चीन की चौसर के प्यादे बनते प्रभावशाली देश!
| -Jagjeet Sharma - Feb 1 2018 3:25PM

अप्रैल 2006 तक नेपाल संसार का एकमात्र हिंदू राष्ट्र हुआ करता था। मई 2008 में वहां राजशाही का सर्ू्यास्त हो गया और लोकतंत्र आ गया। हालांकि राजशाही के दिनों में भी चीन के साथ नेपाल के संबंध बहुत अच्छे हुआ करते थे, लेकिन लोकशाही आने के बाद तानाशाही प्रवृत्तियों वाले चीन-परस्त क युनिस्टों का रोबदाब जनता को कुछ ज़्यादा ही लुभाने लगा। दिसंबर 2017 में वहां हुए संसदीय चुनावों में एक बार फिर मार्क्सवादी-लेलिनवादी और माओवादी क युनिस्टों के वामपंथी गठबंधन की भारी विजय भी यही बताती है। दुनिया भर में हर जगह मरणासन्न क युनिस्ट नेपाल में सत्तारूढ़ होने का जश्न मना रहे हैं तो दाल में कहीं कुछ काला ज़रूर है। नेपाल में इस बार भी चीन के प्रति झुकाव रखने वाले वामपंथी गठबंधन की भारी विजय के एक नहीं, अनेक कारण गिनाये जाते हैं। लेकिन, एक कारण ऐसा है, जिस पर राजनैतिक विश्लेषक कम ही ध्यान देते हैं या प्रायः अनदेखा कर देते हैं। वह है नेपाल में चीन की चेक-बुक राजनीति। चीन नेपाल में प्रत्यक्ष तौर पर तो बड़ी-बड़ी सड़क, रेल या बांध परियोजनाओं के लिए मोटी-मोटी धनराशियों वाले चेक बांटने में तत्पर दिखता है, पर, पर्दे के पीछे वह ऐसे नेताओं, पत्रकारों व अन्य प्रभावशाली लोगों की ज़ेबें गरम करने में भी सक्रिय रहता है, जो जनमत को उसके पक्ष में झुकाने में सहायक हो सकते हैं।

जर्मनी में कोलोन और बर्लिन से प्रकाशित होने वाले दो बड़े दैनिकों के पेकिंग (बीजिंग) स्थित संवाददाता का कहना है कि नेपाल के दीर्घकालिक मित्र भारत का यह सोचना कतई निराधार नहीं है कि चुनावी खेल में पैसा देकर सार्वजनिक मत को अपने पक्ष में प्रभावित करने में नेपाल के उत्तरी पड़ोसी का हाथ था। इतना तय है कि नेपाल में हुए चुनाव में पेकिंग के रणनीतिकारों की भी जीत हुई है। पेकिंग स्थित यह जर्मन संवाददाता वास्तव में चीन का काफ़ी प्रशंसक ही रहा है न कि प्रखर आलोचक। तब भी सच्चाई तो सच्चाई ही है। 29 दिसंबर 2017 की अपनी एक रिपोर्ट में उसका कहना है कि चीन इस समय कभी आर्थिक प्रलोभनों तो कभी साइबर हमलों या फिर पैसा देकर ख़रीदे गये प्रचारकों के माध्यम से, बहुत ही निरंतरता और दृढ़ता के साथ, पूरे भूमंडल पर बड़ी तेज़ी से अपना प्रभाव फैलाने में लगा है। अपनी विवेचना में इस जर्मन पत्रकार ने लिखा कि दुनिया भर में अपने समर्थक, चाटुकार और जासूस बनाना भी चीन की रणनीति का हिस्सा है। विदेशों में रहने वाले चीनियों को भी इस रणनीति का अंग बनाया गया है। दुनिया का सबसे बड़ा पूंजीपति चीन अपने इस अभियान पर अकूत धनराशि ख़र्च कर रहा है। उसकी कई प्रकार की सुरक्षा और गुप्तचर सेवाओं के बीच होड़ लगी हुई है कि कौन अपने लक्ष्य को सबसे पहले प्राप्त कर लेता है। एक ही दिन बाद, पेकिंग से ही 30 दिसंबर की अपनी एक दूसरी रिपोर्ट में इस जर्मन संवाददाता ने लिखा कि चीनी कूटनीतिज्ञ अफग़ानिस्तान को पाकिस्तान के साथ शांति वार्ताएं करने और आतंकवाद के विरुद्ध मिलकर लड़ने के लिए राज़ी करने में सफल हो गये हैं। उसने अफ़ग़ानिस्तान के विदेशमंत्री सलाहुद्दीन रब्बानी के एक बयान का हवाला भी दिया। उसमें रब्बानी ने कहा था, इस त्रिपक्षीय वार्ता को संभव बनाने के लिए हम चीन के प्रयासों की सराहना करते हैं।

