इच्छा-मृत्यु भी ऐतिहासिक और फैसला भी!
| Rainbow News - Mar 13 2018 12:24PM

साका, जौहर और सन्थारा करने वाले देश में, जीवन और मृत्यु के बीच संघर्षरत मरीज, जिसका मर्ज लाइलाज हो उसके लिए तमाम चिकित्सकीय उपाय बेमानी हों, जिसका जीना मरने से भी ज्यादा कष्टकारी हो फिर भी उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम यानि जीवन रक्षक प्रणाली के सहारे केवल जीवित बनाये रखना उसके लिए भी यातनादायी है और परिजनों के लिए भी। ऐसी स्थिति में इच्छा-मृत्यु के पक्ष में आये सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को ऐतिहासिक माना जा सकता है।

वैसे तो इच्छा-मृत्यु का इतिहास बड़ा पुराना है। जनश्रुतियों को मानें तो पति (भगवान शंकर) के अपमान से आहत सती का योगाग्नि में जल जाना, सीता मईया का अपनी इच्छानुसार धरती में समाहित होना, भगवान राम, लक्ष्मण का सरजू नदी में जल समाधि लेना, दौराने महाभारत भीष्म पितामह का मृत्यु के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की सरशैय्या पर प्रतीक्ष करना और चन्द दशक पूर्व सन्त विनोवा भावे का अपने अन्तिम समय में जल त्यागकर मृत्यु वरण करना, इसके अलावा भी बहुत लम्बी फेहरिस्त है उन लोगों की जिन्होंने किसी अन्य विकल्प के अभाव में ‘‘साका जौहर और सन्थारा’’ के माध्यम से अपने लिए इच्छा-मृत्यु चुना।

इतिहास साक्षी है इस बात का कि युद्ध में जब स्पष्ट हो जाता था कि अब पराजय निश्चित है और आज का युद्ध अन्तिम है तो अपने नरेश (राजा) के नेतृत्व में राजपूत वीर ‘‘साका’’ करते थे। यह एक ऐसी परम्परा थी, जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह वीर उस दिन केशरिया बाना पहन, मुँह में तुलसी पत्ता रखकर, एक लिंग का नारा बुलन्द करते निकल पड़ते थे। उसके पूर्व उनकी पत्नियाँ अन्तिम आरती, अन्तिम अभिषेक, अन्तिम आलिंगन कर उन्हें युद्ध भूमि के लिए विदा करती थीं। वह यह जानती थी कि अब भेंट नहीं होनी है, फिर भी उसी वक्त उनकी आँखे आँसू रहित और चेहरे गर्व से दमक रहे होते थे। ऐसे अवसर पर जब पुरूष मृत्युपर्यन्त युद्ध के लिए तैयार होकर वीरगति प्राप्त करने निकल जाते थे तब राजपूत स्त्रियां अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए जौहर कर लेती थीं। अर्थात् जौहर कुण्ड में आग लगाकर उसमें कूद जाती थीं। उस समय उनके रग-रग में दौड़ते शौर्य तथा उनकी आत्मशक्ति को उत्सव के रूप में देखा जाता था।

संथारा की प्रथा भी इच्छा-मृत्यु का ही एक प्रकार है, जौ जैन धर्मावलम्बियों में वर्षों से प्रचलित है। हाल ही में जयपुर की महिला विमला देवी के संथारे लेने पर बौद्धिक समाज में लम्बी बहस छिड़ी थी। इधर आन्ध्र प्रदेश के एक शतरंज खिलाड़ी को 2004 में सात महीने से ज्यादा जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया था। उसकी असहनीय पीड़ा को देखते हुए उसके परिजनों द्वारा न्यायालय में दया याचिका दाखिल की गयी। जिसे न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया गया। कुछ वर्षों बाद ही 2009 में सर्वोंच्च न्यायालय में एक महिला अरूणा शानबाग के जीवन को समाप्त करने की याचिका दाखिल की गयी, जो बलात्कार की कोशिश का प्रतिरोध करने में चोटिल हो लकवाग्रस्त होकर वर्षों अस्पताल में जिन्दा लाश की तरह पड़ी रही। इस मामले से पूरे देश में इच्छा मृत्यु को लेकर गम्भीर बहस छिड़ गयी। इच्छा-मृत्यु या मर्सी कीलिंग (दया मृत्यु) पर बहसें होती रही और इस पेचीदे तथा संवेदनशील मुद्दे को लेकर दुनिया भर में इच्छा-मृत्यु की इजाजत की माँग क्रमशः बढ़ती गयी।

12 वर्षों की लड़ाई के बाद सर्वोंच्च न्यायालय ने भी यह बात स्वीकार कर ली है कि सभी देशवासियों को जिस प्रकार सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार वैसे ही सम्मानपूर्वक मरने का भी है। अब मरीज को यह अधिकार प्राप्त है कि वह चाहे तो लगातार बेहोशी की हालत में रखे जाने या लगातार जीवन रक्षक व्यवस्थाओं के सहारे अपना वजूद बनाये रखने से इन्कार कर सकता है। इसके लिए सर्वोंच्च न्यायालय ने इच्छा-मृत्यु को मंजूरी दे दी है। दायर याचिका में मरणासन्न व्यक्ति द्वारा इच्छा-मृत्यु के लिए पूर्व में लिखी गयी वसीयत को मंजूरी देने की बात कही गयी है। यद्यपि कि इसे लेकर कोर्ट ने सुरक्षा उपाय के लिए दिशा निर्देश भी जारी किया है।

वर्तमान में जहाँ भू्रण हत्या, किडनी प्रत्यारोपण आदि को जिस तरह कानूनी आड़ लेकर अवैध धन्ध प्रकाश में आता रहा है। संशय है कि उसी तरह मृत्यु के अधिकार का भी कही बेजा इस्तेमाल न हो, जिसके लिए विशेष सजगता की आवश्यकता होगी। इच्छा-मृत्यु के पक्ष में आये सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को मानव सभ्यता के निशानी के रूप में मानने वालों को यह भी ध्यान रखना होगा कि जीवेम शरदः शतम् के ध्येय वाली भारतीय मनीषी तथा संस्कृति में प्रत्येक दशा में जीवन रक्षा करने का निर्देश समाहित है तथा जिन्दगी से पलायन किसी भी दशा में वर्जित है।



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