चम्मचों को देखिए तो पतीली से गर्म हैं
| -Tanveer Jafri - Jan 14 2018 2:54PM

चाटुकारिता, ख़ुशामदपरस्ती तथा अपने आका को ख़ुश करने के लिए किसी भी हद तक कुछ भी कर गुज़रने की हौसला हमारे समाज में आसानी से देखा जा सकता है। और खु¸शामदपरस्ती की यह प्रवृति किसी इंसान को किसी भी हद तक ले जा सकती है। हमारे समाज,शासन,धर्म का ही नहीं बल्कि राजनीति का ताना-बाना भी इससे अछूता नहीं है। याद कीजिए 1975-77 के वह दिन जब पूरे देश में यह अफ़वाह फैलाई गई थी कि संजय गांधी के परिवार नियोजन कार्यक्रम को परवान चढ़ाने के लिए लोगों को पकड़-पकड़ कर ज़बरदस्ती उनकी नसबंदी की जा रही है। देश के लगभग सभी कांग्रेस शासित राज्यों के स ाी सरकारी विभागों के प्रमुखों द्वारा अपने अधीनस्थ लोगों को यह कहा जाता था कि वे नसबंदी कराने हेतु लोगों को पकड़ कर लाएं अन्यथा उनकी सेवा पुस्तिका में नकारात्मक एंट्री कर दी जाएगी। सरकारी स्कूल के अध्यापकों की तन्ख़वाहें रोक ली गई थीं। और उन्हें यह निर्देश दिए गए थे कि प्रत्येक अध्यापक एक-दो लोगों की नसबंदी कराए अन्यथा उसे तन् वाह नहीं मिलेगी। और इन्हीं ज़्यादतियों के परिणामस्वरूप उस दौर में परिवार नियोजन अभियान इतना बदनाम हुआ कि 1977 में कांग्रेस को सत्ता से जिन कारणों से हटना पड़ा उसमें परिवार नियोजन अभियान के अंतर्गत् होने वाली ज़्यादती भी निश्चित रूप से शामिल थी। सवाल यह है कि क्या इस प्रकार लोगों की नसबंदी करने के तरीके अपनाने का निर्देश स्वयं संजय गांधी ने दिया था? क्या प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी व पांच सूत्रीय कार्यक्रम के जनक उनके पुत्र संजय गांधी यह चाहते रहे होंगे कि देश के आम नागरिकों को नसबंदी के नाम पर इस तरह परेशान किया जाए?

                अपने प्रधानमंत्री को कैसे ख़ुश किया जाए, दरअसल हमारे देश का केंद्रीय मंत्री इस जुगत में हर समय लगा रहता है, एक संासद अपने मंत्री बनने के चक्कर में प्रधानमंत्री को ख़ुश करना चाहता है। यही स्थिति प्रत्येक राज्य की भी है। मंत्री,विधायक,नौकरशाह, विभाग प्रमुख सभी अपने मुखिया की आंखों का तारा बनना चाहते हैं और कभी-कभी चाटुकारिता की तथा अपने आका को ख़ुश करने की इसी प्रतिस्पर्धा में कई ऐसे काम भी हो जाते हैं जो ख़ुशामदपरस्त व चाटुकार व्यक्ति के लिए तो शर्मसार होने का कारण बनते ही हैं साथ-साथ ऐसी अपमानजनक हरकतों से वे अपने आका के लिए भी मुसीबतें पैदा कर देते हैं। उदाहरण के तौर पर इन दिनों देश में दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी विचारधारा देश के अधिकांश हिस्सों पर अपना शासन चला रही है। निश्चित रूप से इस विचारधारा का मकसद आज नहीं तो कल देश को हिंदू राष्ट्र बनाना तथा विभिन्नता में एकता रखने वाले इस भारतीय धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में एकरूपता लाना है। राजनैतिक तरीके से इस मार्ग पर चलते हुए यह प्रक्रिया यदि सब कुछ भविष्य में भी दक्षिणपंथियों के हाथों में रहा तो आगामी 10-15 वर्षों में पूरी भी हो सकती है। देश को हिंदू राष्ट्र बनाने हेतु लोकसभा-राज्यसभा सहित देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं व विधानपरिषदों में भी इसी विचारधारा के बहुमत की दरकार है। परंतु कुछ अति उत्साही लोग तो शायद अभी से मान बैठे हैं कि देश गोया हिंदू राष्ट्र बन ही चुका है। इसका भगवाकरण हो ही चुका है। और ऐसे लोग अपने आकाओं को ख़ुश करने के लिए देश के अनेक हिस्सों में धर्म आधारित हिंसा फैलाने से नहीं चूक रहे हैं। खान-पान व पहचान के आधार पर लोगों के मारे जाने की कई घटनाएं हो चुकी हैं। हद तो यह है कि ऐसे ही अति उत्साही लोगों द्वारा उदयपुर के सत्र न्यायालय भवन के ऊपर तिरंगे के बजाए भगवा ध्वज तक लहरा दिया गया। भले ही इस प्रकार की अपराधपूर्ण हरकत यह सोचकर की गई हो कि इससे उनका आका ख़ुश होगा और उन्हें शाबाशी देगा। परंतु दरअसल इस घटना की पूरे देश में एक स्वर से निंदा की गई और भगवा राजनीति के पैरोकारों से इस विषय पर सवाल किए गए जिसका जवाब उन्हें देते नहीं बन पड़ा। इसी प्रकार की अति उत्साह पूर्ण हिंसा तथा देश में बढ़ते भगवा आतंक का ही परिणाम है कि आज देश की जनता ऐसे वातावरण के लिए सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनके राजनैतिक इरादों पर सवाल उठा रही है। तो क्या इस प्रकार के उपद्रवी लोग नरेंद्र मोदी से पूछकर या उनके इशारे पर अथवा उनके कहने पर इस प्रकार की हिंसक घटनाओं को अंजाम देते हैं? शायद ऐसा नहीं है। परंतु वे लोग यह भी जानते हैं कि उनके ऐसा करने से उनके विरुद्ध कोई बड़ी आपराधिक कार्रवाई नहीं होगी और वे यह भी जानते हैं कि यदि सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा तो भविष्य में उन्हें इसका इनाम भी मिल सकता है।