चीन के ही प्रयासों से उसी दिन पेकिंग में अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के विदेशमंत्रियों की एक बैठक हुई थी। चीन ने अफ़ग़ानिस्तान को इस बैठक के लिए मनाने के विचार से वहां कई अरब डॉलर के बराबर निवेश करने का प्रलोभन दिया था। इस बैठक में तय हुआ कि अगली बैठक नये साल में काबुल में होगी, उसमें चीन के निमंत्रण पर तालिबान का प्रतिनिधि भी भाग लेगा। यहां ध्यान देने की बात यह है कि चीन, अफ़ग़ानिस्तान पर डोरे डालने की अपनी इस नयी कुटिल नीति के द्वारा एक साथ कई निशाने साध रहा है। अरबों डॉलर के निवेश की आड़ लेकर अफ़ग़ानिस्तान में अपने आर्थिक हित साधेगा। अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और तालिबान को एक साथ बिठा कर अपने आप को एशिया में शांति का सबसे बड़ा शुभचिंतक बतायेगा, इस सबसे भी बड़ी बात यह होगी कि अफ़गानिस्तान में पैर जमते ही चीन वहां भारत का पत्ता काटना और अपने सैनिकों का खून बहा रहे अमेरिका को इस तरह नीचा दिखाना चाहेगा कि एशिया उसका पिछवाड़ा है, वहां अब उसी की मर्ज¸ी चलेगी!

अफ़ग़ानिस्तान के संदर्भ में चीन की यह चाल यदि चल गयी, तो चीन के ही माध्यम से वहां पाकिस्तान की भी एक चिरकालिक राजनैतिक साध पूरी हो सकती है। पूर्व राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक¸ के समय से ही पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान को अपना संरक्षित प्रदेश (प्रोटेक्टरेट) बनाने के लिए तड़प रहा है। तालिबान को उसने इसीलिये पाला-पोसा और बड़ा किया कि उसके लड़ाकों की बर्बरता एक दिन पूरे अफ़ग़ानिस्तान को हथियाने में सफलता दिला सकती है। अफ़ग़ानिस्तान यदि कभी चीन के परम मित्र पाकिस्तान का हिस्सा या संरक्षित प्रदेश बन गया, तो चीन इसका स्वागत ही करेगा और पाकिस्तान कृतज्ञता-भाव से उसके सामने बिछ जायेगा। फ़िलहाल तो अफ़ग़ानिस्तान में चीन को अपनी स्वार्थपूर्ति इसी में दिखाई पड़ती है कि उसे भारी-भरकम निवेश का प्रलोभन देकर उस सब्ज़बाग़ी शम मार्ग (सिल्क रोड) योजना से जोड़ा जाये, जिसे वन बेल्ट, वन रोड (ओबीओआर) या कई बार बेल्ट ऐन्ड रोड इनिशियेटिव (बीआईआर) भी कहा जाता है। पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह को चीन से जोड़ने वाला तीन हज़ार किलोमीटर लंबा आर्थिक गलियारा चीन की इसी महत्वाकांक्षी योजना का एक हिस्सा है। इसकी कल्पना राष्ट्रपति और चीनी क युनिस्ट पार्टी के प्रमुख शी जिनपिंग ने 2013 में की थी।

