एक्जामिनेशन ड्युटी
| Dr. Avinash Kumar Jha - Feb 6 2018 1:15PM

"हो सुरेन्द्र! क्या कहा जाय? हम सब त वैसा भी दौर देखें हैं जिसमे किताब खोल के नकल होता था" बिहारी काका मूंह मे पान की खिल्ली दबाते हुए बोले! "ई" सी सी टीवी" लगने से नकल तो रुक जाएगा पर बताओ, लईका लोगन पे कितना प्रेशर रहेगा? "लेकिन काका! अच्छा तो है! जेनुइन विद्यार्थी लोग ही पास करेगा और जो ई सब लंफदर सब परीक्षा पास कर झूठे मूठे के भीड़ लगाते हैं, ऊ सब तो नही लगेगा! सुरेन्द्र बोला" कर्पूरी डिवीजन और लालू डिवीजन से कोनो लाभ हुआ? खाली बेरोजगारों की संख्या मे इजाफा हो गया!"

"पहिले गांव मे जब कोई मैट्रिक पास करता था तो चौगामा के लोग जान जाता था कि फलां बाबू के बेटा मैट्रिक पास किया है पर जबसे खुला खेल फरुखाबादी होने लगा, डिग्री का कोनो महत्व रह गया है। जिधर देखो सब हरहा- सुरहा ग्रेजुएट हो गया। चार लाइन लिखने या बोलने को कहो तो मूंह ताकने लगेगा! "पिच्च से पान की पीक बगल मे फेंकते हुए बिहारी काका बोले" नकल का ऐसी कहानी की का सुनायें!

"एकबार हम गये दरभंगा, अपने मसियौत (मौसेरा भाई) से मिलने! ग्रेजुएशन का एक्जाम चल रहा था। रात मे उसके यहाँ रुके।सुबह जब वो एक्जाम देने जा रहा था तो बोला तुम भी चलो! अब एक्जामिनेशन हाल का हाल क्या बतायें सुरेन्द्र! एक टेबल के चारो ओर दसियों लोग गोलबंदी करके बैठे, गेस पेपर खोलकर परीक्षा दे रहे थे। ऊ भी जाके वहीं लिखने लगा, हमको बोला रुको थोड़ी देर मे चलते हैं! हम कहे "बस हो गई परीक्षा? "हां! वो कापी तो घर से ही लिखकर ले आये थे! देखते हैं कौन कौन प्रश्न पूछा है, उसकी आंसर शीट अलग करके जमा कर देंगे!" मै भौंचक!

ई क्या हो रहा है?

वो बोला" अरे दस क्वेश्चन गेस करके, दसों का आंसर कापी पर लिख लिए हैं। पांच तो लड़बे करता है! वही पांच का आंसर वाला कापी लगाकर जमा कर देंगे! मै बोला "कापी कहां से मिली? बोले एक दिन पहले जुगाड़ हो जाता है। इसी कालेज मे पढे हैं तो एतन हेल्प उ लोग नही करेगा!" "लेकिन काका! इसका घाटा भी तो तेज बच्चा सभ को हुआ न! किलो के हिसाब से तौलकर नंबर दिया जाता था! सब धान साढे बाइस पसेरी" एवरेज मार्किंग का लाभ तो भुसकौल लड़का लोग को हुआ न! तेज विद्यार्थी सभ तो ठगा गया!" सुरेंद्र बोला" चाय पीयेंगे! हामी का इंतजार किए बिना सुरेन्द्र ने आवाज लगाई" अजी सुनती हो दो कप चाय बैठकी मे भेज दीजिएगा! एक बिना चीनी के!"

"अब जब न कोनो इनविजलेटर और न कोनो मजिस्ट्रेट!पूरा राम राज्य था! जो चाहो सो करो! तब तो पूरा समाजवाद आ ही गया था और  उस समय सरकार चाहती भी यही थी कि सब लोग पास कर जायें" काका उच्छवास भरते हुए बोले! "हमारे गांव मे पास करने वालों को हमलोग कोदारी (कुदाल) के पास बुलाते थे। सालभर खेत मे कुदाल चलाया और किताब खोलके परीक्षा दिया "पास"! और जो सालभर मेहनत किया, कलम घिस्सा! ऊहो "पास"! था न समाजवादी व्यवस्था!

"लेकिन अब तो एक एक स्कूल पर कई अधिकारी लगा दिए गए हैं। स्टैटिक मजिस्ट्रेट, सेक्टर मजिस्ट्रेट, जोनल मजिस्ट्रेट, सुपर जोनल मजिस्ट्रेट, फ्लाइंग स्क्वायड, सी सी टी वी! अब क्या नकल होगा? अब माफियाओं का क्या होगा? जो ठेका लेते पास कराने का! ब्लैकबोर्ड पर आंसर लिखवाते थे। पिछलीवार तो परीक्षा के समय ब्लैकबोर्ड पर मिट्टी पोतवा दिए थे, फिर भी बोलकर लिखाने की शिकायत मिली थी।"

बिहारी काका चाय को जल्दी जल्दी सुड़कते हुए बोले" "चलें कल से हमरी भी ड्यूटी लगी है! सबेरे छ बजे स्कूल पहुंचकर कापी का बंडल सामने खुलवाना है और व्हाट्सएप भी करना है!" फ्री और फेयर एक्जामिनेशन जो कराना है"! सुरेन्द्र सोचने लगा! इस तरह सभी विभाग के अधिकारी अपना काम धंधा छोड़कर परीक्षा करवाने लगे तो उनके अपने विभाग के काम का क्या होगा? कोई बात नही देश का भविष्य संवारना है तो ज्यादा काम करना ही होगा"!



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