चीन के विस्तारवाद पर हिन्दुस्तान की सतदृढ़ता
| -Jagjeet Sharma - Jan 11 2018 3:38PM

चीन और हिंदुस्तान दोनों पडौसी देश हैं। दोनों देशों के आपसी संबंध कडवाहट भरे मधुर संबंध हैं। चीन की विस्तारवादी नीति ने हमेशा से ही हिन्दुस्तान को ज म ही दिए हैं। हिन्दुस्तान एक बहुत बडा बाजार है और सभी जानते हैं कि चीन का हमारे देश हिन्दुतान के बाजार पर खासी पकड है। इसमें भी कोई दो-राय नहीं है कि अगर हिन्दुस्तान के बाजार से चीन के सामान का पूर्ण बहिष्कार कर दिया जाए तो चीन की अर्थव्यवस्था डवांडोल हो जाएगी!

लगातार परिवर्तित होती अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण चीन अपनी सभी तरफ़ की सीमाओं में विस्तार करने की नीति पर काम कर रहा है और उसका यह भी मानना है कि जिन स्थानों पर वह सामरिक दृष्टि से कमज़ोर है और अपने इस तरह के प्रयासों से वह कुछ हासिल कर सकता है वह वहीं पर ऐसी हरकतें करने में लगा हुआ है। चीन की विस्तारवादी नीतियों के कारण ही वह जापान से लगाकर अपने सभी पड़ोसियों से किसी न किसी छोटे मोटे विवाद में लगा हुआ है जिसका लाभ उसे कई स्थानों पर मिलता हुआ दिखाई भी दे रहा है। आने वाले समय में वह अरब सागर में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए पाक के साथ ग्वादर बंदरगाह के लिए अपना काम शुरू ही कर चुका है और पूरे एशिया क्षेत्र में वह अपनी सामरिक आवश्यकताओं को आज अपनी बढ़ती आर्थिक शक्ति के भरोसे बढ़ाने में लगा हुआ है। ऐसा नहीं है कि इससे पहले चीन का रुख भारत और अन्य पड़ोसियों के साथ बहुत अच्छा रहा है पर अब एक मज़बूत आर्थिक ताक¸त के रूप में वह ऐसी घटनाओं में कुछ अधिक ही दिलचस्पी दिखाने लगा है।

लेकिन इसी बीच अगर आप हिन्दुस्तान और चीन के बीच मौजूदा तकरार को लेकर ख़बरों की सुर्खियां पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि दोनों ही देश लड़ाई को लेकर एक दूसरे को डरा-धमका रहे हैं। दोनों ही देशों के बीच जुबानी लड़ाई एक-दूसरे को धमकी देने वाली है। चीन इसलिए चेतावनी दे रहा है ताकि यह तकरार बढ़कर युद्ध संघर्ष तक पहुँच जाए। चीन की सरकारी मीडिया ने भारत को 1962 की लड़ाई में मिली शिकस्त की याद दिलानी शुरू कर दी है। सबसे पहले भारत पर भूटान की स्वायत्ता में सड़क परियोजना के बहाने दखल देने का आरोप लगाया और फिर लिखा कि अगर भारत, चीन के साथ टकराव को बढ़ावा देता है तो उसे इसके परिणाम झेलने पड़ेंगे। भारत और चीन के बीच मौजूदा तकरार की शुरुआत जून के मध्य में शुरू हुई थी। तब भारत ने डोकलाम क्षेत्र में सड़क निर्माण के बहाने चीन के दखल का विरोध किया था। डोकलाम चीन, पूर्वोत्तर भारत के राज्य सिक्किम और भूटान के बीच का क्षेत्र है और अभी चीन और भूटान के बीच इसे लेकर विवाद है। भारत भूटान के दावे का समर्थन करता है।