दिसंबर के अंत में पेकिंग में हुए चीन-पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान विदेशमंत्री स मेलन के समय चीनी विदेशमंत्री वांग यी ने कहा, भविष्य में हम अफ़ग़ानिस्तान से होकर जाते हुए ही पाकिस्तानी गलियारे को मध्यवर्ती चीन के आर्थिक गलियारे के साथ और फिर दोनों को पश्चिम एशियाई आर्थिक गलियारे से जोड़ना चाहते हैं। जो बात चीन नहीं कहता, वह यह है कि इन तथाकथित आर्थिक गलियारों की सुरक्षा के बहाने से वह लगभग संपूर्ण एशिया में अपने सुरक्षा कर्मियों और सैनिकों की उपस्थिति को सुनिश्चित करेगा और साथ ही वहां अपने भेदियों-जासूसों का जाल भी बिछा देगा। शी जिनपिंग इस समय दुनिया के उन सभी शीर्ष नेताओं के बीच, जो अपने देशों के कर्णधार हैं, एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिसने वैश्विक राजनीति की एक महायोजना बना रखी है। चीन को विश्वमंच के क्रेंद्र में स्थापित करने और उसे 21वीं सदी की सबसे बड़ी महाशक्ति बनाने की यह महायोजना 13वीं सदी में चीन पहुंचे इतालवी यात्री मार्को पोलो द्वारा वर्णित शम मार्ग (सिल्क रोड) का एक और भी महत्वाकांक्षी आधुनिक संस्करण है। चीन का नया शम मार्ग जल, थल और वायु मार्ग से पूरी दुनिया को चीन से जोड़ देने और यथासंभव उस पर आश्रित बना देने का एक ऐसा चारा है, जो बहुत सारे देशों के लिए न तो निगलते बनेगा और न उगलते बनेगा। शी जिनपिंग बिना कोई आगा-पीछा सोचे जिस दृढ़ता और तेज़ी से उस पर अमल कर रहे हैं, वह भी कुछ देशों को लुभाने वाला लगता है, तो कुछ को चुभाने वाला।

चीन ने 100 देशों और संगठनों को अपने नये शम मार्ग के आर्थिक गलियारों में साझेदारी का निमंत्रण दे रखा है। उसने 40 देशों के साथ समझौते कर भी लिये हैं। इन समझौतों के तहत चीन की सहायता और उससे मिले कर्ज के बल पर सड़कें और रेलवे लाइनें, बंदरगाह और हवाई अड्डे, तेल और गैस की पाइप लाइनें, बड़े-बड़े बांध और बिजलीघर बनेंगे। चीन अब तक 50 अरब डॉलर कर्ज आदि के रूप में दे चुका है। समय के साथ चीन विभिन्न देशों में कुल मिलाकर 900 अलग-अलग परियोजनाओं के लिए 1000 अरब डॉलर उपलब्ध करने वाला है। तुलना के लिए, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद युद्ध से जर्जर यूरोप के पुनर्निमाण के मार्शल प्लान के लिए अमेरिकी संसद ने, 1948 से 1952 के बीच, कुल 13 अरब डॉलर उपलब्ध करने की स्वीकृति दी थी। उस समय के 13 अरब डॉलर इस समय 121 अरब डॉलर के बराबर हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो चीन इस बीच इतना बड़ा महाजन बन गया है कि वह अमेरिकी मार्शल प्लान के आज के मूल्य से भी आठ गुनी अधिक धनराशि अपने शम मार्ग और उससे जुड़ने वाले कथित आर्थिक गलियारों के निर्माण के लिए उपलब्ध करने जा रहा है!

