महिमामंडन, गांधी के हत्यारे का...
| -Tanveer Jafri - Feb 11 2018 2:28PM

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भारत की अब तक की ऐसी इकलौती शç सयत का नाम है जिसे भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में समान रूप से आदर व स मान की नज़रों से देखा जाता है। सत्य व अहिंसा के मार्ग पर चलने का संकल्प करने वाले अनेक अंतर्राष्ट्रीय राजनेता महात्मा गांधी को अपनी प्रेरणा स्त्रोत के रूप में देखते हैं। विश्व के अनेक देशों में महात्मा गांधी की आदमक¸द प्रतिमाएं स्थापित हैं तथा दुनिया के अनेक संग्रहालयों में गांधी जी के चित्र स मानपूर्वक स्थापित किए गए हैं। आज भी दुनिया के अनेक देशों में महात्मा गांधी के जीवन दर्शन तथा उनकी राजनैतिक शैली पर शोध कार्य किए जाते हैं। आज भी युद्ध व हिंसा से पीड़ित व दुःखी जनता जब कभी कहीं शांति व अहिंसा की कामना करते हुए धरना,जुलूस या प्रदर्शन आयोजित करती है तो वहां गांधी के चित्रों को साथ लेकर चलती है और वहां उनकी शिक्षाओं को याद किया जाता है। परंतु यह हमारे ही देश का दुर्भाग्य है कि गांधी का हत्यारा नाथूराम विनायक गोडसे जोकि एक विशेष दक्षिणपंथी कट्टरवादी विचारधारा से प्रभावित था और इसी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने वाले संगठन के सक्रिय सदस्य के रूप में कार्यरत था,उसने 30 जनवरी 1948 को दिल्ली स्थित बिरला मंदिर कंपाऊंड में गांधी जी पर बिल्कुल करीब से तीन गोलियां दाग़ कर उनकी हत्या कर दी। नाथूराम विनायक गोडसे उस समय हिंदू महासभा का सदस्य था तथा इस हत्याकांड से पूर्व वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सदस्य भी था। गांधी जी की हत्या में गोडसे के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ  के और भी कई प्रमुख नेताओं को गिर तार किया गया था। ग़ौरतलब है कि गोडसे को 15 नवंबर 1949 को अंबाला के केंद्रीय कारागार में महात्मा गांधी की हत्या के जुर्म में फांसी दी गई थी।
                गांधी जी की हत्या से पूरा देश व दुनिया स्तब्ध रह गई थी। भारतवर्ष में भी इस पहली राजनैतिक आतंकवादी हत्या के बाद कोहराम मच गया था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को इसी हत्याकांड के चलते 4 फ़रवरी 1948 को प्रतिबंधित कर दिया गया था । और बाद में 11 जुलाई 1949 को भारत सरकार ने यह प्रतिबंध तब हटाया जब संघ ने लिखित रूप में भारत सरकार से यह वादा किया कि वह भविष्य में कभी किन्हीं राजनैतिक गतिविधियों में भाग नहीं लेगा और केवल एक सामाजिक व सांस्कृतिक संगठन के रूप में अपनी संगठनात्मक गतिविधियां संचालित करेगा। इतना ही नहीं बल्कि संघ ने उस समय यह वादा भी किया कि वह भारत के संविधान के प्रति अपनी पूरी आस्था रखेगा तथा भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को पूरा स मान देगा। यहां यह भी ग़ौरतलब है कि चूंकि यह संगठन बाहुलतावादी संस्कृति का विरोधी है और पूरे देश को केवल हिंदू संस्कृति के रंग-रूप में ही देखना चाहता है इसलिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ राष्ट्रीय ध्वज के रूप में प्रारंभ से ही तिरंगे झंडे का विरोधी रहा है तथा इनकी मंशा देश पर भगवा ध्वज फहराने की ही रही है।  चरमपंथी हिंदुत्ववादी विचारधारा की पैरवी करने वाले देश के अनेक संगठन, संघ की विचारधारा की पैरवी करते हैं तथा उनके द्वारा राजनैतिक तौर पर लिए जाने वाले फ़ैसलों की हिमायत भी करते हैं।
                हिंदू महासभा नामक संगठन हालांकि इस समय राजनैतिक रूप से अपने-आप में कोई इतना मज़बूत संगठन नहीं रह गया है। परंतु चूंकि नाथूराम गोडसे गांध्ंाी जी की हत्या के समय हिंदू महासभा से ही जुड़ा हुआ था लिहाज़ा गोडसे को ेमहिमामंडित करने जैसी घृणित मानसिकता रखने वाले लोग अभी तक हिंदू महासभा को भी जीवित रखे हुए हैं। इस संगठन के पास भले ही अपना कोई जनाधार न हो,समाज में इन्हें कोई मान्यता भले ही न मिलती हो परंतु इस संगठन से जुड़े चंद लोग महात्मा गांधी की जन्मतिथि,उनकी शहादत के दिन, नाथूराम गोडसे को फांसी दिए जाने जैसे अवसरों पर ज़रूर सक्रिय हो उठते हैं। हत्यारे गोडसे के यह छद्म पैरोकार वैसे तो देखने-सुनने से ही अशिक्षित व निकृष्ट प्रतीत होते हैं परंतु चूंकि यह लोग बातें गांधी जी के हत्यारे की पैरवी व उसके महिमामंडन की करते हैं इसलिए मीडिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में भी प्रायः सफल हो जाते हैं। पहले तो नाथूराम गोडसे के महिमामंडन व गांधीजी के विरोध के स्वर देश में बहुत कम सुनाई देते थे परंतु ऐसा लगता है कि अब बीते कुछ वर्षों से आतंकी हत्यारे गोडसे का कसीदा पढ़ने वालों और उसके नाम की माला जपने वालों की सं या में भी कुछ बढ़ोतरी हुई है।
