ज़िहाल-ए-मस्ती मकुन-ब-रन्जिश.....तो बजट से कायकु तकलीफ है...?? : अरूण जेटली
| By- Reeta Vishwakarma - Feb 5 2018 12:31PM

बीते दिवस पेश हुए बजट 2018 को लेकर लोगों के विभिन्न प्रकार के विचार प्रतिक्रिया स्वरूप पढ़ने व जानने को मिले। पक्ष-विपक्ष और जानकारों ने अपने-अपने ढंग से देश के आम बजट पर टिप्पणियाँ दिया। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। सरकार द्वारा हर बार पेश किए जाने वाले बजट उपरान्त इस तरह की प्रतिक्रियाएँ होना आम बात है।

केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली द्वारा पेश किए गए देश के आम बजट पर हमारे सहयोगी, स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक, टिप्पणीकार ऋतुपर्ण दवे ने हमें एक प्रतिक्रिया बजरिए व्हाट्सएप्प मैसेज भेजा है जिसका प्रकाशन हम यहाँ कर रहे हैं। आप भी पढ़ें और अपने विचार व्यक्त करें।

ज़िहाल-ए-मस्ती मकुन-ब-रन्जिश, बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है.............. गुलामी फिल्म के इस गाने का आज तक मतलब समझ ना आने के बावजूद भी सुन रहे हो ना??......................तो बजट से कायकू तकलीफ?............अरूण जेटजी

हमें प्राप्त इस सन्देश में ‘‘ज़िहाल-ए-मस्ती मकुन-ब-रन्जिश, बहाल-ए-हिज़रा बेचारा दिल है’’ मुखड़े वाला यह गाना 1985 में प्रदर्शित मल्टी स्टारर हिन्दी मूवी ‘गुलामी’ का है जो मिथुन चक्रवर्ती अनीता राज पर फिल्माया गया है। ‘ज़िहाल-ए-मस्ती मकुन-ब-रन्जिश- फारसी भाषा में लिखी गई इन पंक्तियों के रचयिता प्रख्यात सूफी कवि अमीर खुसरो हैं। स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार द्वारा गाये गए इस गीत को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जैसे संगीतकार ने अपने कर्णप्रिय संगीत से संवारा है। जिसका अर्थ भले ही आम लोग आज तक न समझ पाए हों फिर भी कर्णप्रिय होने की वजह से इसकी लोकप्रियता अब भी बरकरार है।

यहाँ हम गुलामी फिल्म के इस कर्णप्रिय गाने का वीडियो दे रहें जिसे आप भी सुनें और आनन्द उठाएँ--------



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