तालिबानी कृत्य है लेनिन की मूर्ति का ढहाया जाना
| Rainbow News - Mar 7 2018 12:04PM

                अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रपति नजीब की सत्ता समाप्त होने के बाद जिस समय क्रूर तालिबानियों ने सत्ता अपने हाथ में संभाली उसके बाद मार्च 2001 में आतंकवादी सोच के नायक मुल्ला मोह मद उमर के आदेश पर अफ़ग़ानिस्तान के बामियान प्रांत में स्थित शांति दूत महात्मा बुद्ध की पहाड़ों में तराश कर बनाई गई विशालकाय मूर्तियों को तोपों तथा भारी हथियारों से आक्रमण कर क्षतिग्रस्त कर दिया गया। पांचवीं व छटी शताब्दी के मध्य निर्मित की गई इन मूर्तियों को ध्वस्त व अपमानित किए जाने जैसे घिनौने कृत्य की पूरे विश्व में निंदा की गई थी। आज उसी प्रकार की ‘कारगुज़ारी’ भारतवर्ष में होती देखी जा रही है। वैचारिक सोच को व्यक्तिगत् रंजिश जैसी नज़रों से देखा जाने लगा है। इसका ताज़ातरीन उदाहरण पिछले दिनों भारत के त्रिपुरा राज्य में आए चुनाव परिणामों के बाद देखने को मिला। आश्चर्य की बात तो यह है कि सत्ता परिवर्तन होने के बाद नवगठित सरकार ने अभी सत्ता संभाली भी नहीं थी कि राज्य के एक दर्जन से भी अधिक ज़िले हिंसा व आगज़नी की चपेट में आ गए। और त्रिपुरा के बेलोनिया टाऊन के कॉलेज स्कवायर में लगी ब्लादिमीर लेनिन की मूर्ति को जेसीबी मशीन के द्वारा सुनियोजित तरीके से ढहा दिया गया। ग़ौरतलब है कि ब्लादिमीर लेनिन को रूसी क्रांति तथा सा यवादी विचारधारा के नायक के रूप में देखा जाता है। वे दुनिया में उन तमाम लोगों के लिए आदर्श पुरुष हैं जो सा यवादी विचारधारा रखते हैं। लेनिन पूंजीवादी व्यवस्था के घोर विरोधी थे तथा श्रमिकों के अधिकारों के लिए संघर्षरत रहने वाले महान नेता थे। लेनिन की गिनती विश्व के उन गिने-चुने नेताओं में की जाती है जिन्होंने विश्व राजनीति के पटल पर अपनी वैचारिक छाप छोड़ी है तथा इनके विचारों के समर्थक तथा विरोधी लगभग पूरी दुनिया में पाए जाते हैं।
                जिस प्रकार महात्मा गांधी की मूर्ति व प्रतिमाएं अथवा बुत भारत के अतिरिक्त दुनिया के कई देशों में देखे जा सकते हैं ठीक उसी प्रकार लेनिन जैसे नेताओं की प्रतिमाएं भी दुनिया के कई देशों में स्थापित हैं। अनेक देशों व राज्यों में सत्ता परिवर्तन भी होते रहते हैं। परंतु जिस प्रकार त्रिपुरा में पिछले दिनों लेनिन की प्रतिमा ढहाए जाने का समाचार मिला तथा पूरे विश्व के मीडिया का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ उस जैसी दूसरी मिसाल केवल तालिबान के बामियान प्रांत में तालिबानी कुकृत्य के दौरान 2001 में देखी गई थी या ऐसा नज़ारा 2003 में इराक के तहरीर स्कवायर पर उस समय देखा गया था जब सद्दाम हुसैन की सत्ता के पतन के बाद अमेरिकी सेना के इराक में प्रवेश करने पर सद्दाम की आदमकद प्रतिमा को त्रिपुरा की ही तरह ढहा दिया गया था। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या भारतवर्ष जैसा शांतिप्रिय देश भी इराक व अफ़ग़ानिस्तान जैसी हिंसक व नि नस्तरीय राजनीति की ओर बढ़ रहा है? क्या सत्ता परिवर्तन का अर्थ यही है कि पिछली सत्ता के आदर्श पुरुषों को इसी प्रकार अपमानित किया जाए और उनकी प्रतिमाएं व मूर्तियां खंडित की जाएं? क्या ऐसे कारनामों को हम लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा कह सकते हैं?
