यूपी के पुलिस कप्तानों को सोते में भी नजर आ रहा है नये डीजीपी का भूत
| -K.P. Singh - Feb 2 2018 11:15AM

     प्रदेश पुलिस के नये मुखिया ओपी सिंह ने अपनी शुरुआत धमाकेदार ढंग से की है हालांकि कासगंज दंगे का गर्दगुबार छटने के बाद उनकी कार्यशैली का प्रभाव उजागर होकर सामने आ पायेगा। ओपी सिंह के पूर्वाधिकारी सुलखान सिंह अपने को नाम बड़े दर्शन छोटे साबित करके विदा हुए। वे ईमानदार थे इसलिए उम्मीद की गई थी कि प्रदेश पुलिस का काफी बदरंग हो चुका चेहरा बदलने के लिए बिना समझौता किये हुए तेजतर्रारी दिखायेगें पर उन्होंने यह तो राजकाज है की स्टाइल में काम किया। जिससे यूपी पुलिस का भ्रष्ट तबका उनके कार्यकाल में अपने साहब से बहुत खुश रहा होगा। लेकिन आम जनता को ईमानदार अधिकारी के राज में भी खाकी के ढर्रे में कोई बदलाव न आ पाने से नाराजगी रही। खुद उनके गृह जनपद बांदा में डकैतों का तांडव होता रहा। जिसके पीछे उनके ढीलेढाले रवैये को ही जिम्मेदार माना जाना चाहिए। हो सकता है कि योगी ने भी बाद में अपनी पंसद को लेकर अफसोस महसूस किया हो इसलिए उन्होंने एक बार सुलखान सिंह का सेवा विस्तार कराने के बाद अगली बार इसका कोई प्रयास नही किया। इसके अलावा उनके उत्तराधिकारी के नाम में वरिष्ठता के यांत्रिक पैमाने तक अपने को बांध रखने की बजाय व्यवहारिक वास्तविकताओं पर ध्यान दिया जिसे दूध का जला छाज भी फूंक-फूंक कर पीता है का उदाहरण माना जा सकता है।
    साथ में सुलखान सिंह के समय योगी पर ठाकुरवाद का ठप्पा भी जड़ गया था। इसलिए वरिष्ठता से ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि योगी को डीजीपी की कुर्सी पर ठाकुर साहब को ही बिठाना था। जिसके कारण सूर्य कुमार शुक्ला जैसे बेहतर अफसरों की च्वाइस को उन्होंने दरकिनार कर दिया था। इन चर्चाओं के बीच जब उन्होंने ओपी सिंह को डीजीपी बनाने का फैसला लिया तो ओपी सिंह का विवादित अतीत सामने लाकर इस बात को पुख्ता किया जा रहा था कि योगी के लिए जातिवादी सर्वोपरि है। एक समय ऐसा भी आया जब केंद्र से ओपी सिंह को रिलीव नही किया जा रहा था तो जिन वैकल्पिक नामों पर राज्य सरकार द्वारा विचार करने की चर्चा सामने आई उनमें भी ठाकुर आईपीएस ही सबसे ऊपर थे। लेकिन आखिर में योगी ने अपनी संस्तुति को न बदलने का फैसला लेते हुए ओपी सिंह को कार्य मुक्त करने के लिए केंद्र को रिमाइंडर भेज दिया।
    इन स्थितियों के बीच ओपी सिंह के सामने चुनौती थी कि वे अपने से जुड़े सारे विवादों को आप्रासंगिक साबित करते हुए यह साबित करें कि राज्य सरकार ने उनका चयन मैरिट के अनुरूप किया था। इसलिए पहले दिन से ही असाधारण शुरूआत करने की चुनौती उनके सामने थी भले ही उनके पास कुछ कर दिखाने को सुलखान सिंह की तुलना में बहुत समय है। इस मामले में कहना पड़ेगा कि ओपी सिंह ने उम्मीद से ज्यादा बेहतर तरीके से ओपनिंग की है। सुलखान सिंह बाबू किस्म के अधिकारी थे और लीडरशिप का गुण न होना सबसे बड़ी कमजोरी थी। लेकिन ओपी सिंह ने पहली पत्रकार वार्ता में ही पुलिस कमिश्नर प्रणाली के लिए सीना ठोककर लीडरशिप के गुण की झलक दे दी।
    इसे अब गंभीरता से तब लिया गया जब उन्होंने प्रदेश की राजधानी लखनऊ की मलिहाबाद कोतवाली में स्वयं पहुंचकर पुलिसिंग की खोज खबर ली। जिससे यथास्थितिवाद में जकड़ जाने से बढ़ते अपराधों की चुनौती महसूस नही कर रही राजधानी पुलिस के होश ठिकाने आ गये। इस दौरान उन्होंने सभी जिलों की पुलिस को यह कहकर खबरदार कर दिया कि वे कहीं पर भी आकस्मिक रूप से थानों पर पहुंच सकते हैं। इसी के साथ 27 जनवरी को उन्होंने अपने कार्यालय के दो आईपीएस अधिकारी गोपनीय रूप से बांदा भेज दिये। जिन्होंने गैर जनपद की पुलिस लेकर गिरवां थाना क्षेत्र में बालू लदे ट्रकों से हो रही अवैध वसूली को धरपकड़ा। इससे हड़कंप मच गया। गिरवां के थानाध्यक्ष विवेक प्रताप सिंह को एक दिन पहले ही गणतंत्र दिवस पर डीजीपी का रजत पदक दिया गया था। उनकी वजह से डीजीपी कार्यालय के अधिकारियों के सामने जिला पुलिस के शर्मिंदा होने के बाद बांदा की पुलिस अधीक्षक शालिनी ने विवेक प्रताप सिंह को तत्काल निलंबित कर दिया। इससे प्रदेश भर में पुलिस के अफसर अलर्ट हो गये और हर जिले के कप्तान को रात में सोते समय भी डीजीपी का भूत दिखाई देने की नौबत आ गई है।