भारत की चिंता यह है कि अगर यह सड़क बन जाती है तो चीन भारत के बीस किलोमीटर चौड़े कॉरिडोर चिकन्स नेक के नज़दीक पहुंच जाएगा। यह गलियारा पूर्वोत्तर के राज्यों को भारत के मु यभाग से जोड़ता है। जब से ये तकरार दोनों देशों के बीच शुरू हुई है, दोनों ही पक्षों ने अपनी-अपनी फ़ौज को सीमा पर तैनात कर रखा है और एक-दूसरे को पीछे हटने की धमकी दे रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब दोनों देश एक-दूसरे के सामने सीमा-विवाद को लेकर आए हैं। छोटी-मोटी मुठभेड़ तो भारत-चीन सीमा पर होती रही है। 1967 में भारत और चीन के बीच संघर्ष हो चुका है। इसके अलावा 1986-87 में दोनों देशों के बीच अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर लंबे समय तक तनातनी रह चुकी है। विशेषज्ञ अजय शुक्ला कहते हैं, भारत को लगता है कि चीन, भूटान को लेकर भारत की प्रतिबद्धता को परख रहा है। चीन हमेशा से भूटान के साथ भारत के करीबी रिश्ते को लेकर नाराज़ रहता है। इसलिए वो हमेशा इसे तोड़ने की कोशिश करता रहता है। चीन के मसलों पर करीब से नज़र रखने वाले एक विशेषज्ञ ने कहा कि आम तौर पर चीन की तैयारी भडकाऊ बयानबाजी और चेतावनी के साथ होती है। इसलिए हमें चीन को हल्के में नहीं लेना चाहिए या इसे सिर्फ़ धमकी नहीं समझना चाहिए। 1962 में चीन की सरकारी मीडिया शिन्हुआ ने पहले ही चेतावनी दी थी कि, भारत को लड़ाई से अपने कदम पीछे खिंच लेने चाहिए। 1950 में कोरिया के साथ लड़ाई के दौरान चीन ने अमरीका को चेतावनी दी थी कि अगर वो येलो नदी पार करते हैं तो चीन भी लड़ाई में कूद पड़ेगा। दक्षिण कोरिया और उत्तरी कोरिया के बीच छिड़ी इस लड़ाई में अमरीका दक्षिण कोरिया की तरफ से था, वहीं चीन उत्तरी कोरिया की ओर से। तत्कालीन सोवियत संघ ने भी भी उत्तर कोरिया का साथ दिया था। मौजूदा परिस्थिति में ऐसा बिल्कुल दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि चीन वाकई में युद्ध की ही तैयारी कर रहा। दोनों ही पक्ष इस तकरार के लिए एक-दूसरे को जि मेवार ठहरा सकते हैं। 2012 में चीन भूटान और बर्मा के साथ सीमा को लेकर एक साझे निष्कर्ष पर पहुंच चुका था। तब से उनके बीच कोई तकरार अब तक पैदा नहीं हुआ है।

भारत का कहना है कि चीन ने इस बार सड़क बनाकर यथास्थिति का उल्लंघन किया है। भारत ने अपनी फ़ौज भूटान की ओर से मदद मांगने के बाद भेजे। चीन का दावा है कि भारतीय फ़ौज ने डोकलाम में भूटान की मदद करने के बहाने दखल किया था और यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। चीनी थिंक टैंक के एक विशेषज्ञ लांग शिंगचुन कहना है, पाकिस्तान के अनुरोध पर कोई तीसरा देश इसी तर्क का इस्तेमाल करते हुए कश्मीर में दखल दे सकता है जो तर्क भारत की फ़ौज ने डोकलाम में सड़क निर्माण रोकने के लिए किया था। अगर मान लिया जाए कि भूटान ने भारत से ऐसा करने को कहा भी तो यह सिर्फ़ भूटान के ज़मीन तक सीमित रहना चाहिए था ना कि उस सीमा तक जो विवादित क्षेत्र में आता है। साफ है कि इस तकरार को ख़त्म करने के लिए तीनों पक्षों को एक समाधान पर आना होगा। हालांकि कई लोगों को मानना है कि इसमें काफी समय लग सकता है। भारत और चीन के बीच रिश्ते ऐसे भी कई सालों से तनावग्रस्त बने हुए हैं। दोनों ही देशों ने इस महीने की शुरुआत में जी20 की बैठक के दौरान इस मुद्दे को हल करने का मौका गंवा दिया है।

