, चमकीले एवं मिट्टी के अन्दर रहने वाले कीट हैं।

यह जड़ को खाता है उसके बाद सुरंग बनाकर ऊपर की ओर बढ़ता जाता है। यह तने के ऊपर कीचड़ का जमाव करके अपने आप को सुरक्षित करता है।रोकथाम हेतु  तने के ऊपर से कीचड़ के जमाव को हटाना चाहिए। तने के ऊपर 2मिली क्लोरोपाईरीफास 20 ई.सी. को प्रति लीटर पानी मे घोल कर  छिड़काव करें। या दस ग्राम बिवेरिया बेसिआना का प्रति लीटर पानी मे घोल बनाकर छिड़काव करें। फुदका या भुनगा कीट आम की फसल को सबसे अधिक क्षति पहुंचाते हैं। इस कीट के शिशु एवं वयस्क कीट कोमल पत्तियों एवं पुष्पक्रमों का रस चूसकर हानि पहुचाते हैं। इसकी मादा 100-200 तक अंडे नई पत्तियों एवं मुलायम प्ररोह में देती है, और इनका जीवन चक्र 12-22 दिनों में पूरा हो जाता है। इसका प्रकोप जनवरी-फरवरी से शुरू हो जाता है।

इस कीट से बचने के लिए बिवेरिया बेसिआना फफूंद के 10 ग्राम को प्रति लीटर पानीमे घोल कर छिड़काव करें। या नीम तेल 2 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर घोल का छिड़काव करे। फलमक्खी आम के फल को बड़ी मात्रा नुकसान पहुंचाने वाला कीट है। इस कीट की सुंडियां आम केअन्दर घुसकर गूदे को खाती हैं जिससे फल खराब हो जाता है।रोकथामके लिये यौनगंध के प्रपंच का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें मिथाइल युजिनाल 2ग्राम एवं मेलाथियान 50 ई.सी. 2 मिली  प्रति लीटर पानी मे घोल बनाकर डिब्बे में भरकर पेड़ों पर लटका देने से नर मक्खियाँ आकर्षित होकर मेलाथियान द्वारा नष्ट हो जाती हैं। एक बीघा बाग में 4 डिब्बे लटकाना सही रहेगा।

गाल मीज कीट के  लार्वा बौर के डंठल, पत्तियों, फूलों, और छोटे-छोटे फलों के अन्दर रह कर नुकसान पहुंचाते हैं। इनके प्रभाव से फूल एवं फल नहीं लगते। फलों पर प्रभाव होने पर फल गिर जाते हैं। इनके लार्वा सफेद रंग के होते हैं, जो पूर्ण विकसित होने पर भूमि में प्यूपा या कोसा में बदल जाते हैं।इनके रोकथाम के लिए गर्मियों में गहरी जुताई करना चाहिए। ईमिडाक्लोप्रिड 17.8 ई.सी. 3 मिली/10 लीटर पानी मे घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

आम पर सफेद चूर्णी रोग का बौर आने की अवस्था में यदि मौसम बदली वाला हो या बरसात हो रही हो तो यह बीमारी प्राय: लग जाती है। इस बीमारी के प्रभाव से रोगग्रस्त भाग सफेद दिखाई पडते है। अंतत: मंजरियां और फूल सूखकर गिर जाते हैं। इस रोग के लक्षण दिखाई देते ही आम के पेड़ों पर  गंधक 2ग्राम प्रति लीटर पानी मे घोल कर छिड़काव करें। इसके अतिरिक्त 2 लीटर पानी में 1ग्राम कैराथेन घोलकर छिड़काव करने से भी बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है। कालवूणा (एन्थ्रेक्नोस) बीमारी अधिक नमी वाले क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है। इसका आक्रमण पौधों के पत्तों, शाखाओं, और फूलों जैसे मुलायम भागों पर अधिक होता है।

प्रभावित हिस्सों में गहरे भूरे रंग के धब्बे आ जाते हैं। प्रबंन्धन हेतु  जिनैब 75 डब्लू.पी. 2ग्राम प्रतिलीटर पानी  मे घोल  कर छिड़काव करें। ब्लैक टिप (कोएलिया रोग)यह रोग ईंट के भट्ठों के आसपास के क्षेत्रों में उससे निकलने वाली गैस सल्फर डाई ऑक्साइड के कारण होता है। इस बीमारी में सबसे पहले फल का आगे का भाग काला पडऩे लगता है इसके बाद ऊपरी हिस्सा पीला पड़ता है। इसके बाद गहरा भूरा और अंत में काला हो जाता है। यह रोग दशहरी किस्म में अधिक होता है। इस रोग से फसल बचाने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि ईंट के भट्ठों की चिमनी आम के पूरे मौसम के दौरान लगभग 50 फुट ऊंची रखी जाए। इस रोग के लक्षण दिखाई देते ही बोरेक्स 10 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से बने घोल का छिड़काव करें। फलों के बढ़वार की विभिन्न अवस्थाओं के दौरान आम के जब फल मटर के दाने के बराबर हो जाएं तो 15 दिन के अंतराल पर तीन छिड़काव करने चाहिए।

गुच्छा रोग (माल्फार्मेशन)  बीमारी का मुख्य लक्षण  पूरा बौर नपुंसक फूलों का एक ठोस गुच्छा बन जाता है। बीमारी का नियंत्रण प्रभावित बौर और शाखाओं को तोड़कर किया जा सकता है।  कलियां आने की अवस्था में जनवरी के महीने में पेड़ के बौर तोड़ देना भी लाभदायक रहता है क्योंकि इससे न केवल आम की उपज बढ़ जाती है अपितु इस बीमारी के आगे फैलने की संभावना भी कम हो जाती है। नेप्थीलीन एसिड एक मिली 5लीटर पानी मे घोल कर छिड़काव करे।

डाई बैक रोग में आम की टहनी ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगती है और धीरे-धीरे पूरा पेड़ सूख जाता है। यह फफूंद जनित रोग होता है, जिससे तने की जलवाहिनी में भूरापन आ जाता है और वाहिनी सूख जाती है एवं जल ऊपर नहीं चढ़ पाता है इसकी रोकथाम के लिए रोग ग्रसित टहनियों के सूखे भाग को 15 सेमी नीचे से काट कर जला दें। कटे स्थान पर बोर्डो पेस्ट लगाएं तथा  कॉपर ऑक्सी कलोराइड 50 डब्लू.पी. 2 ग्राम प्रति लीटर पानी मे घोल क छिड़काव करें।



Browse By Tags



Other News