लोक-गायकी में शास्त्रीय विधा की पुनर्स्थापना की आवश्यकता
| Dr. Ravindra Arjariya - Mar 11 2018 12:30PM

       रागात्मक पक्षों की संतुष्टि के लिए अनेक माध्यम हैं जिनमें नवीनता युक्त विभिन्नताओं का स्थान सर्वोच्च है। एकरूपता से एकरसता की जडता जन्म ले लेती है ऐसे में कुछ अनजाने से पक्षों के मध्य पहुंचते ही न केवल ताजगी महसूस होती है बल्कि ज्ञान में होने वाली बढोत्तरी जीवन के नये आयामों तक पहुंचाने में सहायक भी बनती है। गुजरात में यह संस्कार वहां की संस्कृति की देन है। तभी तो अहमदाबाद की चाणक्यपुरी में बुंदेली संध्या के भव्य आयोजन की होडिंग्स महानगर से अलावा राष्ट्रीय राज मार्गों पर भी अटी पडी थी। हमें एक सुखद स्वाभिमान का अत्मबोध हुआ। हमारी जन्म भूमि की संगीत-गंगा गुजरात की गर्वीली धरती को पवित्र करने पहुंच गयी। बुंदेली के स्टार सिंगर देशराज पटैरिया को पाप के माइकिल जैक्शन की स्टाइल में पेश किया गया था। सिर पर कलगीदार साफा वाला पटैरिया जी का फोटो, पोस्टर और होडिंग्स के आधे से अधिक भाग पर कब्जा किये हुए था।

       अहमदाबाद हम अपने कार्यालयीन कार्य से आये थे, सो जल्दी-जल्दी काम पूरा किया और आयोजन स्थल पर पहुंच गये। भव्य पंडाल, सोफे, फैमिली सीट्स, सिंगल कुर्सियां और पीछे की ओर पटियों की सीढीनुमा बैठक व्यवस्था देखकर कार्यक्रम की विशालता का आभाष होने लगा। कार्यक्रम के आयोजक भाई पुरुषोत्तम शर्मा से मुलाकात हुई। परिचय के आदान-प्रदान के बाद उन्होंने पटैरिया जी की व्यस्त कार्यक्रम श्रंखला के बारे में बताया। तभी आधा दर्जन कारों का काफिला पंडाल के मुख्य द्वार पर पहुंच गया। अनेक चैनलों और अखबारों के कैमरे अपना काम करने लगे। बुंदेलखण्ड के इस सिंगिंग स्टार को कैमरों में कैद करने की होड सी लग गई। तभी पटैरिया जी की नजर हमारे ऊपर पडी। अपनी रोबदार आवाज में उन्होंने बुंदेली में ही हमें आवाज दी। ओ भइया अरजरिया जू, तनक नायखां अबाई होय, काये हमसें रूठे हौ। अपनत्व का सम्बोधन और सम्मान का भान एक साथ हमें भाव विभोर कर गया।

       हम उन तक पहुंचते तब तक वे स्वयं हमारे पास आकर गले लग गये। सच मानिये गैर भाषा-भाषी लोगों के बीच में अपनेपन का अहसास, किसी स्वर्गिक आनन्द से कम नहीं होता। भाव भरे मिलन के बाद वे मंच पर चले गये और हम अपनी अतिविशिष्ट दीर्घा की प्रथम पंक्ति के सोफो पर बैठ गये। चिर परिचित अंदाज में सदा भवानी दाहिने, सम्मुख रहैं गणेश से शुरू हुआ कार्यक्रम, बुंदेलखण्ड की लोक-गायकी की इन्द्रधनुषी आभा के तले पूर्व-निर्धारित तीन घंटे तक चला। इस मंच पर हमने पहली बार लोक गायकी में शास्त्रीय गायन की बारीकियों को सुना। बधाई, फाग, गारी सहित अनेक विधाओं में अलाप का समावेश, रागों का सम्मिश्रण और बंदिशों का अभिनव प्रयोग, दांतों तले अंगुलियां दबाने पर विवस करने लगा। हम अपनी ही बगिया के इन सौरभपूर्ण सुमनों की सुगन्ध से अनभिग्य थे। कार्यक्रम के समापन के बाद पटैरिया जी का ग्रीन रूम से हमारे बुलावा आया। अन्दर इलैक्ट्रानिक मीडिया की कई माइक आइ.डी. में घिरे स्टार गायक बुंदेली के यशगान को अपने व्याख्यान से नई ऊंचाइयां दे रहे थे। मुस्कुराहटों ने शब्द रहित अभिवादन किया। हम ने एक ओर प़डे सोफे पर आसन जमाया।

       बाइट देने के बाद वे उसी सोफे पर आ बैठे जिस पर हम बैठे थे। हमने उनकी ओर गर्वीली दृष्टि डाली। वे भी मुस्कुराये बिना नहीं रहे। शास्त्रीय विधा की बारीकियों का प्रयोग बुंदेलखण्ड की लोक-गायकी में पहली बार देखा था। विषय पर विशेषज्ञ की टिप्पणी चाही। उन्होंने रियासतकालीन परम्पराओं से लेकर विभिन्न दरबारों की विशेष विधाओं का उल्लेख करते हुए जानकारी दी। बुंदेलखण्ड की सभी रियासतों के शब्दकोष में उच्चारणजनित भिन्न हमेशा से रही है। इसी तरह गायकी की शास्त्रीय विधा का लोप लोकप्रियता के रस में घुलकर हो गया। जब कोई विधा संगीत साधकों से जन साधारण तक पहुंचने के क्रम में आती है तो वहां से रागत्मक अनुशासन के नियम न केवल शिथिल होने लगते हैं बल्कि बढते क्रम में मृतप्राय हो जाते हैं। रागों की जटिलता, मनोरंजन की सहजता, सुगमता और अल्लढता के सामने घुटने टेक देती है।

        बस इसी तरह के विकास क्रम ने बुंदेली-गायकी की शास्त्रीयता को हाशिये पर पहुंचा दिया और आम-आवाम के कण्ठ से मनमाने अंदाज में विस्फुटित होने लगी। शास्त्रीय विधा के साथ साधना करने वालों की कमी नहीं है परन्तु उन्हें संरक्षण के अभाव में निरंतर असुरक्षा की विभीषिका से दो-दो हाथ करना पडते हैं। तो आइये हम सब मिलकर लोक-गायकी के पुरातन स्वरूप की पुनर्स्थापना के लिए संकल्पित हों। इस बार बस इतना ही। अगले हफ्ते एक नयी शक्सियत के साथ फिर मुलाकात होगी, तब तक के लिए खुदा हाफिज।



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