यह सब चीन की उदारता के बदले आर्थिक क्षमता और राजनैतिक महत्ता का सिक्का जमाने की तत्परता का प्रतीक है। वह अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान या रूस और भूतपूर्व सोवियत संघ वाले एशियाई देशों को ही अपने रेशमी जाल में नहीं फंसा रहा है, आज के यूरोपीय संघ के पूर्वी यूरोप वाले देशों में भी अपने पैर जमा रहा है। इन देशों पर अपने रेशमी डोरे डालने के लिए उसने 2012 में 16+1 (सेंट्रल ऐन्ड ईस्टर्न यूरोपीयन कंट्रीज़ ऐन्ड चाइना सीईईसी) नामक एक गठबंधन बनाया। इस गठबंधन का छठां शिखर स मेलन 27 नवंबर 2017 को हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में हुआ। 16+1 के 11 सदस्य बुल्गारिया, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, हंगरी, एस्तोनिया, लातविया, लिथुआनिया, पोलैंड, रोमानिया, स्लोवाकिया और स्लोवेनिया यूरोपीय संघ के भी सदस्य हैं। पांच अन्य देश अल्बानिया, बोस्निया- सेगोविना, मेसेडोनिया, मोन्टेनेग्रो और सर्बिया यूरोपीय संघ की सदस्यता पाने के प्रत्याशी हैं। यूरोपीय संघ, और जर्मनी व फ्रांस जैसे उसके प्रमुख सदस्य देश, चीन की पहल पर बने 16+1 (सीईईसी) को शक की नज़र से देखते हैं। उन्हें लगता है कि चीन इस गुट के माध्यम से यूरोपीय संघ की पहले से ही ढीली-ढाली एकता में ख़तरनाक दरार डाल सकता है। चीन ने इन देशों में विभिन्न प्रकार के आधारभूत निर्माणकार्यों के लिए पहले 15 अरब डॉलर का निवेश करने की घोषणा की थी, जिसे उसने अब बढ़ाकर 18 अरब डॉलर कर दिया है। उसने ग्रीस (यूनान) का पिरेयस नामक एक प्रमुख बंदरगाह ख़रीद लिया है और वहां से बुडापेस्ट तक वह एक नयी रेलवे लाइन बिछाना चाहता है। चीनी जहाज़ पिरेयस में जो माल उतारेंगे, वह इसी रेलवे लाइन द्वारा बाल्कन प्रायद्वीप को पार करता हुआ बुडापेस्ट पहुंचेगा।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों चंद माह पहले चीन में थे। वहां जाने से पहले वे भी चीन के नये शम मार्ग को संदेह की दृष्टि से देखते थे। लेकिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उनकी ऐसी असाधारण आवभगत की और 100 एयरबस विमानों सहित अरबों डॉलर वजनी ऐसे-ऐसे सौदों का प्रलोभन दिखाया कि माक्रों भी लार टपकाये बिना नहीं रह सके। वे इतना ही कह सके कि यूरोप की तरफ जाने वाली चीनी रेशम की सड़कें ऐसी न हों कि जिन देशों से हो कर वे गुज़रें, वे पराश्रित बन जायें। यूरोपीय संसद की वाणिज्य समिति के अध्यक्ष बेर्न्ड लांगे का कहना है कि चीन के भारी निवेश से पूर्वी यूरोप के देश न केवल उस पर आश्रित हो जायेंगे बल्कि चीन उनके माध्यम से यूरोपीय संघ की नीतियों को भी प्रभावित करेगा। जर्मन नेता और मीडिया चीन की प्रशंसा के पुल बांधने में वैसे तो कोई कसर नहीं छोड़ते, पर धीरे-धीरे उनका भी माथा ठनकने लगा है। जर्मनी के एक सबसे बड़े मीडिया ग्रुप बेर्टेल्समान के एशिया विशेषज्ञ बेर्नहार्ड बार्च का कहना है, चीन लोकतांत्रिक शासन-प्रणालियों के खुलेपन का लाभ उठा कर वहां के जनमत को अपने एजेंडे के अनुकूल प्रभावित करने की फ़िराक में रहता है। दूसरी ओर वह अपनी संस्कृति और राजनीति को बाहरी प्रभावों से मुक्त रखने की बधाएं निरंतर और ऊंची करता जा रहा है। उनके मुताबिक इसलिए अब यूरोप में भी एक ऐसी बहस की ज़रूरत है कि निरंतर शक्तिशाली होते जा रहे चीन के साथ जो साथी भी है और प्रतिद्वंद्वी भी कैसे पेश आया जाये।

