सपा-बसपा का चुनावी तालमेल क्या.....?
| -K.P. Singh - Mar 7 2018 2:53PM

फिर 1993 के सामाजिक भूकंप को पैदा करने की कुबत दिखायेगा

-के.पी. सिंह/ 25 साल बाद सपा और बसपा के बीच तालमेल की राह फिर से खुल जाने के कारण प्रदेश का राजनैतिक माहौल गर्म हो उठा है। 1993 में इन दोनों पार्टियों का जब गठबंधन हुआ था तो प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा जैसी उस समय की बड़ी पार्टियों की प्रासंगिकता लंबे समय के लिए खत्म होने के आसार बन गये थे। इस गठबंधन ने सामाजिक भूकंप को भी अंजाम दे डाला था जिसके तहत वर्ण व्यवस्था शीर्षासन कर जाने की हालत में पहुंच गई थी और परंपरावादी इस खतरे से बुरी तरह घबरा गये थे।
    हालांकि इन 25 वर्षों में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की गोमती नदी में काफी पानी बह चुका है। जब सपा-बसपा गठबंधन हुआ था उस समय मंडल-कमंडल का द्वंद छिड़ा हुआ था। रामो-वामों ने सामाजिक यथास्थितिवाद के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर दी थी और देश में एक नये राजनैतिक सामाजिक विकल्प के आसार बन गये थे। ऐसे में इस गठबंधन ने जहां रामो-वामो को अपने सबसे मजबूत गढ़ उत्तर प्रदेश में ही खोखला करके राष्ट्रीय चुनौती के रूप में उसका वजूद खत्म कर दिया था। वहीं देश के सबसे बड़े सूबे में परिवर्तन के जबर्दस्त तूफान को अंजाम दे डाला था।
    इस गठबंधन के चलते मुलायम सिंह को राजनैतिक पुनर्जीवन मिला तो बसपा प्रेशर गुट की हैसियत से उभर कर प्रदेश की एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गई। लेकिन यह गठबंधन स्थाई नही रहा। सही बात यह है कि जहां इस गठबंधन ने राष्ट्रीय स्तर पर परिवर्तन की आंधी को रोककर यथास्थितिवाद को सुरक्षा प्रदान की वहीं उत्तर प्रदेश में भी यह गठबंधन अधिक दिनों न चल पाने के बाद यथास्थितिवादी ताकतों की बहाली हो गई। आज पूरे देश में पुनरुत्थान का सिलसिला जिस तरह से मजबूत हो रहा है उसके लिए कहीं न कहीं इस गठबंधन के गलत उददेश्यों के लिए निर्माण के चलते इसके असमय हश्र को जिम्मेदार देखा जा सकता है।
    1993 में यह गठबंधन सारे बहुजन समाज के एक धु्रव पर आ जाने का कारण बना था जिसके चलते उससे पार पाना किसी के बूते की बात नही रह गई थी। वहीं आज हालत यह है कि गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के जिन उपचुनावों के लिए तालमेल बना है उनमें अगर दोनों पार्टियों के वोट जोड़ दिये जाये ंतब भी वे आम चुनाव में भाजपा से काफी पीछे नजर आ रहीं हैं। दरअसल इस बीच में बहुजन की चेतना में बदलाव आ चुका है और उनमें पनपी धर्मभीरुता को भाजपा ने भरपूर भुनाया है। अभी भी 1993 जैसे धुव्रीकरण की उम्मीद दोनों पार्टियों के गठजोड़ से नही की जा सकती। इसलिए इस गठजोड़ के बावजूद चुनाव नतीजा क्या होगा यह अनिश्चित है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयानों से लगता है कि भाजपा पूरे आत्मविश्वास मे है और उसे गठबंधन की कोई परवाह नही है। लेकिन अगर यह तालमेल दोनों लोकसभा सीटों में से एक भी भाजपा के हाथों से छिनने का कारण बनता है तो इसके नतीजे दूरगामी होगें और लोकसभा के आम चुनाव में सपा-बसपा के बीच गठबंधन के आसार बढ़ जायेगें।
    यह गठबंधन सपा प्रमुख अखिलेश यादव के उदारवादी रवैये का नतीजा है। जिसका परिचय उन्होंने विधानसभा चुनाव के समय से दिया है। इसके कारण ही सपा और बसपा के बीच बनी चैड़ी खाई पटने की शुरूआत हो गई थी। मायावती के तेवर भी सपा को लेकर नरम हो गये थे लेकिन उनका अहम गठजोड़ में आड़े आता रहा। अंततोगत्वा उनके सामने कोई विकल्प नही बचा था इसलिए उन्होंने सौदेबाजी के लिए तालमेल की हां भर दी। इससे उन्हें अपने भाई आनंद को राज्यसभा में भिजवाने का मौका मिल गया है। भाजपा के विराट प्रभाव से टक्कर लेने के लिए विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने कांग्रेस के साथ गठजोड़ का प्रयोग किया था जो इसलिए कामयाब नही रहा कि हिंदुत्व की आंधी में दोनों के वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर होने की बजाय और तेजी के साथ भाजपा की ओर चले गये।

     बाद में आंकलन किया गया तो यह पाया गया कि दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ती तो शायद भाजपा प्रत्याशी इतने अंतर से नही जीतते। इसलिए अब न तो कांगे्रस को और न ही सपा को आपस में चुनावी गठजोड़ करने में केाई दिलचस्पी रह गई है। दूसरी ओर बसपा से तालमेल के मामले में स्थिति अलग है। बसपा ने सपा शासन से ही उपचुनाव में अपने प्रत्याशी खड़े न करने की नीति अपना रखी है। जिसकी वजह से उनके वोटर फिर खरीद-फरोख्त के जाल में फंसने लगे थे। लेकिन अब जब कि उन्होंने स्पष्ट रूप से दोनों लोकसभा क्षेत्र में अपने वोटरों को सपा का साथ देने का फरमान जारी कर दिया है तो सपा को बेशक इससे लाभ होगा। क्योंकि उनका मूल वोटर अभी भी उनकी नाफरमानी के लिए तैयार नही हो सकता। समाजवादी पार्टी भी इस बात को जानती है। इसीलिए वह गोरखपुर और फूलपुर में अप्रत्याशित नतीजों की उम्मीद जुटाये हुए है।



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