                पिछले दिनों कुछ ऐसी ही घटना उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बापू भवन के निकट स्थित उत्तर प्रदेश हज कमेटी के कार्यालय को लेकर घटी। आमतौर पर सफ़ेद रंग से हमेशा रंगी जाने वाली इस इमारत को ठेकेदार द्वारा गाढ़े भगवा रंग में रंगे जाने का प्रयास किया गया। कुछ दिन पूर्व ही यह ख़बर भी आई थी कि उत्तर प्रदेश के मु यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने कार्यालय एनेक्सी भवन को भगवा रंग में रंगवा दिया है। लोगों का कहना है कि योगी जिस भगवे रंग के परिधान का स्वयं प्रयोग करते हैं पूरे प्रदेश को वे उसी रंग में रंग देना चाहते हैं। वहां के सरकारी कार्यालय हों या परिवहन बसें,पुलिस थाने व कई सरकारी कार्यालय आदि सबकुछ भगवा रंग में रंगने की कोशिश की जा रही है। यहां भी यही सवाल उठता है कि क्या योगी आदित्यनाथ स्वयं प्रत्येक विभाग को लिखित रूप में यह निर्देश दे रहे हैं कि अमुक भवन या परिवहन को भगवा रंग में रंग दिया जाए या फिर यह ‘मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त’ की तर्ज़ पर काम करने वाले चाटुकार किस्म के लोगों की ही एक ऐसी जमात है जो महज़ योगी को ख़ुश करने के लिए ऐसी जगहों पर भी भगवा रंग का इस्तेमाल कर रही है जो स्वयं योगी आदित्यनाथ को भी नहीं भा रहा? हालांकि मु यमंत्री के एक मात्र मुस्लिम मंत्रिमंडलीय सहयोगी मोहसिन रज़ा को भगवे रंग से उर्जा व प्रकाश पंुज निकलता दिखाई देता है। वे सभी को इस रंग में रंगने की वकालत करते हैं। परंतु जिस समय हज हाऊस को भगवा रंग में रंगने की ख़बर मीडिया में प्रसारित हुई और चारों ओर से इसकी आलोचना होने लगी तो आख़िरकार शासन के निर्देश पर ही हज कमेटी के सचिव को यह बयान देना पड़ा कि-‘पुताई कर रहे ठेकेदार द्वारा रंग गाढ़ा कर दिया गया था जिसकी सूचना मिलते ही पूर्व में निर्धारित किए गए रंग से ही पुताई करने के निर्देश जारी करते हुए ठेकेदार के विरुद्ध कार्रवाई करने की तैयारी भी की जा रही है।’

                अब चाहे वह ठेकेदार को बलि का बकरा बनाने का प्रयास हो या किसी चाटुकार किस्म के नेता अथवा किसी नौकरशाह के चाटुकारितापूर्ण मंसूबों पर पानी फिरना जो भी हो परंतु यह तो तय है कि यह मु यमंत्री योगी के निर्देष पर किया जाने वाला काम नहीं था। अन्यथा  इस भवन को भगवे रंगस से रंगे जाने से कौन रोक सकता था।  ऐसी ही कोशिशें उत्तराखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ख़ुश करने  के लिए की जा रही हैं। ख़बरों के मुताबिक उत्तराखंड सरकार ने राज्य के मदरसों को प्रधानमंत्री के चित्र सभी मदरसों में लगाने के निर्देश दिए हैं। इन परिस्थितियों में साग़र ख्य्यामी की व्यंगपूर्ण यह चार लाईनें अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है    

ऐसी कोई मिसाल ज़माने ने पाई हो-हिंदू के घर में आग ख़ुदा ने लगाई हो?

बस्ती किसी की राम ने यारों जलाई हो? नानक ने सिर्फ़ राह सिखों को दिखाई हो?

राम-ओ-रहीम, नानक-ओ-ईसा तो नर्म हैं। चमचों को दखिए तो पतीली से गर्म हैं।



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