चेहरे हैं दर्पण
| Rainbow News - Mar 5 2018 11:15AM

चेहरे हैं दर्पण
मजबूरियाँ ओढ़े
 दर्द छुपाते
आँसूं पीते
फीका मुस्कुराते
तन्हाई सहते
 अंदर से टूटते
रात भर देखते
खुद को ढूँढते
खुद से लड़ते
काँटें चुभोते
फटी एड़ियों को ताकते
सिसकते बिलखते
रोज़ मरते
फिर ज़िंदा होते
जबरदस्ती, गुमनामी के ख़ौफ़ से
डरते, अकेलेपन से
भीड़ में हँसते
मुस्कुराते, चहकते
पर दहकते हर रोज़
किसी के जाने से
चेहरे हैं दर्पण...
टूटने पर बिखरते
हर काँच में अकेले
दिखते तमाशबीन
अपना वजूद बनाये
रखने की जद्दोजहद में
आईने से लड़ते
क्योंकि...
चेहरे हैं दर्पण

                                                                                                                                       -डॉ. मंजरी शुक्ला



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