आचार्य स्वामी ओमप्रिय आनन्द की रचना- "नर पर नारी कितना भारी..."
| By- Reeta Vishwakarma - Feb 7 2018 3:24PM

हमारे एक मित्र हैं जो खूबसूरत होने के साथ-साथ विद्यावान भी हैं। उनमें चतुराई और हाजिर जवाबी कूट-कूट कर भरी हुई है। दूसरों के प्रति उनका नजरिया काफी हद तक पॉजिटिव ही रहता है। वह हर किसी के मित्र कहे जा सकते हैं। हम उन्हें इन सब गुणों के कारण आचार्य स्वामी ओमप्रिय आनन्द जी कहते हैं। वह जहाँ तक हमें पता है हिन्दी, अंग्रेजी और भोजपुरी व अवधी भाषा के जानकार हैं। जितने खूबसूरत वो हैं उतना ही खूबसूरत उनका चश्मा।

शायद यही कारण है कि उन्हें हर चीज खूबसूरत ही दिखाई देती है। आचार्य स्वामी ओमप्रिय आनन्द जी उत्तर प्रदेश पुलिस महकमें में अच्छे पद पर नियुक्त हैं। वे कर्मठ, तेज-तर्रार, सतर्क पुलिस अधिकारियों में गिने जाते हैं। चौबीस घण्टे की ड्यूटी वह भी बगैर नागा के करने के बाद भी उन्हें रंच मात्र भी थकान नहीं लगती। कार्य से जरा भी फुरसत मिलने पर आचार्य जी सोशल मीडिया के जरिए अपने चाहने वालों का भी हाल लेते रहते हैं।

यदि हम यह कहें कि उनसे चैटिंग करने वाले को भाग्यशाली कहा जा सकता है तो हम भी अपने को उसी श्रेणी में रखेंगे। आज कुछ देर पहले आचार्य जी ने एक रचना प्रेषित किया है। न चाहते हुए भी हम उसे यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने नारी के प्रति अपना दृष्टिकोण रखा है। उनके द्वारा अग्रेषित/प्रेषित रचना में विधाता ब्रम्हा जी और नारी के बीच संवाद को बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। नर पर नारी कितना भारी है यह जानने के लिए आप आचार्य स्वामी ओमप्रिय आनन्द जी द्वारा हमें भेजी गई रचना को आद्यान्त पढ़ें और अपनी टिप्पणियाँ दें। -रीता

अक्ल बाटने लगे विधाता,
             लंबी लगी कतारी।
सभी आदमी खड़े हुए थे,
            कहीं नहीं थी नारी।
सभी नारियाँ कहाँ रह गई,
          था ये अचरज भारी।
पता चला ब्यूटी पार्लर में,
          पहुँच गई थी सारी।
मेकअप की थी गहन प्रक्रिया,
           एक एक पर भारी।
बैठी थीं कुछ इंतजार में,
          कब आएगी बारी।
उधर विधाता ने पुरूषों में,
         अक्ल बाँट दी सारी।
ब्यूटी पार्लर से फुर्सत पाकर,
        जब पहुँची सब नारी।
बोर्ड लगा था स्टॉक ख़त्म है,
        नहीं अक्ल अब बाकी।
रोने लगी सभी महिलाएं,
        नींद खुली ब्रह्मा की।
पूछा कैसा शोर हो रहा है,
         ब्रह्मलोक के द्वारे?
पता चला कि स्टॉक अक्ल का
         पुरुष ले गए सारे।
ब्रह्मा जी ने कहा देवियों,
          बहुत देर कर दी है।
जितनी भी थी अक्ल वो मैंने,
          पुरुषों में भर दी है।
लगी चीखने महिलाये,
         ये कैसा न्याय तुम्हारा?
कुछ भी करो हमें तो चाहिए,
          आधा भाग हमारा।
पुरुषो में शारीरिक बल है,
          हम ठहरी अबलाएं।
अक्ल हमारे लिए जरुरी,
         निज रक्षा कर पाएं।
सोचकर दाढ़ी सहलाकर,
         तब बोले ब्रह्मा जी।
एक वरदान तुम्हे देता हूँ,
         अब हो जाओ राजी।
थोड़ी सी भी हँसी तुम्हारी,
         रहे पुरुष पर भारी।
कितना भी वह अक्लमंद हो,
         अक्ल जायेगी मारी।
एक औरत ने तर्क दिया,
        मुश्किल बहुत होती है।
हंसने से ज्यादा महिलाये,
        जीवन भर रोती है।
ब्रह्मा बोले यही कार्य तब,
        रोना भी कर देगा।
औरत का रोना भी नर की,
        अक्ल हर लेगा।
एक अधेड़ बोली बाबा,
       हंसना रोना नहीं आता।
झगड़े में है सिद्धहस्त हम,
       खूब झगड़ना भाता।
ब्रह्मा बोले चलो मान ली,
       यह भी बात तुम्हारी।
झगड़े के आगे भी नर की,
       अक्ल जायेगी मारी।
ब्रह्मा बोले सुनो ध्यान से,
       अंतिम वचन हमारा।
तीन शस्त्र अब तुम्हे दिए,
       पूरा न्याय हमारा।
इन अचूक शस्त्रों में भी,
       जो मानव नहीं फंसेगा। निश्चित समझो,
       उसका घर नहीं बसेगा।
कहे कवि मित्र ध्यान से,
       सुन लो बात हमारी।
बिना अक्ल के भी होती है,
       नर पर नारी भारी।

                      अग्रेषक- आचार्य स्वामी ओमप्रिय आनन्द



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