जर्मनी में चीन काफ़ी हद तक इस बात के लिए जाना जाता था कि वह नकल करने और तकनीकी जानकारियां पाने के लिए औद्योगिक जासूसी में सबसे माहिर है। लेकिन संघीय संविधान-रक्षा कार्यालय (बीएफ़वी) नाम की जर्मनी की आंतरिक गुप्तचर सेवा इधर कुछ समय से आगाह करने लगी है कि जो लोग व्यावसायिक सोशल मीडिया लिंक्डइन के यूजर हैं, वे सावधान हो जायें। चीन लिंक्डइन के माध्यम से नये जासूस बनाने में लगा है। बीएफ़वी का कहना है कि चीन की गुप्तचर सेवाएं लिंक्डइन या उसके जैसे इंटरनेट मीडिया के माध्यम से विदेशों में बैठे लोगों से इस तरह संपर्क करती हैं कि उन्हें भनक तक नहीं लग पाती कि इस प्रयास के पीछे कोई चीनी गुप्तचर सेवा या उसका कोई एजेंट छिपा हुआ है। उदाहरण के लिए, चीन के किसी कथित शोध संस्थान से किसी युवा चीनी महिला का जर्मनी में एक व्यक्ति के पास संदेश आता है कि वह एक शोध के सिलसिले में उसका सहयोग चाहती है। वह व्यक्ति जो भी जानकारी देगा, उसके बदले में उसे पैसा दिया जायेगा। सब कुछ बिना किसी अनुबंध या शर्त के, पारस्परिक आधार पर होगा। संपर्क की शुरुआत कुछ इसी तरह होती है। पैसे के लालच में बहुत से लोग इस पेशक¸श को मान लेते हैं और एक बार इस दलदल में पैर डाल देने के बाद बाहर निकल नहीं पाते। माना जा सकता है कि चीनी गुप्तचर सेवायें यदि जर्मनी में अपने जासूसों का जाल फैला रही हैं, तो वे भारत और नेपाल जैसे चीन के पड़ोसी देशों में भी ऐसा ही ज़रूर करती होंगी। जर्मनी की गुप्तचर सेवाओं का कहना है कि चीन और उसके एजेंट पूर्वी यूरोप के देशों में यूरोपीय संघ के प्रति बढ़ते हुए असंतोष का लाभ उठाने में लगे हैं। गांठ का पूरा यानी जेब में वजन होने के कारण चीन को उनकी मित्रता ख़रीदने में आसानी हो रही है। 16+1 गुट इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

