संवैधानिक संस्थाओं में आवश्यक हो गई है सकारात्मक मानसिकता की भागीदारी
| Dr. Ravindra Arjariya - Feb 25 2018 11:57AM

समाज को सम्प्रदायों में विभक्त करने वालों की संख्या में अचानक बढोत्तरी होने लगी है। राजनीति से लेकर व्यापार तक के सभी क्षेत्रों में वर्ग विशेष का ठेके लेने वाले स्वयं भू लोगों की जमात अपने खास सिपाहसालारों की दम पर पौ बारह करने में लगी है। दूसरे समुदाय पर भडकाऊ वक्तव्य देने, आम आवाम के मध्य वैमनुष्यता फैलाने तथा अपने समुदाय को असुरक्षा का डर दिखाने वाले लोग इन दिनों तेजी से सक्रिय हो रहे हैं। पडोसियों को जाति के नाम पर लडवाने वालों का षडयंत्र अब राष्ट्रीयस्तर से ऊपर उठकर अन्तर्राष्ट्रीय मंच तक दस्तक देने लगा है। पवित्र ग्रन्थों की इच्छित विवेचनाओं के आधार पर आस्था का खेल विस्फोटक स्थिति पर पहुंचने लगा है। आतंक के सहारे स्वयं के विश्वास और संस्कृति को थोपने वाले संगठित गिरोह बनाकर सक्रिय हो रहे हैं। बेराजगारों से लेकर असामाजिक तबके तक को अपने झंडे के नीचे संरक्षण देने के नाम पर एकत्रित करने वालों को पर्दे के पीछे से सहयोग करने वालों की भी कमी नहीं हैं।

विश्वास, श्रद्धा और आस्था के मार्ग पर विचारों का प्रवाह चल ही रहा था कि कालबेल ने व्यवधान उत्पन्न कर दिया। गेट खोला तो सामने हाजी रफीक आलम साहब को पाया। वे दौनों हाथ पसारे गले लगने को बेचैन थे। उन्हें देखकर हमारी भी बांहें फैल गई। आत्मिक मिलाप इतना गहरा था कि कई पल यूं ही गुजर गये। कुछ समय बाद हम ड्राइंग रूम के सोफे पर आमने-सामने थे। इस्लाम की यथार्थवादी व्याख्या करने वालों में रफीक साहब का नाम पूरे आवाम में बहुत इज्जत से लिया जाता है। उनके लाखों अनुयायी कुरान की वास्तविक विवेचना से दुनिया को इंसानियत का पैगाम दे रहे हैं। नौकर ने पानी का गिलास सेन्टर टेबिल पर रखा और चाय के साथ स्वल्पाहार लेने के लिए किचिन में चला गया। कुशलक्षेम पूछना-बताने के बाद चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। विचारों के चल रहे प्रवाह से उन्हें अवगत कराया। मजहबी बंदिशें दिखाकर दूसरे सम्प्रदाय पर कुठाराघात करने वालों की तीखी आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया के किसी भी मजहब में आतंक, जोर-जबरजस्ती और हिंसा का कोई स्थान नहीं है। मुट्ठी भर लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए पूरे सम्प्रदाय को बदनाम करने में जुटे हैं।

सभी दिशाओं में ऐसे लोगों की बाढ सी आने लगी है। हमने उन्हें बीच में टोकते हुए बाढ का कारण जानना चाहा। समाज के विभिन्न क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आज हर जगह तुष्टीकरण की चालें चलीं जा रहीं हैं। मुहरों के नाम पर लोग तैयार किये जा रहे हैं। घातकता पैमाने पर दूरगामी योजनाओं को तौला जा रहा है। स्वयं के वर्चस्व को पुष्ट करने के उपाय किये जा रहे हैं। ऐसे में राजनैतिक दलों से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय संगठनों तक में नकारात्मक मानसिकता के लोगों को उनकी जहरीली प्रवृति के ग्राफ के आधार पर ही ओहदे दिये जा रहे हैं। मृगमारीचिका बनकर ओहदों की सौगातें अपना असर दिखाने लगतीं हैं। कुछ नया परोस कर लोगों को आकर्षित करने के लिए नित नये हथकण्डे अपनाये जा रहे हैं। अहम् की चरम सीमा पर बैठे इस वर्ग ने तो अब सेना के जवानों की शहादतों को भी सम्प्रदाय के रंग में रंगना शुरू कर दिया है। सडक दुर्घटना से लेकर उत्पीडन तक के प्रकरणों में भी विभेद करने की गरज से वर्ग विशेष का उल्लेख किया जाने लगा है। विवेचना के विस्तार को पटरी पर लाने की गरज से हमने कहा कि इन लोगों को संवैधानिक दायरे में दी गई व्यवस्था के तहत ही तो जनप्रतिनिधि का तमगा मिला है।

लोगों ने ही चयनित करके उत्तरदायी संस्था में नुमाइन्दगी करने के लिए पहुंचाया है। वोट देकर विश्वास जताया है। इसे आप क्या कहेंगे। अपनी चिर-परिचित मुस्कुराहट बिखेरते हुए उन्होंने कहा कि हकीकत में आम आवाम बहुत भोली है। लच्छेदार बातों, कभी न पूरे होने वाले वायदों और ख्याली पुलाव से ही संतुष्ट हो जाती है। चालकों की जमात में तालीम पाने वाले अपने मुनाफे के लिए चाल-दर-चाल चलते रहते हैं। हर बार लोग ठगे जाते रहे हैं। आज संवैधानिक संस्थाओं में आवश्यक हो गई है सकारात्मक मानसिकता की भागीदारी और इसके लिए समाज के अन्तिम छोर पर बैठे व्यक्ति को स्वयं जागरूक होना पडेगा सामाजिक हितों के प्रति तभी परिवर्तन की लहर में खुशहाली की खुशबू आ सकेगी। चर्चा चल ही रही थी कि नौकर ने ड्राइंग रूप में प्रवेश करके सेन्टर टेबिल पर चाय के प्याले और स्वल्पाहार की प्लेटें सजाना शुरू कर दीं। बातचीत रोकना पडी परन्तु तब तक हमें अपने विचार प्रवाह का एक पडाव मिल चुका था। सो भोज्य और पेय पदार्थों को सम्मान देने की गरज से सक्रिय हो गये। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।  



Browse By Tags



Other News