भाजपा भी सरकारी मनोनयन की तैयारी में, जिलों के 200 प्रमुख लोग किये जायेगें समायोजित
| -K.P. Singh - Jan 23 2018 3:10PM

भारतीय जनता पार्टी भी जिलों-जिलों मेें पार्टी की बेचैन आत्माओं के उद्धार के लिए समाजवादी पार्टी की तर्ज पर सरकारी संस्थाओं, कार्यालयों और निगमों में उन्हें बैठाने की तैयारी में जुटी है हालांकि इसमें उसे कई पेंचों का सामना करना पड़ रहा है।

विधान सभा चुनाव के प्रत्याशी तय करने में भारतीय जनता पार्टी ने संघ की सिफारिश को ज्यादा महत्व दिया। जिससे ज्यादातर टिकिट मुख्य धारा से छिटके लोगों को मिले। जबकि सपा, बसपा के 15 वर्ष के शासन में अग्रिम मोर्चें पर जूझने वाले नेताओं, कार्यकर्ताओं को हताशा का सामना करना पड़ा। वे लोग इसे पचा नही पा रहे हैं। दूसरी ओर संघ की सिफारिश पर जो लोग विधायक बने वे जब कुछ नही थे तो निष्कामसेवी लगते थे लेकिन पावर मिलते ही उनका रूप बदल गया है। अभी प्रदेश में चुनाव हुए एक वर्ष नही बीता और इतने कम समय में ही उन्होंने धैर्य खो दिया है। ज्यादातर विधायक हर तरह से पैसे कमाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसमें उन्हें उन लोगों को साझीदार बनाने में परहेज नही है जो भाजपाइयों से दुश्मन से ज्यादा बुरा बर्ताव करते थे। जबकि अपनी ही पार्टी के असली नेताओं से वे पूरी सतर्कता बरतते हैं। ये लोग उन्हें अपने लिए खतरा नजर आते हैं इसलिए उनकी कोशिश रहती है कि इनके भाव न बढ़ पायें। इससे टकराव बढ़ रहा है।

भाजपा हाईकमान के पास जो खबरे पहुंची है उसके मुताबिक विधान सभा चुनाव में सफलता प्राप्त करने वाले ज्यादातर लोगों का अपना कोई जनाधार नही है। अगर पार्टी की हवा न होती तो चुनाव मैदान में उनका पता भी नही चलता। दूसरी ओर टिकिट से वंचित किये गये तेज-तर्रार नेताओं के पास ठीक-ठाक निजी वोट बैंक है। ऐसे में अगर यह लोग पार्टी से विमुख हो गये तो लोकसभा चुनाव में प्रदेश में भाजपा अपनी सीटों की वर्तमान संख्या बरकरार नही रख पायेगी जबकि उत्तर प्रदेश में मिले प्रचंड बहुमत की वजह से ही केंद्र में निद्र्वंद सरकार बनाने का मौका भाजपा को मिल पाया था।

इसलिए भाजपा हाईकमान पार्टी के असली नेताओं को साधने के लिए फिक्रमंद हो गया है। उन्हें सत्ता में होने का एहसास कराने के लिए पार्टी ने 200 लोगों का मनोनयन करके उन्हें वीआईपी दर्जा दिलाने की योजना बनाई है। इसके लिए सूची बनाने की कवायद काफी दिनों से चल रही है लेकिन इसे अंतिम रूप इसीलिए नही दिया जा सका क्योंकि इसमें बाहर से आये लोगों के 50 नाम थे। जिन पर वरिष्ठ नेताओं ने एतराज जताया था। यह सूची सांसदों और मंत्रियों ने तैयार कराई थी। जाहिर है कि पावर में आने के बाद यह लोग पार्टी के प्रति वफादारी निभाने की बजाय अपना कोकस तैयार करने पर ध्यान दे रहे हैं जिससे पार्टी असंतुलन का शिकार हो रही है।

इसीलिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उनकी मंशा के अनुरूप बनाई गई सूची को पास नही होने दिया। खबर तो यह है कि अभी तक तीन बार सूची दर्ज की जा चुकी है। प्रदेश नेतृत्व ने बवाल से बचने के लिए प्रस्तावित सूची केंद्रीय हाईकमान को भेजने का रास्ता अपनाया। जहां से तीनों बार सूचियां वापस हो गईं। केंद्रीय हाईकमान के हस्तक्षेप से अब जो फार्मूला तैयार किया गया है उसमें तय हुआ है कि बाहर से आये केवल पांच प्रतिशत लोगों को मनोनयन में स्थान दिया जायेगा। इनमें वे लोग होगें जिन्होंने लोक सभा और विधानसभा के चुनाव मे पार्टी के लिए बाकई में जान लगा दी थी। सत्ता में बदलाव का आभास पाकर तमाम तिकड़मबाज सदाबहार रहने के लिए विधानसभा चुनाव के पहले पार्टी से जुड़ गये थे उनसे परहेज किया जायेगा।

इस बीच सहकारिता के चुनाव की प्रक्रिया प्रदेश में जारी है। इस पर भी हाईकमान द्वारा निगाह रखी जा रही है। सहकारिता में शीर्ष संस्थाओं में प्रमुख स्थानीय नेताओं को जो अभी किसी पद पर नही हैं। समायोजित कराने पर बल दिया जा रहा है। जिससे अवसरवादी निराश हैं। बताया गया है कि सरकारी संस्थाओं और निगमों में मनोनयन की सूची सहकारिता के चुनाव के बाद ही जारी होगी। तांकि सपा, बसपा शासन में अग्रिम मोर्चे पर रहने वाले जिलों के नेता ज्यादा से ज्यादा सत्ता में समायोजित हो सकें। स्थानीय निकाय चुनाव के परिणामों का स्वाद भी पार्टी हाईकमान को याद है। जिसकी वजह से नगर निगमों में भले ही पार्टी को कितनी भी सफलता मिली हो लेकिन नगर पालिका व नगर पंचायतों में उसे निराशा जनक परिणामों का सामना करना पड़ा था।

गौरतलब यह है कि केंद्र सरकार लोक सभा चुनाव समय से पहले इसी वर्ष कराने के प्रस्ताव पर भी विचार कर रही है। इसलिए पार्टी और ज्यादा जल्दबाजी में है। संगठन स्तर पर भी फेरबदल होना है। कई जिलों में अध्यक्ष बदलने का भी प्रस्ताव है। संगठन में भी मजबूत पहचान वालों को ही वरीयता मिलेगी। अधिकारियों के स्थानांतरण को लेकर भी राज्य सरकार आने वाले लोक सभा चुनाव के मददेनजर अपनी रीति-नीति बदलने जा रही है। अब पार्टी के लोगों की सिफारिश के आधार पर अधिकारी रखने और बदलने का रास्ता खोला जायेगा। पार्टी का आकलन है कि लोक सभा चुनाव में हवा का फायदा नही मिलेगा पूरा खेल रणनीति का होगा। जिसमें किसी भी तरह की कोताही पार्टी को भारी पड़ सकती है।



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