                गत् 15 नवंबर को मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में हिंदू महासभा के कार्यालय में नाथूराम गोडसे की प्रतिमा स्थापित कर उसके नाम का मंदिर बना दिया गया था। हिंदू महासभा ने पहले भी ग्वालियर प्रशासन से गोडसे का मंदिर बनाने हेतु ज़मीन की मांग की थी। प्रशासन द्वारा इसके लिए इंकार भी किया जा चुका था। इसी के बाद इन गोडसेवादियों ने गोडसे की प्रतिमा अपने कार्यालय में स्थापित करने का फ़ैसला किया तथा बाद में गोडसे का मंदिर बनवाने का भी संकल्प किया। यह ख़बर पूरे देश में आग की तरह फैल गई। गोडसे के उत्साही समर्थकों ने तो यहां तक कह डाला था कि यदि इस प्रतिमा को हटाया गया तो पूरे देश में लगी महात्मा गांधी की प्रतिमाएं भी तोड़ दी जाएंगी। मध्यप्रदेश के एक कैबिनेट मंत्री लाल सिंह आर्य ने गोडसे की प्रतिमा ग्वालियर में स्थापित होने के बाद गोडसे को महापुरुष बताकर गोडसेवादियों की हौसला अफ़ज़ाई भी की थी। परंतु ग्वालियर में गांधीवादी विचारधारा रखने वाले समाज के बहुसं य लोगों के दबाव में आकर प्रशासन के सहयोग से आख़िरकार गोडसे की प्रतिमा हटा दी गई।
                महात्मा गांधी के हत्यारों के महिमामंडन की जो प्रवृति भारतीय समाज में अ ाी भी जीवित है वह निश्चित रूप से महात्मा गांधी के शांति,सद्भाव,सांप्रदायिक सौहार्द्र तथा अहिंसा के मूल सिद्धांतों की विरोधी है। यह विचारधारा हमें बहुलतावादी भारतीय संस्कृति के विरुद्ध ले जाती है। आज भारतवर्ष की पहचान पूरे विश्व में एक ऐसे अनूठे देश के रूप में बनी हुई है जहां सैकड़ों अलग-अलग धर्मों-जातियों,संस्कृतियों व अनेक रंग,भेद,भाषा के लोग एक ही देश की धरती पर मिलजुल कर सौहार्द्रपूर्वक रहते हैं। गोया भारतवर्ष रंग-बिरंगे फूलों के गुलदस्ते जैसा एक ऐसा सुंदर व आकर्षक देश है जो पूरे विश्व को अपनी ओर आकर्षित करता है तथा अनेकता में एकता की अपनी इसी पहचान की बदौलत पूरे विश्व में मान-स मान की नज़रों से देखा जाता है। परंतु यह भी हमारे देश का दुर्भाग्य है कि काफ़ी लंबे समय से नकारात्मक सोच रखने वाले तथा बहुलतावादी संस्कृति को बढ़ावा देने वाले लोग भारत के अनेकता में एकता रखने वाले इस स्वरूप का विरोध करते आ रहे हैं। केवल हिंदू महासभा ही नहीं बल्कि सत्ताधारी दक्षिणपंथी संगठन के लोग भी भले ही सार्वजनिक रूप से नाथूराम गोडसे के गले में माला डालने या उसके महिमामंडन से फ़िलहाल बचते आ रहे हों परंतु गांधीजी की आलोचना का कोई भी अवसर यह हिंदूवादी चरमपंथी नेता अपने हाथों से जाने नहीं देते। कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि कई छुटभैये नेता जो इन दिनों उच्च पदों पर भी पहुंच चुके हैं वे अपनी राजनैतिक हैसियत व औकात देखे बिना सीधे महात्मा गांधी पर उंगली उठाने लगते हैं और उनकी आलोचना करने लगते हैं। आश्चर्य तो उस समय होता है जबकि यही शक्तियां यह कहती भी सुनाई देती हैं कि गांधी का महिमामंडन देश के लिए मर-मिटने वाले शहीदों का अपमान है। और जब इन्हीं से कोई यह पूछ बैठता है कि ज़रा आप अपनी विचारधारा व संगठन से जुड़े शहीदों के नाम बताईए तो अंग्रेज़ों की ख़ुशामद करने वाले यही गोडसेवादी बग़लें झांकने लगते हैं।
                ऐसे में क्या यह सवाल वाजिब नहीं नहीं है कि आख़िर राष्ट्रवादी कौन था? महात्मा गांधी या उनका हत्यारा नाथूराम गोडसे? और दूसरा सवाल यह है कि गोडसे का महिमामंडन करने वाले किसी राष्ट्रवादी का महिमामंडन करते हैं या किसी आतंकी हत्यारे का?                



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