चीन बोस्निया जैसे एक छोटे और उपेक्षित देश में भी 2012 से 2017 तक साढ़े तीन अरब डॉलर के बराबर निवेश कर चुका है जो बोस्निया के सकल घरेलू उत्पाद के पांचवें हिस्से के बराबर है। यूरोपीय संघ ने यदि टांग न अड़ाई होती, तो चीन, इस समय, दो अरब डॉलर लगा कर हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट और सर्बिया की राजधानी बेल्ग्रेड को जोड़ने वाली एक नयी रेलवे लाइन बना रहा होता, यूरोपीय संघ कह रहा है कि यह काम शुरू होने से पहले सार्वजनिक टेंडर (निविदाएं) आमंत्रित किये जाने चाहिये, ताकि यूरोपीय कंपनियां भी इस रेलवे लाइन के निर्माण के ठेके ले सकें। चीन केवल अपनी कंपनियों को ठेके देना चाहता है। ऐसा भी नहीं है कि यूरोप में अपना दबदबा बढ़ाने के चक्कर में चीन अपने आस-पास के देशों पर कम ध्यान दे रहा है। पाकिस्तान में तो उसकी तूती बोलती ही है। थाइलैंड ने भी लगभग आत्मसमर्पण कर रखा है। वह ऐसे लोगों को चीन को समर्पित कर देने में कोई संकोच नहीं करता, जिन्हें चीन राजनैतिक कारणों से जेल में डाल देना चाहता है। यांमार भी चीन की ठकुरसुहाती करने लगा है। आंग सान सू ची दिसंबर के आरंभ में पेकिंग में थीं। वहां उन्होंने एक साझे आर्थिक क्षेत्र के निर्माण के चीन के आग्रह को स्वीकार कर लिया। लाओस और कंबोडिया बहुत पहले से ही चीन पर आश्रित हैं। केवल वियतनाम चीन के प्रलोभनों या धौंस-धमकियों में नहीं आता। दोनों क युनिस्ट हैं और एक समय घनिष्ठ बंधु-देश रह चुके हैं। तब भी, चीन 1979 में वियतनाम पर उसी तरह का हमला कर चुका है, जैसा उसने 1962 में भारत पर किया था। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल ने हाल में आरोप लगाया कि चीन उनके देश में भी जनमत को बरगलाने और सरकारी नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। उनका कहना था, हम देख रहे हैं कि चीन द्वारा हमारी राजनैतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने की बेमिसाल और बहुत ही परिष्कृत कç¸स्म की कोशिशें हो रही हैं।

टर्नबुल के इस वक्तव्य के पीछे कारण यह था कि चीन ने ऑस्ट्रेलिया के एक सांसद को इस बात के लिए पैसा दे कर ख़रीद लिया था कि वह दक्षिणी प्रशांत महासागर में चीन की सैनिक गतिविधियों के प्रति ऑस्ट्रेलिया में अनुकूल वातावरण बनाने का काम करेगा। इस प्रकरण का पता चलने के बाद ऑस्ट्रेलिया की संसद में एक विधेयक लाया गया, जिसमें महत्वपूर्ण लोगों द्वारा विदेशी शक्तियों से किसी भी प्रकार की दान-दक्षिणा लेने या धन प्राप्त करने को दंडनीय अपराध मानने का प्रावधान है। उन्हीं दिनों ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता वाले चीनी मूल के लोगों के पास चीनी सरकार की ओर से ऐसे टेलीफ़ोन भी आये, जिनमें उनसे आग्रह किया गया था कि अगले चुनाव के समय वे विपक्ष को वोट दें। चीन की इस कुटिलता की ऑस्ट्रेलिया में हुई निंदा को चीन के सरकारी मीडिया ने नस्लवाद का रंग दे दिया। चीनी मीडिया में कहा जाने लगा कि प्रधानमंत्री टर्नबुल की नस्लवादी सरकार चीन के साथ अच्छे संबंधों को पैरों तले रौंद रही है। इसलिए सोचने की बात है कि जो चीन यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक में कंप्यूटर हैक कर सकता है, सांसदों को ख़रीद सकता है, सोशल मीडिया के माध्यम से नये जासूस बना सकता है और अर्थव्यवस्था में निवेश के नाम पर मुक्तहस्त पैसा लुटाकर विदेशी सरकारों तक को नचा सकता है, वही चीन क्या नेपाल, पाकिस्तान या अफ़ग़ानिस्तान के चुनावों के परिणामों को राम भरोसे छोड़ देगा? चीन की हरकतें वास्तव में ऐसी हैं कि जो लोग और देश, किसी धूमकेतु की तरह आकाश में उसके विस्मयकारी उदय को लेकर मंत्रमुग्ध हैं, आज तालियां पीट रहे हैं, वे एक न एक दिन अपना माथा पीट रहे होंगे। एशिया में केवल दो प्रमुख देश -भारत और जापान- इस विलाप का अपवाद होंगे।



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