अम्बेडकरनगर के कलेक्टर से.....
| Dr. Anil Upadhyay 'Mela' - Jan 27 2018 5:20PM

खबर की दुनिया में रात दिन अपने को जोड़कर रखने वाले पत्रकार बंधुओं को एक बड़ी उम्मीद रहती है. 15 अगस्त और 26 जनवरी को प्राप्त होने वाली कुछ आर्थिक सहायता जो विज्ञापन के रूप में पैकेज के रूप में मित्रवत भाव से शासन-प्रशासन अथवा व्यापारिक वर्ग से प्राप्त होता है जो उनके जीविकोपार्जन का एक पवित्र साधन होता है परंतु 26 जनवरी अथवा 15 अगस्त की पूर्व संध्या पर जिस तरह से मुरझाए हुए चेहरे भागमभाग करते पत्रकार बंधु इस ऑफिस से उस ऑफिस इस सड़क से उस सड़क भागते-दौड़ते मिलते हैं उससे चौथे स्तंभ की आर्थिक हीनता का एक बोध होता है जिसे प्रशासन भी समझता है.

आम जनमानस भी महसूस करता है फिर भी विज्ञापन की तलाश में पूरा दिन नकारा साबित होने के बाद, पत्रकारों की आर्थिक दशा और जीवन यापन का तरीका देखने के बाद जिला प्रशासन से इस विषय पर साफ-सुथरी बात करने की जरूरत है. परंतु अपनी ढपली अपना राग के चलते अखबारों के कहे जाने वाले तथाकथित बड़े लोग अथवा रहनुमा नेता क्लब के पदाधिकारी आज का पहल न करना अथवा संबंधित विषय से गुरेज करना या तो आत्महीनता है या तो जैसे चल रहा है चलने देने में उन्हें खुशी है फिलहाल जिलाधिकारी अंबेडकरनगर से संवेदना के स्तर पर एक सवाल तो बनता ही है कि.. 

26 जनवरी और 15 अगस्त को अखबारों और चैनलों के लिए उन्होंने पैकेज स्वरूप क्या व्यवस्था कर रखा है? सरकारी दफ्तरों से होने वाले करोड़ों रुपए के गबन Hera Pheri और ताजपोशी, व उत्सव पर आने वाले ख़र्चों में कुछ कटौती कर के अगर एक मात्र पत्रकार बंधुओं के जीवन यापन का सहारा कुछ सार्थक धनराशि यदि देते तो बुरा क्या है. काले धन की बात करने वाली सरकार अपने गोरे धन में से वित्त पोषित एवं गैर वित्तपोषित समाचार कर्मियों के निमित्त कौन सा धनात्मक सोच अख्तियार किए हुए हैं?* प्रबुद्ध वर्ग को सोचना होगा.

यही कि विज्ञापन के लिए भटके भटके मारे मारे फिर रहे , वह पत्रकार बंधु जो दिन-रात खबरों के कलेक्शन में लगे रहते  है और अपने संपादकों के इशारे पर अखबार का व्यवसायिक व निजी जीवन चलाने के संदर्भ में वर्ष में एक दो विज्ञापन ही जहां उनके आय के स्पष्ट और पवित्र स्रोत बनते हैं. उस पर सरकार की निजी राय क्या है, आज छोटे से विज्ञापन का पैकेज प्राप्त करने के लिए बड़े बाबुओं से लेकर बड़े साहब तक के दरवाजे खटखटा रहे है पत्रकार. बिल्कुल सही बात है चिंतन करना चाहिए.

जिला प्रशासन को और विज्ञापन के 1 दिन पहले से लेकर अगले दिन तक अधिकारियों और विभागाध्यक्षों के भगोड़े पन का व्यवहार देखकर पत्रकारों की मनोदशा का जो चित्र देखने को मिला है. वह इस सवाल पर सोचने का मन ही नहीं हो रहा है कि *विदेशी मीडिया ने मोदी के भाषण को अनदेखा क्यों किया? पत्रकारों की जरूरतों को मात्र एक विज्ञापन के मद्देनजर डीएम अंबेडकरनगर ने अनदेखा क्यों किया? अपने आप में यह बड़ा सवाल है....-डा. मेला



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