    ऐसा नही है कि उत्तर प्रदेश पुलिस पूरी तरह निकम्मी और भ्रष्ट हो। अगर उससे काम लेने की क्षमता सरकार व उच्चाधिकारी दिखा सकें तो यह इतनी बेहतर पुलिस भी है कि अपने सामने स्काटलैंड यार्ड की पुलिस को भी पीछे छोड़ सकती है। यह एक बार साबित हो चुका है जब कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में यूपी पुलिस की एसटीएफ विंग का गठन किया गया था। वही अफसर, वही पुलिस लेकिन यूपी एसटीएफ ने कमाल कर दिखाया। दुर्दमनीय बन चुके अपराधियों के एक के बाद एक सफाये से इसने सारे देश में पुलिस का इकबाल बुलंद कर दिया। यह इतिहास फिर क्यों नही दोहराया जा सकता।
    इस बीच कासगंज का दंगा सिर मुंड़ाते ही ओले पड़ने की तर्ज पर ओपी सिंह के कार्यकाल के सामने आ गया है। उत्तर प्रदेश में एक बार कहीं दंगा होता है तो देखा-देखी दूसरी कई जगह पर दंगे शुरू हो जाते हैं यह हुआ भी। लेकिन पुलिस के सतर्क हो जाने से अन्य जगह पैदा हुई दंगे की नौबत जहां की तहां थाम ली गई। कासगंज में दंगे की सजा तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सुनील कुमार सिंह को उन्हें पुलिस ट्रेनिंग सेंटर मुरादाबाद भेजकर दी जा चुकी है। हालांकि इसमें पुलिस कितनी दोषी थी और कितना दोष सरकार के अपने ही लोगों का रहा यह अभी सामने आना है। लेकिन उपराष्ट्रपति से लेकर राज्यपाल तक प्रदेश की कानून व्यवस्था पर सवाल उठा देने और केंद्र द्वारा कासगंज दंगे की रिपोर्ट तलब कर लेने से किसी न किसी को बलि का बकरा बनाया जाना जरूरी हो गया था। बरेली के डीएम की एक साफगोई भरी फेसबुक पोस्ट इसके बाद सामने आई। इसे लेकर सरकार द्वारा नाराजगी जताने के बाद भले ही उन्होंने माफी मांग ली हो लेकिन सरकार को आइना तो उन्होंने दिखा ही दिया है। अगर सरकार के लोग ही न सुधरे तो साम्प्रदायिक मोर्चे पर बिगड़ी स्थितियां अच्छी पुलिसिंग के बाद भी सामने आयेगीं।
    बहरहाल नये डीजीपी को अभी अपने हिसाब से टीम बनाने का मौका भी नही मिला है। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि जब वे अपने हिसाब से जिलों में अपनी टीम खड़ी कर लेगें तो पुलिस की जो हनक होनी चाहिए उसे लोग महसूस कर पायेंगे। सुलखान सिंह को लेकर यह भी कहा जाता रहा कि उन्हें अपने हिसाब से अधिकारी नियुक्त नही करने दिये गये थे। पर ओपी सिंह जिस धाकड़ तरीके से पेश आ रहे हैं उससे जाहिर हो जाता है कि पुलिस में अब नियुक्तियां उनकी मर्जी के बिना नही हो पायेगीं।
    विवादित अधिकारियों को गणतंत्र दिवस पर मेडल मिलने वाले थे उन्हें रुकवाने में भी डीजीपी ने जिस तरह से चैकन्नापन दिखाया उससे भी पता चलता है कि ओपी सिंह सक्षम सेनापति सिद्ध होगें। सुलखान सिंह लखनऊ और मथुरा के एसएसपी के लिए मेडल की संस्तुति कर गये थे तांकि सीएम योगी खुश हो जायें क्योंकि इन अधिकारियों को बहुत अच्छा सर्विस रिकार्ड न होने के बावजूद योगी से सीधे जुड़े होने की वजह से जिले मिले हैं। लेकिन शायद ओपी सिंह ने योगी से यह आश्वासन ले लिया है कि किसी कप्तान के साथ अगर उसका काम सही नही है तो कोई मुरौव्वत न करें भले ही किसी कारण से वह अफसर उनसे जुड़ा हो। कुल मिलाकर ओपी सिंह का श्रीगणेश अच्छा है बशर्ते आखिरी तक वे इसी लाइन लैंथ को बनाये रखें।



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