पश्चिमी अर्थशास्त्र भारत के लिए अनुपयोगी (महात्मा गाँधी)
| Rainbow News - Mar 9 2018 11:52AM

    -शिवेन्द्र पाठक/ यह सच है कि भारत गाँव का देश है और यह भी सच है कि इन गाँवों में कृषि, खाद्य, प्रसंस्करण के क्षेत्र में असीम सम्भावनाएं हैं। विगत वर्ष दिल्ली के वर्ल्डफूड कार्यक्रम में 60 से अधिक देशों का भाग लेना और इस सन्दर्भ में बड़े-बड़े प्रस्तावों का आना इस बात का सबूत है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने भी प्रसंस्करण की चर्चाओं में इसमें अधिकतम निवेश पर बल दिया है। केन्द्र सरकार के विभागीय सचिव पराग गुप्त प्रसंस्करण को हमारे डी0 एन0 ए0 में देखते हैं और बताते हैं कि देश की आधी आबादी बिना किसी अतिरिक्त ट्रेनिंग लिये अचार, मुरब्बा आदि अपने घरों में बना लेती है, जो इस बात का प्रमाण है। दुग्ध उत्पाद के बाबत प्रदेश सरकार के प्रवक्ता व स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ सिंह बताते हैं कि डेयरी उद्योग में मवेशियों के प्रबन्धन से लेकर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेण्ट तक में नीदरलैण्ड के अनुभव का लाभ प्रदेश के किसानों को दिये जाने का प्रयास युद्धस्तर पर जारी है।
    अभी कुछ दिन पूर्व ही भारत रूस के बीच सम्पन्न कृषि व्यापार सम्मेलन में केन्द्रीय कृषि राज्यमंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत और रूस के कृषि उपमंत्री सर्जी वेलट स्काई ने कृषि क्षेत्र में दोनों देशों के आपसी सहयोग पर मोहर लगाया है। इस सम्मेलन में कृषि मशीनरी, कृषि शिक्षा और जैव प्रौद्योगिकी, मत्स्य पालन, समुद्री उत्पाद, बेकरी में प्रयोग होने वाले सूखे मेवे, नारियल उत्पाद जैसे विषयों पर गहन विचार विमर्श किया गया। किसानों के हित में किये जा रहे इन प्रयासों का निश्चित रूप से सराहना होनी चाहिए। परन्तु यह ध्यान रखना आवश्यक होगा कि इस सन्दर्भ में पश्चिमी अर्थशास्त्र को भारत के लिए महात्मा गाँधी अनुपयोगी और निरर्थक मानते थें। उनका मानना था कि पश्चिमी देशों का अर्थशास्त्र ठण्डे छोटे और कम खेती योग्य भूमि वाले देशों के लिए तो उपयोगी हो सकता है पर भारत जैसे कृषि प्रधान, नदी प्रधान, उपजाऊ भूमि वाले देशों के लिए नहीं। वहाँ का मानव यत्रों का निर्जीव कलपुरजा बनकर रह गया है। अधिक लाभ कमाने की लालसा ने वहाँ के समाज से मनुष्यता का लोप कर दिया है।
गाँधी जी चाहते थे कि गाँव स्वावलम्बी बने और भारत की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करे। इसके लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, छोटे-मझोले कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना करने तथा आवश्यकतानुसार छोटे यंत्रों का उपयोग करने पर बल देते थें। इस सोच के अनुसार आर्थिक योजनाएं बने तो कोई कारण नहीं कि अर्थव्यवस्था में पर्याप्त सुधार न हो। ऐसा करने से निश्चित रूप से  कृषि के साथ ही रोजगार का अधिकतम अवसर भी सुलभ हुआ होता। इससे गाँवों में उद्योग स्थापित हुए होते, आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन होता, कृषि प्रधान ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती और गावों का सर्वांगीण विकास सम्भव होता। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे आगामी सम्मेलनों में राष्ट्रपिता की दृष्टि से भी विचार हो।
    यह निर्विवाद है कि खेती किसानी आज भी हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। हमारे प्रधानमंत्री ने किसानों की स्थिति सुधारने का वादा किया है और इसके लिए बजट में प्राविधान भी है। कहा गया है कि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी कर दी जायेगी। खेती के संसाधन उपलब्ध कराने के साथ ही उनकी फसल का उचित दाम मिले इसकी व्यवस्था की गई है। सरकार खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में तेजी से कार्य कर रही है और कृषि उपज, सब्जी फलों का निर्यात बढ़ाने के भी प्रयास हो रहें है।
    प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा है कि खेत से लेकर बाजार तक पहुँचने में बड़ी मात्रा में फसल और फल-सब्जियां खराब हो जाती है। एक अनुमान है कि देश में हर साल किसानों को 90000 से एक लाख करोड़ रूपये तक का नुकसान इस वजह से होता है। श्री मोदी ने यह भी ठीक ही कहा है कि किसानों की समस्या सिर्फ केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है ऐसा न मानकर सरकारों को भी अपना दायित्व निभाना चाहिए। कभी अनावृष्टि, कभी अतिवृष्टि, कभी ओला, कभी पाला जैसे प्राकृतिक प्रकोप का अक्सर सामना करने वाले किसानों की मदद करना प्रदेश सरकार का कर्तव्य है। कृषि उपज बर्बाद न हो इसके लिए खाद्य प्रसंस्करण जरूरी है। देश में जैविक खेती को बढ़ावा देकर उसकी गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकता है, जिससे निर्यात किया जा सके। राज्य सरकारें इस दिशा में बेहतर प्रयास कर सकती हैं तभी प्रधानमंत्री द्वारा किसानों की आय बढ़ाने और खेती की दशा सुधारने के लिए जो चार स्तरों पर विभिन्न उपाय लागू करने की घोषणा की है, वह सार्थक होगा।
    खेती और किसानों के हितार्थ जितनी सक्रियता केन्द्र सरकार के लिए आवश्यक है, उतनी ही राज्य सरकारों के लिए भी। इस सन्दर्भ में अनेकों बार राज्य सरकारें ऐसा व्यवहार करती हैं मानों इसके लिए सिर्फ जिम्मेदार केन्द्र सरकार ही है। इसे किसी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। केन्द्र सरकार को किसानों के हित में अपने कदम बढ़ाने के साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि राज्य सरकारें भी इस आवश्यकता को समझें कि खेती और किसानों के हित में काम करना उनकी भी जिम्मेदारी है।



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