भारत का कहना है कि शी जिनपिंग के साथ मुलाकात जी-20 की बैठक के दौरान एजेंडे में नहीं था। दूसरी तरफ चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बैठक के लिए सही माहौल नहीं था। एक दूसरा मौका अभी हाल ही में फिर से दोनों देशों को मिलने वाला है। एक पूर्व राजनयिक कहते हैं, दोनों ही देशों ने इसे प्रतिष्ठा का विषय बना लिया था। लेकिन मुश्किल परिस्थितियों में चीजें को दुरुस्त रखना ही कूटनीति है। दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो श्रीनाथ राघवन का कहना है, मैं नहीं सोचता कि कोई पक्ष लड़ाई चाहता है। किसी की भी इसमें दिलचस्पी नहीं है। लेकिन दोनों ही देशों की प्रतिष्ठा जरूर पर दांव लगी हुई है और इसकी वजह से यह तकरार लंबे वक्त तक चल सकता है। दुनिया में अपनी धौंस को निरंतर बढ़ाने में लगा हुआ चीन समय समय पर भारत के साथ लगती हुई अपनी सीमा को विवादित बताकर जिस तरह से घुसपैठ करता ही रहता है वह आने वाले समय में भारत और चीन दोनों के लिए ही किसी बड़े संकट का कारण भी बन सकता है। चीन के साथ लगती हुई ल बी और दुर्गम पहाड़ी सीमा के कारण वहां पर भारत द्वारा भी वैसे उपाय नहीं किए जा रहे हैं जिनकी आवश्यकता है क्योंकि कुछ इलाक¸ों में भारत की तरफ से सीमा पर पहुंचना कड़ी चुनौती है जबकि चीन की तरफ़ से वहां तक पहुंचना उतना कठिन नहीं है। हिमालयी क्षेत्र में इसी तरह से कहीं पर भारत मज़बूत सामरिक स्थिति में है तो कहीं पर चीन पर भारत ने आज तक कभी भी चीन की सीमा का कहीं भी अतिक्रमण नहीं किया है। इस बार जिस तरह से लद्दाख क्षेत्र में चीन के सैनिकों ने भारतीय सीमा में आकर अपने त बू लगाये और उनकी सूचना मिलने पर फिर से उसी तरह की बातें की गईं जो हमेशा से ही की जाती रही हैं तो उससे चीनी और भारतीय रुख का भी पता चलता है ?

भारत के साथ उसकी सीमा से चीन को फिलहाल कुछ ख़ास हासिल नहीं होने वाला तो नहीं है पर ल बे समय में इस हिमालयी क्षेत्र में खनिज और औंर प्राकृतिक संपदा के मिलने और उसके दोहन के समय चीन चुप भी नहीं बैठने वाला है शायद वह इसी सब को अपने हित में मानकर लगातार भारतीय सीमा का अतिक्रमण जानबूझकर करता ही रहता है जिससे आने वाले समय में वह इस बात को साबित कर सके कि यह क्षेत्र ल बे समय से ही विवादित रहा है। अपनी विस्तारवादी नीतियों के कारण जिस तरह से चीन भारत के क्षेत्रों में आता है और बात-चीत होने पर अधिकांश जगहों पर वापस पुरानी जगह पर वापस भी लौट जाता है इस पूरे प्रकरण में उसकी नीतियों को एक बार फिर से समझने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक भारत के पास भी इस सब से निपटने के लिए कोई कारगर नीति नहीं होगी हम केवल इस तरह की घटना पर अपने विरोध के बाद चीन को उसकी पुरानी स्थिति में वापस भेजने में सफल होकर खुश होते रहेंगें। हो सकता है कि चीन जान बूझकर ही ऐसा करता हो और इस बात का अंदाज़ा लगाना चाहता हो कि चीन के प्रति भारत का रवैया कहीं से बदल तो नहीं रहा है? फिलहाल चीन के अपनी अस्थायी चौकी स्थापित करने और उन्हें हटाने की उनकी मंशा को समझने की अधिक आवश्यकता है। निःसंदेह हिन्दुस्तान एक मजबूत शक्तिके रूप में विश्व पटल पर अपने आप को रेखांकित  करने में काफी हद तक सफल रहा है। दोनों देशों के मधुर संबंध अपने आप को विश्व में महाशक्ति बना सकते हैं। काश! हिन्दु-चीनी भाई-भाई के श्लोगन को चीन अमल में लाए।



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