                अफ़सोस की बात यह है कि इस घिनौने कारनामे को भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा अपना समर्थन दिया जा रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था का समर्थन करने वाली तथा कारपोरेट घरानों की हिमायती भारतीय जनता पार्टी के सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेता लेनिन को आतंकवादी बता रहे हैं। इसी पार्टी के केंद्रीय गृहराज्य मंत्री हंसराज अहीर तो यह भी कह रहे हैं कि वह विदेशी नेतृत्व को नहीं बल्कि महात्मा गांधी व दीनदयाल उपाध्याय जैसे भारतीय नेताओं को आदर्श मानते हैं। सवाल यह है कि यदि यही विचार उन देशों के नागरिकों में भी पैदा हो जाएं जिन-जिन देशों में गांधी की प्रतिमाएं स्थापित हैं ऐसे में हम भारतवासियों पर क्या गुज़र सकती है? हिंदुत्ववादी विचारधारा रखने वाले नेताओं की मूर्तियां व प्रतिमाएं भी भारतवर्ष के कई राज्यों में स्थापित हो चुकी हैं। और ऐसे कई राज्यों में सत्ता परिवर्तन भी हुए हैं परंतु त्रिपुरा जैसी घिनौनी हरकत के समाचार पहले कभी नहीं सुनाई दिए। इस प्रकार की शुरुआत वैचारिक मतभेदों को हिंसा में परिवर्तित करने का काम करेगी। राजनैतिक व वैचारिक मतभेदों को हिंसक घटनाओं में परिवर्तित होने से बचाने के प्रयास किए जाने चाहिए।  परंतु बड़े अफ़सोस की बात है कि सत्ता के संरक्षण में ही नफ़रत का इस प्रकार का माहौल बनाया जा रहा है।
                लेनिन की प्रतिमा गिराने वालों को यह बात भी भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि इस प्रकार की अभद्र व हिंसापूर्ण घटना किसी महापुरुष या विश्वस्तर के नेता के मान-स मान,उसकी प्रतिष्ठा तथा उसकी बुलंदी को कभी कम नहीं कर सकती। मूर्तियां या प्रतिमाएं ढहाने से उसके विचार समाप्त नहीं हो जाते। भारतवर्ष में ही एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों बार महात्मा गांधी के हत्यारों के विचारधारा के पक्षधर लोगों द्वारा गांधी की प्रतिमा को कभी खंडित करने,कभी उसपर काला रंग पोतने तो कभी दूसरे घिनौने तरीकों से अपमानित करने का प्रयास किया गया है। परंतु न तो महात्मा गांधी के मान-स मान में कोई कमी आई न ही उनकी गांधीवादी विचारधारा पर कोई प्रभाव पड़ा न ही उनकी वैश्विक मान्यता में कोई कमी आई। इसी प्रकार बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमाओं को भी प्रायः अपमानित करने का प्रयास किया जाता रहा है। परंतु बाबा साहब की स्वीकार्यता भी पहले से अधिक बढ़ी है। उनको अपमानित करने जैसा अधर्म करने वाले मुट्ठीभर ऐसे लोगों का अपना कोई मान-स मान नहीं होता, ऐसे लोग बाबा साहब के विचारों तथा उनकी काबिलियत के समक्ष धूल के कण जितनी हैसियत भी नहीं रखते परंतु उत्पाती भीड़ का हिस्सा बनकर समाज में विघटन पैदा करने की कोशिश ज़रूर करते हैं।
                लोकतांत्रिक देशों में जनतांत्रिक तरीके से होने वाली चुनाव प्रक्रिया के बाद सत्ता का आना-जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जो दल या लोग आज सत्ता में हैं कल भी सत्ता उन्हीं की होगी या जो नेता या दल आज विपक्ष में हैं वे कभी सत्ता में नहीं आ सकेंगे,लोकतंत्र में इस बात की कोई गारंटी नहीं होती। लिहाज़ा सत्ता हासिल करने वाले नेताओं या दलों को इस अहंकार में कतई नहीं जीना चाहिए कि वे सत्ता से चूंकि हमेशा चिपके रहेंगे लिहाज़ा जब और जो मनमानी करना चाहें करते रहें। चुनावोपरंात सत्ता हस्तांतरण बड़े ही पारदर्शी,सौ य तथा सद्भावपूर्ण वातावरण में होना चाहिए। सत्ता में आकर किसी दूसरे सत्तामुक्त हुए दल के आदर्श नेताओं या महापुरुषों को अपमानित करना या उनकी मूर्तियों व प्रतिमाओं को खंडित करने जैसा घृणित प्रयास भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं स्वीकार किया जा सकता। यदि देश का कोई राजनैतिक दल,राजनेता अथवा संगठन इस प्रकार की गतिविधियों को संरक्षण देता है या ऐसे हिंसक प्रदर्शनों का समर्थन करता है अथवा ऐसे उपद्रवियों का बचाव करता है तो निश्चित रूप से ऐसा वर्ग देश में असिहष्णुता के वातावरण को फलने-फूलने का मौका दे रहा है। और इस प्रकार की हिंसक कार्रवाई को तालिबानी कृत्य के सिवा और कुछ नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार की घटनाएं किसी परिवर्तनकारी क्रांति का सूचक नहीं बल्कि वैचारिक मतभेदों को हिंसा तथा सामाजिक नफ़रत के माहौल में बदलने की एक साज़िश है। देश की जनता को ऐसे असहिष्णुतापूर्ण वातावरण व इसे बढ़ावा देने वाले संगठनों व नेताओं से स्वयं को अलग रखने की ज़रूरत है।



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